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यूनाइटेड नेशंस ने दुनिया का नक्शा बदला, भारत ने किया समर्थन, अमेरिका ने किया विरोध

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World Map : संयुक्त राष्ट्र महासभा ने ऐतिहासिक प्रस्ताव पास किया है जिसके मुताबिक दुनिया का नक्शा अब कुछ बदला नजर आएगा। इसे लेकर भारत ने भी प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया। अमेरिका प्रस्ताव के खिलाफ वोट करने वाला अकेला देश रहा। इस फैसले से देशों और महाद्वीपों के क्षेत्रफल पर कोई असर नहीं पड़ेगा, बस इनका आकार पहले से थोड़ा छोटा या बड़ा दिख सकता है।

अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध क्यों किया?

संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने वोट दिया, जबकि 6 देश वोटिंग से दूर रहे। अमेरिका ने इस पहल की कड़ी आलोचना की। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सेविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की असली समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए, न कि 16वीं सदी के नक्शे को बदलने जैसी बहस पर। उन्होंने इसे एक वैचारिक एजेंडा बताया और कहा कि ऐसी बहसों की वजह से संयुक्त राष्ट्र अपनी विश्वसनीयता खो रहा है। वहीं, अफ्रीकी संघ ने इस फैसले का स्वागत किया। उसने दुनिया के नए नक्शे को ज्यादा सटीक और बराबरी वाला बनाने की दिशा में ऐतिहासिक कदम बताया।

मर्केटर वल्ड मैप था अब इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन

अब तक धरती पर देशों और महाद्वीपों को दिखाने के लिए मर्केटर वर्ल्ड मैप का उपयोग किया जाता था। इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार उनके असली क्षेत्रफल से बड़ा या छोटा दिखता था। नए नक्शे का नाम इक्वल अर्थ प्रोजेक्शन है। इसमें अफ्रीका पहले से काफी बड़ा, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका छोटे नजर आएंगे। एशिया के कुछ हिस्सों का आकार भी पहले से छोटा दिखेगा।

भारत क्षेत्रफल वही, आकार बड़ा दिख सकता है

भारत की वास्तविक जमीन, अंतरराष्ट्रीय सीमाओं या क्षेत्रफल में कोई बदलाव नहीं होगा। यह बदलाव देशों की सीमाएं बदलने वाला नहीं, बल्कि नक्शे पर पृथ्वी को दिखाने का तरीका बदलने वाला है। भारत का नक्शा देखने में भी थोड़ा अलग दिख सकता है, लेकिन भारत के मामले में बदलाव बहुत बड़ा नहीं होगा। नया नक्शा क्षेत्रफल सही अनुपात में दिखाता है। पुराने नक्शे में भूमध्य रेखा के आसपास के इलाके अपने आकार से छोटे और ध्रुवों के पास के इलाके बड़े दिखते हैं। भारत भूमध्य रेखा से बहुत दूर नहीं है, इसलिए पुराने नक्शे में भी उसका आकार कुछ हद तक छोटा दिखता है।

भारत मैप के आकार में परिवर्तन

भारत की आकृति थोड़ी बदली हुई/कम खिंची हुई दिखाई दे सकती है। दूसरे देशों की तुलना में आकाररू भारत कुछ बड़ा दिखाई दे सकता है, खासकर जब उसकी तुलना यूरोप, रूस, कनाडा जैसे ज्यादा उत्तरी देशों से की जाए। जबकि अफ्रीका सबसे ज्यादा नजर आएगा, क्योंकि उसका वास्तविक आकार पुराने मर्केटर नक्शे की तुलना में बहुत बड़ा दिखाई देगा।

न्यूजीलैंड भी पुराने नक्शे से परेशान था

अफ्रीका अकेला ऐसा इलाका नहीं है जिसे पुराने नक्शे से शिकायत रही है। न्यूजीलैंड भी लंबे समय से दुनिया के नक्शे पर अपनी जगह को लेकर मजाक करता रहा है। 2018 में न्यूजीलैंड के एक पर्यटन विज्ञापन में तत्कालीन प्रधानमंत्री जैसिंडा आर्डर्न भी नजर आई थीं। इसमें मजाकिया अंदाज में दिखाया गया था कि दुनिया के कई नक्शों में न्यूजीलैंड जैसे गायब ही हो जाता है। दरअसल, मर्केटर नक्शे में न्यूजीलैंड नीचे दाईं ओर एकदम किनारे पर दिखाई देता है। कई बार नक्शे में वह पूरी तरह छूट भी जाता है। इक्वल अर्थ नक्शे के कुछ रूपों में ओशिनिया को केंद्र के करीब लाया जाता है। इससे ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों की स्थिति भी ज्यादा प्रमुख नजर आती है।

मौजूदा नक्शे में आखिर दिक्कत क्या थी?

दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाले नक्शों में से एक मर्केटर नक्शा है। इसे यूरोपियन मैप मेकर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में बनाया था। इस नक्शे की एक बड़ी खासियत है कि यह समुद्र में रास्ता तय करने और जहाजों के नेविगेशन के लिए काफी उपयोगी है। लेकिन पूरी गोल धरती को सपाट नक्शे पर दिखाने की वजह से इसमें देशों और महाद्वीपों का आकार असल से अलग नजर आने लगता है। जैसे-जैसे कोई इलाका भूमध्य रेखा से दूर जाता है, वह नक्शे पर जरूरत से ज्यादा बड़ा दिखाई देने लगता है। यही वजह है कि उत्तरी और दक्षिणी हिस्सों के कई इलाके असल से काफी बड़े नजर आते हैं। ग्रीनलैंड इसका सबसे मशहूर उदाहरण है। मर्केटर नक्शे में ग्रीनलैंड दक्षिण अमेरिका के लगभग बराबर दिखाई देता है। लेकिन असल में दोनों के आकार में बहुत बड़ा अंतर है। ग्रीनलैंड का क्षेत्रफल करीब 22 लाख वर्ग किलोमीटर है। यह लगभग डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो के बराबर है। वहीं अफ्रीका का क्षेत्रफल करीब 3 करोड़ वर्ग किलोमीटर है। यानी अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। फिर भी मर्केटर नक्शे को देखकर दोनों का आकार लगभग एक जैसा लग सकता है। यही वह फर्क है जिसे अब कम करने की कोशिश हो रही है।

अफ्रीकी देश नक्शा बदलने की मांग क्यों कर रहे थे?

अफ्रीकी देशों का कहना है कि बात सिर्फ नक्शे पर किसी देश या महाद्वीप के छोटा-बड़ा दिखने की नहीं है। दुनिया का नक्शा यह भी तय करता है कि हम अलग-अलग हिस्सों को किस नजर से देखते हैं। यूएन प्रस्ताव में कहा गया था कि मर्केटर नक्शे में अफ्रीका का वास्तविक आकार काफी छोटा नजर आता है। लंबे समय तक ऐसी तस्वीर देखने से लोगों के मन में अफ्रीका के आकार और वैश्विक महत्व को लेकर गलत धारणा बन सकती है। प्रस्ताव में लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया का भी जिक्र है। इसमें कहा गया है कि नक्शे में इन क्षेत्रों का छोटा नजर आना उनकी विकास जरूरतों, बुनियादी ढांचे और आर्थिक क्षमता को भी कम करके आंकने की धारणा बना सकता है। अफ्रीकी देश टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डुसे ने कहा कि नक्शे सिर्फ भूगोल समझने का साधन नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा और लोगों की सोच को भी प्रभावित करते हैं। यह प्रस्ताव टोगो ने पेश किया था और इसे अफ्रीकी संघ का समर्थन मिला।

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