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भारत और EU के बीच ट्रेड डील के बाद अमेरिका पलटा, कहा, ‘भारत को टैरिफ में राहत नहीं’

india eu deal

Trade Deal : भारत और यूरोपीय यूनियन (EU) के बीच हुए ट्रेड डील से अमेरिका नाराज हो गया है लेकिन अपनी नाराजगी को सीधे तौर पर ना दिखाकर अप्रत्यक्ष रुप से जाहिर कर रहा है। अमेरिका ने पहले कहा था कि भारत को टैरिफ में राहत मिल सकती है लेकिन अब अमेरिकी प्रशासन का बयान आया है कि भारत को टैरिफ में राहत नहीं मिलेगी। भारत और EU के बीच व्यपारिक समझौते के बाद आई अमेरिका की प्रतिक्रिया काफी सख्त रही है. ट्रंप प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा है कि भारत को अमेरिका की ओर से टैरिफ में फिलहाल कोई राहत नहीं मिलने वाली है. एक इंटरव्यू में ग्रीर ने कहा कि रूस से तेल खरीद को लेकर अमेरिका की चिंताएं अभी खत्म नहीं हुई है, भारत ने रूसी तेल की खरीद में कुछ कमी जरूर की है, लेकिन पूरी तरह इससे अलग होना अभी संभव नहीं है. ग्रीर ने कहा कि रूस से मिलने वाला सस्ता तेल भारत के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद है और इसी वजह से भारत के लिए इस सप्लाई को तुरंत छोड़ना आसान नहीं है.

रूसी तेल पर बदला अमेरिका का रुख

ट्रंप प्रशासन के व्यापार प्रतिनिधि ग्रीर का बयान अमेरिका के पहले के बयानों से अलग दिखाई दे रहा है. इससे पहले ट्रंप प्रशासन की ओर से यह कहा गया था कि भारत ने रूस से तेल खरीद लगभग बंद कर दी है. खुद राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी इस तरह के बयान दे चुके हैं. हाल ही में दावोस इकोनॉमिक फोरम के दौरान अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने संकेत दिया था कि भविष्य में भारतीय उत्पादों पर लगने वाले टैरिफ में कुछ राहत मिल सकती है. लेकिन अब जेमिसन ग्रीर के ताजा बयान से यह साफ हो गया है कि अमेरिका फिलहाल भारत पर दबाव बनाए रखना चाहता है.

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क्यों ऐतिहासिक है भारत-ईयू मुक्त व्यापार समझौता

भारत और EU के बीच इस मुक्त व्यापार समझौते पर कई वर्षों से बातचीत चल रही थी. इस समझौते से भारत को यूरोपीय बाजारों तक बेहतर एक्सेस मिलेगा, जिससे निर्यात बढ़ने, विदेशी निवेश आने और रोजगार के नए अवसर बनने की उम्मीद है. EU पहले से ही भारत के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों में शामिल है. यह डील दोनों पक्षों के बीच व्यापारिक शुल्क को कम करेगी, सप्लाई चेन को मजबूत बनाएगी और तकनीक, मैन्युफैक्चरिंग व ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में सहयोग को बढ़ावा देगी. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे भारत को चीन पर निर्भरता कम करने और खुद को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब के रूप में स्थापित करने में मदद मिलेगी.

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