Bandar: जिस आदमी की पहचान लोगों के प्यार और सम्मान पर टिकी हो, उसके लिए आगे आने वाला अपमान सिर्फ़ कानूनी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व पर चोट करने वाला होता है। बंदर फिल्म यही कहती है। हम अपनी सर्विस के बंदर हैं। अनुराग कश्यप एक बेहतरीन फिल्म निर्देशक हैं, उनकी हर फिल्म अलग विषय और अलग अंदाज से शूट की हुई होती है। फिल्म को निर्देशित करते समय अनुराग अभिनेताओं से वो अभिनय करा जाते हैं जो खुद अभिनेता भी नहीं जान पाते कि उनका अभिनय कितना जानदार या यादगार बन चला है। ऐसी ही एक फिल्म बंदर में बॉबी देओल ने अपनी ज़िंदगी की सबसे बेहतरीन परफ़ॉर्मेंस दी है, जिसके बारे में कोई बात नहीं कर रहा है। शायद एक दिन अनुराग कश्यप की फ़िल्म बंदर को सबसे ज़्यादा याद किए जाने वाले काम के तौर पर स्थापित कर दे।
सोच से अलग फिल्म
बंदर आम दर्शकों की फ़िल्म देखने की सोच से बहुत अलग है, खासकर उन फ़ैन्स के लिए जिनकी वजह से बॉबी देओल जैसे स्टार्स का मेनस्ट्रीम करियर चलता है। इसी वजह से इसे ठंडा रिस्पॉन्स मिला, लेकिन कश्यप की फ़िल्में कभी भी बॉक्स ऑफ़िस पर ज़बरदस्त कमाई का वादा नहीं करतीं। इसके अलावा, बंदर के साथ देओल को एक ऐसी स्क्रिप्ट मिली है जिसमें अनुराग कश्यप की बेचेनी और असहजता वाली जानी-पहचानी शैली को कई गुना बढ़ा दिया गया है। किसी भी एक्टर के लिए यह एक बहुत बड़ी चुनौती है।
फिल्म की कहानी
देओल ने समर मेहरा का किरदार निभाया है, जो कभी मशहूर पॉप सिंगर हुआ करता था, लेकिन अब उसका नाम बस एक पुराने हिट गाने की वजह से ही याद किया जाता है। अब न तो भीड़ जुटती है और न ही फ़ोन बजता है। उसका गर्व अभी भी बचा हुआ है, लेकिन बस नाम-मात्र का। एक रात, पुलिस समर के दरवाज़े पर पहुँचती है, उसकी एक पुरानी गर्लफ्रेंड ने उस पर रेप का आरोप लगाते हुए रिपोर्ट दर्ज कराई है। इसके बाद शुरू होता है कोर्ट की सुनवाई, मीडिया के हंगामे और जेल के चक्करों का एक कभी न खत्म होने वाला सिलसिला। समर पुलिस और जेल के उस बेरहम सिस्टम का सामना करता है, जो फ़ैसला आने से बहुत पहले ही किसी इंसान को पूरी तरह तोड़कर रख देने के लिए बनाया गया है।
डार्क ज़ोन में बॉबी देओल
यह अनुराग कश्यप की बनाई एक क्लासिक डार्क ज़ोन वाली कहानी है, जो एक एक्टर के तौर पर देओल की काबिलियत का इम्तिहान लेती है। जैसे ही समर जेल में कदम रखता है, उसकी ज़िंदगी बेकाबू होकर एक ऐसी दुनिया में चली जाती है जिसके बारे में उसे कभी पता भी नहीं था। सुदीप शर्मा और अभिषेक बनर्जी की लिखी यह फ़िल्म एक दिलचस्प और गंभीर विषय को बड़े पैमाने पर पेश करती है। कहानी में धीरे-धीरे बढ़ते तनाव को और गहरा करने की कोशिश में पटकथा कभी-कभी लड़खड़ाती है। कहानी के कुछ मोड़ स्वाभाविक लगने के बजाय बनावटी लग सकते हैं और फ़िल्म को अपनी रफ़्तार बनाए रखने के लिए कभी-कभी मशक्कत करनी पड़ती है। देओल के लिए चुनौती इन कमियों से ऊपर उठकर काम करने की थी। उन्होंने कहानी के उतार-चढ़ाव को बहुत संयम के साथ संभाला है और अपनी उस एक्शन हीरो वाली मुख्यधारा की नाटकीय शैली से दूर रहे हैं, जो उनकी पहचान रही है।
आदमी की पहचान लोगों के प्यार और सम्मान पर टिकी
यह संयम बहुत ज़रूरी है क्योंकि समर की त्रासदी (दुखद स्थिति) को देखना धीरे-धीरे मुश्किल होता जाता है। जिस आदमी की पहचान लोगों के प्यार और सम्मान पर टिकी हो, उसके लिए आगे आने वाला अपमान सिर्फ़ कानूनी नहीं, बल्कि उसके अस्तित्व पर चोट करने वाला होता है। जब वह विचाराधीन कैदी (अंडरट्रायल) के तौर पर जेल पहुँचता है, तो उसका सेलिब्रिटी स्टेटस एक कमोडिटी (बिकने वाली चीज़) बन जाता है। पुलिस उसे एक ट्रॉफी की तरह दिखाती है। जेल के गैंग उसे एक एसेट (फायदेमंद चीज़) की तरह इस्तेमाल करते हैं। ज़िंदा रहने के लिए किसी न किसी गैंग का हिस्सा बनना ज़रूरी होता है और समर को एक ऐसी चीज़ की तरह इधर-उधर किया जाता है जिसका मालिक बदल रहा हो।
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