Investment Market Business: शेयर मार्किट में निवेश करने से पहले यह तय करना कि किन स्मॉल-कैप कंपनियां में निवेश करें किसमें नहीं, किसके भाव चढे हैं और चढेंगे या उतर जाएगें, किस कंपनी के भाव में गिरावट है क्या उनमें निवेश करना जोखिम भरा तो नहीं होगा ये सवाल हर निवेशक के दिमाग में रहते हैं, इन दिनों हर निवेशक के मन में स्मॉल-कैप शेयरों में आई बड़ी गिरावट को लेकर उत्सुकता है. अगर एवरेज देखें तो अधिकतर शेयर अपने हाई से 40 फीसदी तक नीचे आ चुके हैं. स्मॉल-कैप फंड्स हमेशा से दोधारी तलवार की तरह रहे हैं. तेजी के दौर में ये शानदार रिटर्न देते हैं, लेकिन गिरावट के समय तेजी से गिरते भी हैं. तो फिलहाल अच्छी-खासी गिरावट दिखा चुके इन फंड्स में क्या करना चाहिए?
अभी स्थिति सामान्य है
ताज़ा आंकड़े बताते हैं कि बाजार में एक तरह का “रीसेट” देखने को मिला है. अबैकस म्यूचुअल फंड की एक स्टडी के मुताबिक, करीब आधी स्मॉल-कैप कंपनियां, जिनका मार्केट कैप लगभग 2,000 करोड़ रुपये से 34,700 करोड़ रुपये के बीच है, अपने ऑल-टाइम हाई से करीब 40 प्रतिशत नीचे ट्रेड कर रही हैं. मार्केट साइकिल की भाषा में कहें तो यह वैल्यूएशन का कूल अथवा सामान्य होना है. यह कूलनेस अक्सर जरूरत से ज्यादा उत्साह को संतुलित करती है और मजबूत कंपनियों को अलग पहचान देती है.
तेज़ रफ्तार विकास, लेकिन ऊंचा जोखिम
स्मॉल-कैप कंपनियां आमतौर पर अपनी ग्रोथ के शुरुआती चरण में होती हैं. ये ऐसे सेक्टर्स में काम करती हैं, जो या तो उभर रहे होते हैं या अभी मुख्यधारा में नहीं आए होते. सही रणनीति और बेहतर प्रबंधन के दम पर ये कंपनियां तेजी से विस्तार कर सकती हैं. यही वजह है कि इनमें ग्रोथ की संभावना ज्यादा होती है, लेकिन कीमतों में उतार-चढ़ाव भी उतना ही तेज होता है. आंकड़ों पर नजर डालें तो कैलेंडर ईयर 2019 से 2025 के बीच स्मॉल-कैप कंपनियों का कुल बाजार पूंजीकरण करीब 16 ट्रिलियन रुपये से बढ़कर 83 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया. यानी लगभग 5.3 गुना बढ़ोतरी हुई. यह रफ्तार मिड-कैप और लार्ज-कैप कंपनियों से कहीं ज्यादा रही. इसी दौरान भारतीय शेयर बाजार में स्मॉल-कैप की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत से बढ़कर करीब 19 प्रतिशत तक पहुंच गई. लंबी अवधि के रिटर्न भी इस तस्वीर की पुष्टि करते हैं. निफ्टी स्मॉलकैप 250 को ट्रैक करने वाले एसआईपी (ैप्च्) ने 2016 से अब तक लगभग 17 प्रतिशत सालाना चक्रवृद्धि रिटर्न दिया है. इसके मुकाबले निफ्टी 50 से जुड़े ैप्च् का औसत रिटर्न करीब 12 प्रतिशत रहा है.
क्या मौजूदा गिरावट अवसर है?
बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि अभी की स्थिति वैल्यूएशन के संतुलन की है. कीमतें नरम हुई हैं, बाजार की चौड़ाई (ठतमंकजी) कमज़ोर पड़ी है और चुनिंदा अच्छे अवसर सामने आ रहे हैं. हालांकि अस्थिरता पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, इसलिए दोबारा एंट्री धीरे-धीरे करना बेहतर रह सकता है. लंबी अवधि का नजरिया रखने वाले और उतार-चढ़ाव झेलने की क्षमता रखने वाले निवेशकों के लिए चरणबद्ध तरीके से एक्सपोज़र बढ़ाना समझदारी भरा कदम हो सकता है. खासकर युवा निवेशक, जिनके वित्तीय लक्ष्य अभी कई साल दूर हैं, वे अपने पोर्टफोलियो में स्मॉल-कैप का थोड़ा बड़ा हिस्सा रख सकते हैं. वहीं जिन निवेशकों के लक्ष्य नजदीक हैं, उनके लिए सतर्क रुख बेहतर रहेगा.
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विशेषज्ञों की राय है कि हर 12 से 18 महीने में पोर्टफोलियो का रीबैलेंस करना जरूरी है, ताकि किसी एक सेगमेंट में निवेश जरूरत से ज्यादा न बढ़ जाए. ैप्च् के जरिए चरणबद्ध निवेश जोखिम को संतुलित करने में मदद कर सकता है. अगर निवेशक उतार-चढ़ाव से असहज हैं, तो सीमित आवंटन बनाए रखना भी उतना ही तार्किक निर्णय है.
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