Royal Men Fashion: अस्सी के दशक में भारतीय पुरुषों के त्योहारों के अवसर पर पहने जाने वाले कुर्ते की आस्तीनों पर गिल्हा डिजाइन होता था। आज भले ही पुरुष डिजाइनर चिकनकारी या सिल्क के कुर्तों के दीवाने हों, लेकिन पुराने समय में सादे मलमल के सफेद कुर्ते में जो शान थी, उसकी बात ही कुछ और थी। कुर्ते की कलाई के पास हाथों से बनाई जाने वाली वो खास क्रीज, जिसे ‘गिल्हा’ कहा जाता था, उसके बिना हर बड़ी महफिल फीकी मानी जाती थी. अगर आप भी मॉडर्न ट्रेंड्स से हटकर भारत के समृद्ध और Royal Men Fashion हिस्ट्री को जानिए
आखिर क्या है यह ‘गिल्हा’ फैशन?
Royal Men Fashion- सरल शब्दों में कहें तो ‘गिल्हा’ कुर्ते की आस्तीन (बांह) के कफ या कलाई के पास कपड़े को मोड़कर बनाई जाने वाली बेहद बारीक और खास किस्म की चुन्नटें या क्रीज (ब्तमंेमे) होती थीं. यह कोई रेडीमेड सिलाई नहीं थी, बल्कि इसे धोने और सुखाने के बाद एक खास कारीगरी के जरिए बिठाया जाता था. पुराने जमाने में, विशेष रूप से ईद, होली, या शादियों के मौके पर जब मर्द मलमल या महीन सूती (कॉटन) का चमचमाता सफेद कुर्ता पहनते थे, तो धोबी बाजू के कपड़े को अंगूठे और एक खास चीज की मदद से त्रिकोणीय या लहरदार आकार में मोड़कर सेट करते थे. इसके बाद उस पर भारी पीतल की इस्तरी चलाई जाती थी, जिससे वे चुन्नटें ऐसी कड़क हो जाती थीं कि हाथ हिलाने पर भी अपनी जगह से नहीं हिलती थीं. आस्तीन पर बनी इसी खूबसूरत कड़क डिजाइन को ‘गिल्हा’ या ‘गिल्हा डालना’ कहा जाता था।
स्टेटस सिंबल था ‘गिल्हा’
Royal Men Fashion-उस दौर में बिहार बंगाल में हर कोई अपने कुर्ते पर गिल्हा नहीं बनवा पाता था. इसके पीछे की वजह थी इसे बनाने में लगने वाली मेहनत और समय. गिल्हा बैठाने के लिए कुर्ते को पहले अरारोट (कंजी/कलफ) लगाकर कड़क सुखाया जाता था. इसके बाद धोबी ही इस हुनर में माहिर होते थे जो उंगलियों के जादू से यह डिजाइन उकेरते थे. यही वजह थी कि गिल्हा लगा कुर्ता पहनना रईसी और नजाकत का प्रतीक माना जाता था।
वक्त के साथ धुंधला गया यह Royal Men Fashion ट्रेंड
आज के रेडीमेड और ‘वॉश एंड वियर’ कपड़ों के दौर में हम गिल्हा जैसे खूबसूरत फैशन को भूल चुके हैं. आज न तो ऐसे धोबी रहे जो अरारोट के कलफ के साथ उंगलियों से वो लहरदार क्रीज बना सकें, और न ही भागदौड़ भरी जिंदगी में किसी के पास इतना वक्त है. लेकिन, बुजुर्गों की अलमारियों में आज भी अगर कोई पुराना मलमल का कुर्ता मिल जाए, तो उसकी आस्तीनों की फीकी पड़ चुकी सिलवटों में बंगाल की इस कला के उस सुनहरे दौर की खुशबू आज भी महसूस की जा सकती है।
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