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गिद्धों की घटती संख्या पर बड़ी पहल: राजस्थान और एमपी की गौशालाओं ने बदली व्यवस्था

गिद्धों की घटती संख्या पर बड़ी पहल

भारत में लंबे समय से गिद्धों की संख्या तेजी से घटती जा रही है। खासतौर पर लंबी चोंच वाले गिद्ध, जिन्हें जटायु भी कहा जाता है, विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुके हैं। बीते कुछ दशकों में इनकी आबादी में करीब 99 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई थी। इसकी सबसे बड़ी वजह मवेशियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली कुछ दर्द निवारक दवाएं मानी गईं, जो गिद्धों के लिए बेहद घातक साबित हुईं।

हालांकि अब राहत की खबर यह है कि राजस्थान और मध्य प्रदेश की कई गौशालाओं ने गिद्धों के संरक्षण के लिए अहम कदम उठाए हैं, जिससे उनकी संख्या में धीरे-धीरे सुधार देखने को मिल रहा है।

जहरीली दवाएं बनी थीं गिद्धों की मौत की वजह

गिद्ध आमतौर पर मृत मवेशियों के शवों को खाकर अपना भोजन पूरा करते हैं। लेकिन जब इन मवेशियों को कुछ खास नॉन-स्टेरॉयडल पेनकिलर दवाएं दी जाती हैं, तो उनके अवशेष शव में मौजूद रहते हैं। ऐसे शवों को खाने से गिद्धों की किडनी पर गंभीर असर पड़ता है, जिससे उनकी मौत हो जाती है।

इसी कारण बीते वर्षों में गिद्धों की संख्या में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई थी, जिसने पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को भी नुकसान पहुंचाया।

गौशालाओं ने बदली दवा और निपटान की प्रक्रिया

राजस्थान और मध्य प्रदेश की कई गौशालाओं ने अब गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का इस्तेमाल पूरी तरह बंद कर दिया है। उनकी जगह ऐसी दवाओं को अपनाया गया है, जो मवेशियों के लिए सुरक्षित होने के साथ-साथ गिद्धों को नुकसान नहीं पहुंचातीं।

इसके साथ ही मृत मवेशियों के निपटान की प्रक्रिया में भी बड़ा बदलाव किया गया है। पहले जहां शवों को जमीन में दफना दिया जाता था, वहीं अब उन्हें तय स्थानों पर छोड़ा जा रहा है, ताकि गिद्ध प्राकृतिक रूप से भोजन प्राप्त कर सकें।

कुछ इलाकों में दिख रहा है सकारात्मक असर

इन प्रयासों का असर अब जमीन पर दिखने लगा है। राजस्थान के कुछ हिस्सों और मध्य प्रदेश के चुनिंदा क्षेत्रों में गिद्धों की संख्या में स्थिरता आई है और कई जगहों पर धीरे-धीरे बढ़ोतरी भी दर्ज की जा रही है। ये इलाके अब स्थानीय और प्रवासी गिद्धों के लिए सुरक्षित आवास के रूप में उभर रहे हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इसी तरह दवाओं के उपयोग और शव निपटान की प्रकृति-अनुकूल व्यवस्था जारी रही, तो आने वाले वर्षों में गिद्धों की आबादी में और सुधार संभव है।

पर्यावरण के लिए क्यों जरूरी हैं गिद्ध

गिद्ध पर्यावरण के प्राकृतिक सफाईकर्मी माने जाते हैं। ये मृत जानवरों के शवों को खाकर बीमारियों के फैलाव को रोकते हैं और पारिस्थितिकी संतुलन बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। गिद्धों की कमी से न सिर्फ पर्यावरण प्रभावित हुआ, बल्कि कई पारंपरिक सामाजिक और धार्मिक व्यवस्थाओं पर भी असर पड़ा।

संरक्षण की दिशा में उम्मीद

गिद्धों को बचाने के लिए चल रहे संरक्षण प्रयासों के तहत हाल के महीनों में संरक्षण केंद्रों में पाले गए गिद्धों को प्राकृतिक आवासों में छोड़ा गया है। इससे यह उम्मीद जगी है कि आने वाले समय में भारत में गिद्धों की आबादी दोबारा मजबूत हो सकती है।

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