MPC : इस साल फरवरी से लेकर अप्रैल आते आते देश की अर्थव्यवस्था मजबूती से उतर कर नाजुक मोड पर आ गई है। ऐसे समय पर 6 से 8 अप्रैल, 2026 तक होने वाली RBI MPC की बैठक हो रही है। इस बीच महंगाई मोटे तौर पर मीडियम-टर्म टारगेट के साथ बनी रही और ग्रोथ इंडिकेटर मज़बूत बने रहे, अपनी फरवरी की मीटिंग में MPC ने पॉलिसी रेपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा और न्यूट्रल रुख बनाए रखा। उस समय,फाइनेंशियल हालात ठीक थे, सिस्टम में लिक्विडिटी अच्छी थी और ग्लोबल माहौल अनिश्चित होने के बावजूद संभालने लायक थे।
जोखिम की चिंताएं
पश्चिम एशिया में युद्ध के तेज़ होने से ग्लोबल बाजार में जोखिम उठाने की भावना और कमोडिटी बाज़ारों में काफ़ी बदलाव आया है। सप्लाई में रुकावट और शिपिंग से जुड़े बढ़ते जोखिमों की चिंताओं के चलते कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल आया है। 2 अप्रैल, 2026 तक ब्रेंट क्रूड की कीमतें लगभग 48 फीसदी तक बढ़ गई हैं। इसके साथ ही,उभरते बाज़ारों को लेकर निवेशक ज्यादा सतर्क हो गए है। इन सब से चलते रुपये पर दबाव पड़ने लगा है। पश्चिम एशिया में संघर्ष बढ़ने के बाद से रुपया लगभग 3 फीसदी कमज़ोर हो गया है। भारत के एक बड़ा ऊर्जा आयातक देश है। ऐसे में तेल और गैस के दाम में बढ़त से महंगाई बढ़ने और भारत के करेंट एकाउंट घाटे से जुड़ी चिंताएं बढ़ गई हैं।
मंहगाई बढने की चिंता
जनवरी 2026 में रिटेल महंगाई दर 2.74 फीसदी थी, जो फरवरी 2026 में बढ़कर 3.21 फीसदी पर आ गई। हालांकि महंगाई दर आरबीआई के 4 फीसदी के मध्यम-अवधि के लक्ष्य के दायरे में ही बनी हुई है,लेकिन कच्चे तेल की कीमतों में हालिया उछाल का महंगाई के आगे के अनुमानों पर प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष दोनों तरह का असर पड़ेगा। कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने से ईंधन, एलपीजी और परिवहन का खर्च बढ़ जाता है। साथ ही,इससे सभी सेक्टरों की इनपुट लागत भी बढ़ जाती है। भले ही घरेलू मांग की स्थिति काबू में रहे, लेकिन सप्लाई में दिक्कत आने से महंगाई बढ़ने का खतरा है। MPC एमपीसी शायद इस बात का आकलन करेगी कि ये दबाव सिर्फ कुछ समय के लिए हैं या इनसे कीमतों की स्थिरता को कोई ज्यादा लंबे समय तक बना रहने वाला खतरा है।
विकास की गति पर असर
महंगाई के अलावा,तेल और गैस बढ़ी हुई कीमतों का विकास की गति पर पड़ने वाले असर पर भी बारीकी से ध्यान देना ज़रूरी है। दुनिया के दूसरे देशों के मुकाबले भारत की विकास की गति काफ़ी मज़बूत रही है। Q3FY26 में हमारी GDP ग्रोथ घटकर 7.8 फीसदी रह गई,जबकि Q2FY26 में यह 8.4 फीसदी और Q1FY26 में 6.7 फीसदी थी। हालांकि,अगर एनर्जी की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो इससे कंपनियों के मुनाफ़े पर दबाव पड़ेगा और आम लोगों की खरीदने की ताक़त कम हो जाएगी। इससे विकास की गति धीमी पड़ सकती है।
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एशिया संकट का असर
बॉन्ड मार्केट में भी वेस्ट एशिया संकट का असर देखने को मिल रहा है। 10-साल की G Sec यील्ड अभी 7.15 फीसदी के आसपास है, जबकि 10-साल की US ट्रेजरी यील्ड लगभग 4.40 फीसदी है। इसका मतलब है कि स्प्रेड (दोनों के बीच का अंतर ) लगभग 275 बेसिस प्वाइंट है,जो 2026 की शुरुआत के लगभग 240 बेसिस प्वाइंट से ज़्यादा है। बढ़ता हुआ स्प्रेड ज़्यादा रिस्क प्रीमियम दिखाता है। मौजूदा बॉन्ड यील्ड को देखते हुए ऐसा लगता है कि बाज़ार यह मानकर चल रहा है कि दरों में कुल 100 बेसिस प्वाइंट से ज़्यादा की बढ़ोतरी हो सकती है। इसका असर बॉन्ड की कीमतों पर पहले से ही दिख रहा है। इससे यह संकेत मिलता है कि बॉन्ड के वैल्यूएशन ने खराब खबरों के असर को काफी हद पचा लिया है।
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