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भारत में 28 मई को मनाया जाएगा ईद-उल-अजहा (बकरीद) का त्योहार, कैसे शुरू हुई कुर्बानी की परंपरा ?

bakrid

Bakrid : इस्लाम में ईद-उल-अजहा बहुत पवित्र पर्व माना जाता है. इसको बकरीद कहते हैं. बकरीद पर कुर्बानी की पंरपरा है. ये आज से लगभग पांच हजार साल पहले महान सूफी संत और ईश्वर के दूत हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम की सर्वशक्तिमान (अल्लाह) के प्रति त्याग और आस्था का प्रतीक है. इस्लामिक कैलेंडर (हिजरी कैलेंडर) के अनुसार, साल के 12वें और आखिरी महीने ज़ु अल-हज्जा की 10वीं तारीख पर ये पावन पर्व मनाया जाता है.

बकरीद 28 मई को

इस साल बकरीद किस तारीख हो मनाई जाएगी इसको लेकर पहले कुछ संशय बना रहा कि 27 मई या 28 मई कौनसी तारीख को बकरीद का त्यौहार है, चूंकि, अब मुस्लिम धर्मगुरुओं ने घोषणा कर दी है कि बकरीद का त्योहार 28 मई मनाया जाएगा. ऐसे में भारत में 28 मई को बकरीद होगी.

कुर्बानी की परंपरा

बकरीद का त्योहार इंसान को अपने भीतर की सच्ची श्रद्धा और अल्लाह के प्रति समर्पण को समझाता है. इस दिन दुनियाभर के मुसलमान नमाज अदा करते हैं, गरीबों में दान करते हैं और कुर्बानी देकर इंसानियत और बराबरी का संदेश दिया करते हैं. कुर्बानी देने की ये परंपरा पैगंबर हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम से जुड़ी बताई जाती है. इस्लामी मान्यता के अनुसार, अल्लाह ने हजरत इब्राहिम की आस्था इम्तिहान लेने के लिए उनके सबसे प्रिय और इकलौते बेटे हजरत इस्माईल की कुर्बानी मांगी.

अल्लाह के प्रति समर्पण का प्रतीक

हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम को अपने अल्लाह पर पूरा यकीन था. इसलिए वो अल्लाह का आदेश पाकर अपने बेटे की कुर्बानी देने को राजी हो गए. चूंकि वो जानते थे कि अल्लाह कभी भी उनसे उनके बेटे की कुर्बानी नहीं लेंगे. यही उनकी आस्था थी, लेकिन अल्लाह के प्रति समर्पण जताने के लिए हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम अपने बेटे की कुर्बानी के लिए मान गए. इसके बाद जैसे ही वो बेटे की गर्दन पर छूरी चलाने वाले थे, तभी अल्लाह के हुक्म से फरिश्तों ने इस्माईल की जगह एक दुम्बा (मेमना) रख दिया. इस तरह से हजरत इस्माइल की जान बच गई.

कुर्बानी की परंपरा की नींव

यही घटना इस्लाम में कुर्बानी की परंपरा की नींव मानी जाती है. तब से हर साल मुसलमान इस दिन बकरी, भेड़, ऊंट या बैल की कुर्बानी दिया करते हैं. ऐसा करके मुसलमान उस समर्पण को याद करते हैं, जो हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के प्रति किया था. बकरीद के त्योहार का अर्थ सिर्फ जानवर की कुर्बानी देना भर नहीं है, बल्कि ये त्योहार अपने भीतर की बुराइयों, अहंकार और लालच को त्यागने का भी संदेश देता है.

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