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AIMIM की चुनावी सफलता, मुस्लिम वर्ग की बदलती सोच या दलों को संकेत

AIMIM

Jaipur : महाराष्ट्र निकाय के चुनावों के नतीजों में AIMIM की सफलता ने सबको चौंकाया है खासकर राजनीतिक दलों को। इस सफलता से सवाल खडा हुआ है कि क्या मुस्लिम वर्ग की सोच बदल रही है या राजनीतिक दलों को मुस्लिम वर्ग ने ही संकेत दिया है।

देश की राजनीति ने जब 2014 में करवट ली तो मुस्लिम वर्ग के सामने एक सवाल खडा हुआ कि अब उसके मतों का क्या महत्व रह जाएगा। यह सवाल धीरे धीरे गहराता गया जैसे जैसे देश में हिन्दुत्व की लहर आगे बढती गई। ऐसे में जब मुस्लिम नेतृत्व की जगह खाली थी तब हैदराबाद के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने देश में मुस्लिम वर्ग के नेतृत्व करने की क्षमता को उभारा। उनकी पार्टी AIMIM ने 2014 में तेलंगाना की विधानसभा की सात सीटें जीतकर राज्य पार्टी के रुप में उभरी फिर बिहार में पांच सीटें और अब महाराष्ट्र में निकाय चुनावों में अच्छा प्रदर्शन कर देशव्यापी पहचान बना चुकी है। महाराष्ट्र के निकाय चुनावों में ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM ) द्वारा 125 वार्डाे में विजयी हासिल करना यह दर्शाता है कि मुस्लिम वोट जो कल तक कांग्रेस या समाजवादी पार्टी या बसपा या कहीं कहीं भाजपा को भी जाता था अब धीरे धीरे ‘अपनों को’ जाने लगा है। यह सही है कि AIMIM ने कभी भी खुद को सिर्फ मुसलमानों की पार्टी नहीं माना बल्कि उनका दावा रहा है कि कई जगहों पर उन्होने हिन्दू वर्ग से भी उम्मीदवारों को टिकट दिया है। लेकिन यह भी सच है कि AIMIM के सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने सिर्फ मुस्लिम मामलों को ही पुरजोर तरीके से संसद के अंदर और बाहर उठाया है। हिन्दू वर्ग में भी ओवैसी मुस्लिम समुदाय के नेता के रुप में माने जाते हैं, कुछ समय पहले तक ओवैसी की छवि हिन्दू वर्ग में एक कट्टरपंथी मुस्लिम नेता तथा साम्प्रदायिक नेता की छवि बनी हुई थी लेकिन कश्मीर के पहलगाम हमले और उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के समय जिस तरह से ओवैसी ने पाकिस्तान के खिलाफ बयान दिए और पीएम मोदी द्वारा पाक के खिलाफ खाडी देशों में भेजे गए शिष्टमण्डल में शामिल हुए उससे उनके प्रति सोच बदली है और आज अनेक हिन्दू ओवैसी के समर्थक हो गए हैं।

महाराष्ट्र के निकाय चुनाव हों या उससे पहले बिहार विधानसभा में पांच सीटों पर AIMIM को पांच सीटें मिलीं वहां सिर्फ शत प्रतिशत मुस्लिम वोट ही मिले हों ऐसा नहीं हो सकता लेकिन इतना जरुर है कि ओवैसी को जाने वाले वोट कांग्रेस, सपा, बसपा, एनसीपी को जा सकते थे जिनसे विपक्ष की सीटें बढ सकती थीं। अगर हम देखें तो पिछले बारह सालों में AIMIM ने हैदराबाद से निकल कर देश के विभिन्न राज्यों में जिस तरह से अपनी पहचान बनाई और ओवैसी के जोशीले भाषण वायरल हुए उससे मुस्लिम वर्ग में विशेषकर युवा बहुत प्रभावित हुए हैं। धीरे धीरे यह प्रभाव इतना बढा है कि मुस्लिम बहुल्य क्षेत्रों में AIMIM की उपस्थिती दिखाई दी और अब मुस्लिम वर्ग का वोट उनकी तरफ मुडता दिख रहा है। मुस्लिम वर्ग का यूं एआईएमआईएम की तरफ धीरे धीरे खिसकना देश की धर्मनिरपेक्ष पार्टीयों के लिए खतरे की घंटी है जो उन्हे समय रहते सुन लेना चाहिए। मुस्लिम वर्ग को सिर्फ वोट बैंक समझ लेना या अपनी जेब में होना मान लेना अब गलत होगा। तो क्या अब मुस्लिम वर्ग को विकल्प मिल रहा है। यह कहना जल्दबाजी भी होगी क्योंकि अभी भी राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, उत्तराखंड जैसे राज्यों में भाजपा और कांग्रेस के बीच ही मुकाबला होता रहा है और मुस्लिम वर्ग का मत प्रतिशत एक या दो प्रतिशत भाजपा को तो 98 प्रतिशत मत कांग्रेस को जाता रहा है। अब एआईएमआईएम के बढते कदम, मुस्लिम वर्ग की सोच में आ रहा बदलाव को राजनीतिक पार्टीयों खासकर विपक्षी पार्टीयों को समझना होगा।

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AIMIM की महाराष्ट्र में सफलता

ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) ने महाराष्ट्र के नगर निकाय चुनावों में अपेक्षा से बेहतर नतीजे दर्ज किए हैं। पार्टी ने 13 नगर निगमों में 125 वॉर्डों में जीत हासिल की है, जो पिछले नगर निगम चुनावों में जीते गए 56 वॉर्डों की तुलना में कहीं अधिक है। यह महाराष्ट्र में हैदराबाद आधारित पार्टी का अब तक का सबसे मज़बूत प्रदर्शन है। कई नगर निकायों में एआईएमआईएम ने समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना जैसी स्थापित पार्टियों को पीछे छोड़ दिया है। पार्टी ने 15 जनवरी को हुए चुनावों में 29 में से 24 नगर निगमों में अपने उम्मीदवार उतारे थे। महाराष्ट्र में एआईएमआईएम ने पहली बार 2012 के नांदेड़ नगर निगम चुनावों में चुनावी सफलता दर्ज की थी, जब उसने 81 सदस्यीय नगर निगम में 11 सीटें जीतकर तेलंगाना के बाहर किसी राज्य में अपनी पहली जीत दर्ज की थी.

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