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इंटीरियर और आस्था का सुंदर मेल बनने लगे हैं घर के पूजा कॉर्नर

Pooja corner

Pooja Corner : आज से दो दशक पहले तक कभी घरों में पूजा कॉर्नर सिर्फ एक लकड़ी के छोटे मंदिर या दीवार पर टंगे कैलेंडर तक ही सीमित होता था। सुबह अगरबत्ती जलाना, शाम को दीया जलाना, त्योहारों पर उसे थोड़ा-बहुत सजाना, बस पूजा कॉर्नर की संबंधित गतिविधियां इतनी ही होती थीं। लेकिन अब समय बदल गया है। आधुनिक घरों में पूजा कॉर्नर केवल एक धार्मिक जगह भर नहीं रह गया बल्कि मानसिक शांति, पारिवारिक जुड़ाव और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक भी बन गया है।

इंटीरियर और आस्था का सुंदर मेल

आज के दौर की आधुनिक शैली में रहने वाली महिलाएं घर के छोटे और खास कॉर्नर को एक नये अंदाज में सजा रही हैं। खास बात यह है कि आधुनिक इंटीरियर और पारंपरिक आस्था का सुंदर मेल इसमें साफ-साफ दिखायी देता है। चाहे छोटा फ्लैट हो या स्टूडियो अपार्टमेंट या बड़ा घर। आजकल हर जगह पूजा कॉर्नर अपनी अलग पहचान बना रहा है। शहरों में सीमित जगह ने पूजा की शैली बदल दी है, दीवार के एक कोने, बालकनी के हिस्से, लिविंग रूम के निचले सेल्फ या किचन के पास बने एक छोटे से स्थान को भी महिलाओं ने खूबसूरती से पूजा कॉर्नर में बदल दिया।

प्राकृतिक तत्वों का बढ़ता प्रयोग

इंटीरियर डिजाइनरों के मुताबिक अब लोग भारी-भरकम की जगह सादगी पसंद कर रहे हैं, लकड़ी, बांस, कीकर और मिट्टी जैसे प्राकृतिक तत्वों का प्रयोग बढ़ा है। सफेद, हल्का पीला और मिट्टी जैसे रंगों का उपयोग खास करके पूजा कॉर्नर को भव्य वातावरण प्रदान करता है। एलईडी लाइट, घंटियों वाली सजावट, छोटे इंडोर पौधे और दीया वास्तव में पूजा कॉर्नर को आधुनिक और आध्यात्मिक स्पर्श देते हैं।

युवाओं का भी इमोशनल रिचार्ज स्पेस

दिलचस्प बात ये है कि पूजा कॉर्नर अब केवल बुजुर्गों की जगह नहीं रहा। अब युवा भी चाहें वो महिलाएं हों या पुरुष, अपने ‘इमोशनल रिचार्ज स्पेस’ के रूप में पूजा घर का इस्तेमाल करने लगे हैं। कई कामकाजी महिलाओं के लिए सुबह पांच मिनट एक जगह पर बैठना दिन की भागदौड़ से पहले मानसिक संतुलन बनाने जैसा होता है और इस बात को मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि घर में अगर कोई पूजा या आस्था कॉर्नर होता है, जहां बैठकर शांत और सकारात्मकता महसूस होती है तो यह जगह मानसिक स्वास्थ्य में बहुत अच्छा प्रभाव डालती। नियमित प्रार्थना, ध्यान और कुछ क्षणों की चुप्पी तनाव को कम करने में मदद करती है। यही कारण है कि अब पूजा कॉर्नर में सिर्फ भगवान की मूर्तियां ही नहीं बल्कि ध्यान दीप, सुगंधित मोमबत्तियां और मेडिटेशन बेल जैसी चीजें भी दिखायी देती हैं।

सोशल मीडिया का प्रभाव

सोशल मीडिया ने भी इस ट्रेंड को खूब बढ़ावा दिया है। इंस्टाग्राम और यू-ट्यूब पर ‘होम टेंपल डेकोर’, ‘फेस्टिव पूजा सेटअप’ और ‘मिनिमल पूजा कॉर्नर’ जैसे वीडियो खूब लोकप्रिय हो रहे हैं। महिलाएं त्योहारों पर फूलों, रंगोली, फेरी लाइट्स और पारंपरिक कपड़ों से पूजास्थल सजाकर तस्वीरें साझा करती हैं। इससे भी पूजा कॉर्नर पर लोगों का विशेष ध्यान गया है और हाल के सालों में पूजा कॉर्नर के डिजाइन और उसकी सजावट में एक से एक कल्पनात्मक पहलू जुड़े हैं। हालांकि आधुनिकता के बीच हमारी पारंपरिक भावनाएं अभी भी बहुत मजबूत हैं। ज्यादातर महिलाएं मानती हैं कि घर का पूजा कॉर्नर परिवार को भावनात्मक रूप से जोड़ता है। सुबह-शाम की आरती, त्योहारों की पूजा, परीक्षा के समय या कोई नया काम शुरू करने के पहले मंदिर में दीया जलाना, ये छोटे-छोटे पल परिवार में आत्मीयता पैदा करते हैं। मनोवैज्ञानिक भी मानते हैं कि वास्तव में बच्चों में संस्कृति और परंपरा के बीज इस तरह की गतिविधियों से न सिर्फ अंकुरित होते हैं बल्कि मजबूत वृक्ष बनते हैं।

बच्चों का भी जुड़ाव

जब बच्चे घर में नियमित रूप से दीपक, मंत्र, त्योहारों की सजावट और पूजा की तैयारी देखते हैं, तो उनमें इन गतिविधियों से जुड़ाव स्वाभाविक रूप से विकसित होता है। आजकल बाजार में भी पूजा कॉर्नर के लिए अलग से डिजाइन उपलब्ध हैं। फोल्डेबल मंदिर, वॉल-माउंटेड यूनिट, कॉम्पैक्ट पूजा कैबिनेट और मल्टी फंक्शन पूजा सेल्फ शहरों में काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। कई महिलाएं अपनी पसंद के मुताबिक हस्तनिर्मित सजावट चुनती हैं ताकि पूजास्थल में निजी और भावनात्मक स्पर्श बना रहे।

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