Sanskaar : आज की भागदौड़ भरी जिंदगी और मॉडर्न लाइफस्टाइल में हम अपनी जड़ों को भूलते जा रहे हैं। लेकिन हाल के वर्षों में ग्लोबल स्तर पर प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति को लेकर उत्सुकता बढ़ी है। रिसर्च की मानें तो लोग अब केवल धार्मिक आस्था के लिए नहीं, बल्कि इनके पीछे छिपे विज्ञान और मनोविज्ञान को समझने के लिए 16 संस्कारों के बारे में सर्च कर रहे हैं। ऋषि वेदव्यास के अनुसार, जिस प्रकार एक गंदे लोहे को तपाकर और पीटकर शुद्ध व कीमती अस्त्र बना दिया जाता है, ठीक उसी प्रकार ये 16 संस्कार किसी साधारण मनुष्य को सुसंस्कृत और समाज के लिए उपयोगी बनाते हैं।
16 संस्कारों की पूरी सूची और उनका वैज्ञानिक महत्व
हमारे शास्त्रों (विशेषकर गौतम गृह्यसूत्र और मनुस्मृति) में इन संस्कारों को जीवन के चार मुख्य चरणों में बांटा गया है – गर्भावस्था के संस्कार, बाल्यकाल के संस्कार, शिक्षा (विद्यार्थी) जीवन के संस्कार और वयस्क/गृहस्थ जीवन के संस्कार।
1. गर्भाधान संस्कार
यह जीवन का पहला संस्कार है। इसका उद्देश्य वासना पूर्ति नहीं, बल्कि एक श्रेष्ठ, मानसिक रूप से स्वस्थ और सदाचारी संतान को जन्म देना है। माता-पिता के शुद्ध विचार गर्भस्थ शिशु की नींव रखते हैं।
2. पुंसवन संस्कार
गर्भधारण के तीसरे या चौथे महीने में यह संस्कार होता है। वैज्ञानिक दृष्टि से इस समय गर्भ में शिशु का मस्तिष्क विकसित होना शुरू होता है। इस संस्कार के जरिए मां को शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत किया जाता है ताकि मिसकैरेज (गर्भपात) न हो।
3. सीमन्तोन्नयन संस्कार
गर्भ के छठे या आठवें महीने में मां को प्रसन्न रखने के लिए यह संस्कार होता है। इसे आज की भाषा में श्गोद भराईश् भी कहते हैं। इस समय शिशु मां की आवाज और संगीत सुनने लगता है, इसलिए मां को सकारात्मक माहौल दिया जाता है।
4. जातकर्म संस्कार
शिशु के जन्म लेते ही यह संस्कार होता है। इसके तहत पिता नवजात शिशु को शहद और घी चटाता है और उसके कान में वेदमंत्र बोलता है। गूगल फैक्ट आधुनिक विज्ञान भी मानता है कि मां के दूध से पहले शहद चटाने से बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और स्वर्ण प्राशन (सोने की भस्म के साथ) से बुद्धि प्रखर होती है।
5. नामकरण संस्कार
जन्म के 11वें या 12वें दिन बच्चे का नाम रखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, नक्षत्रों की गणना करके ऐसा नाम रखा जाता है जिसका ध्वनि विज्ञान बच्चे के व्यक्तित्व पर सकारात्मक प्रभाव डाले।
6. निष्क्रमण संस्कार
जन्म के चौथे महीने में बच्चे को पहली बार घर से बाहर निकालकर सूर्य और चंद्रमा के दर्शन कराए जाते हैं। वैज्ञानिक नजरिए से, इस उम्र तक बच्चे की आंखें बाहरी रोशनी और पंचभूतों (प्रकृति) को सहने के लिए तैयार हो जाती हैं, जिससे उसे विटामिन डी और शुद्ध हवा मिलती है।
7. अन्नप्राशन संस्कार
छठे महीने में बच्चे को पहली बार अन्न (जैसे खीर या दलिया) खिलाया जाता है। चिकित्सा विज्ञान (च्मकपंजतपबे) भी यही मानता है कि 6 महीने तक केवल मां का दूध और उसके बाद बच्चे का पाचन तंत्र ठोस अन्न पचाने के योग्य हो जाता है।
8. चूड़ाकर्म या मुंडन संस्कार
पहले या तीसरे वर्ष में बच्चे के सिर के बाल पहली बार मुंडवाए जाते हैं। गर्भ के बाल हटाने से सिर की नसें सक्रिय होती हैं, बौद्धिक विकास तेज होता है और गर्मियों में बच्चे का सिर ठंडा रहता है।
9. कर्णवेध संस्कार
बच्चे के कान छेदे जाते हैं। एक्यूपंक्चर (।बनचनदबजनतम) विज्ञान के अनुसार, कान के निचले हिस्से में एक ऐसा बिंदु होता है जो मस्तिष्क की नसों और आंखों की रोशनी से जुड़ा होता है। कान छेदने से हर्निया जैसी बीमारियों से बचाव होता है और पुरुषों में अंडकोष की सुरक्षा होती है।
10. उपनयन या यज्ञोपवीत संस्कार
इसे जनेऊ संस्कार भी कहते हैं। इसके बाद बच्चा श्द्विजश् (दूसरा जन्म) कहलाता है और विद्या ग्रहण करने योग्य बनता है। हृदय के पास से गुजरने वाला यह धागा ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने में मदद करता है।
11. वेदारंभ संस्कार
उपनयन के तुरंत बाद गुरु के सानिध्य में वेदों और ज्ञान की शिक्षा शुरू होती है ताकि बच्चा आत्मनिर्भर और संस्कारी नागरिक बन सके।
12. केशांत संस्कार
गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने पर लगभग 16 वर्ष की आयु में ब्रह्मचर्य की समाप्ति के प्रतीक स्वरूप पहली बार दाढ़ी-मूंछ का मुंडन किया जाता था।
13. समावर्तन संस्कार
इसे आज का श्दीक्षांत समारोहश् (ळतंकनंजपवद) कह सकते हैं। गुरुकुल की शिक्षा पूरी होने पर शिष्य गुरु को गुरुदक्षिणा देकर वापस अपने घर लौटता था।
14. विवाह संस्कार
यह जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार माना गया है। इसके जरिए मनुष्य ब्रह्मचर्य से गृहस्थ आश्रम में प्रवेश करता है। यह केवल दो शरीरों का नहीं, बल्कि दो आत्माओं का मिलन है, जिससे सृष्टि का चक्र आगे बढ़ता है।
15. आवसथ्याधान या वानप्रस्थ संस्कार
उम्र के ढलने पर (लगभग 50 वर्ष के बाद) व्यक्ति सांसारिक मोह-माया छोड़कर समाज सेवा और ईश्वर भक्ति की ओर कदम बढ़ाता है।
16. अंत्येष्टि संस्कार
यह जीवन का अंतिम यानी 16वां संस्कार है। मृत्यु के बाद मृत शरीर को अग्नि को समर्पित किया जाता है, जिससे पंचतत्वों (क्षिति, जल, पावक, गगन, समीरा) से बना शरीर वापस उन्हीं तत्वों में विलीन हो जाता है। सनातन धर्म के ये 16 संस्कार अंधविश्वास नहीं, बल्कि पूरी तरह से एक सुव्यवस्थित जीवन जीने की साइंटिफिक गाइडबुक हैं। जन्म से पहले की मानसिक स्थिति से लेकर मृत्यु के बाद तक, हर मोड़ पर समाज और मनुष्य को संतुलन में रखना ही इन संस्कारों का असली उद्देश्य है।
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