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जानें क्या है हमारी सांसो की लय के पीछे का गहन विज्ञान?

Breathing with nature

Breath : दुनिया में आने पर हर इंसान पहले गहरी सांस लेता है और अपने आखिरी वक्त में सांस को छोडता है। दोनों सांसों के बीच जिंदगी चलती है । यह भी बहुत अजीब बात है कि जिन सांसों को लेकर हम अपनी उम्र जी रहे होते हैं उसका अहसास हमें तभी होता है जब हम दौड़ रहे होते हैं और सांस फूल जाती है।

सांस जीवन की उर्जा

सांस हमारे जीवन ऊर्जा का सबसे महत्वपूर्ण स्रोत है. यह थोड़े ही समय में हमारे शरीर को ऊर्जावान और मन को शांत करने में सहायता करती है. सांस और मन में गहरा संबंध है. जब सांस अस्थिर होती है, तब मन भी अस्थिर होता है. जब सांस निश्चल होती है, तब मन भी शांत हो जाता है.

सांसों की लय

अगर गौर करेंगे तो पाएंगे कि कुदरत में एक लय है. ऋतुओं की अपनी एक लय है. इसी प्रकार हमारे शरीर की भी एक लय है. आपने ध्यान दिया होगा कि आपको एक निश्चित समय पर भूख लगती है और निश्चित समय पर नींद आती है. इसी तरह हमारी सांस की भी एक लय होती है. हर भावना के साथ सांस की एक विशेष लय जुड़ी होती है. उदाहरण के लिए जब आप प्रसन्न होते हैं और किसी फूल की सुगंध लेते हैं, तो आपकी सांस लेने की प्रक्रिया धीमी, स्थिर और प्रगाढ़ होती है और बाहर जाने वाली सांस छोटी, सहज और प्रयासरहित हो जाती है जैसे वह अस्तित्व में विलीन हो रही हो. इसके विपरीत, जब आप निराश या खिन्न होते हैं, तो बाहर निकलने वाली सांस अधिक प्रबल और तीव्र हो जाती है.

भावनाओं और चंचल मन को कैसे संभालें

जीवन भर आपसे कहा गया है कि क्रोध न करें, दुःखी न हों, परन्तु स्कूल, कॉलेज , घर या समाज में हमें कहीं भी यह नहीं सिखाया जाता है कि अपनी भावनाओं और चंचल मन को कैसे संभालें. आप अपनी भावनाओं को प्रत्यक्ष रूप से नहीं बदल सकते किन्तु आप अपनी श्वास की लय को परिवर्तित कर सकते हैं और फिर भावनाएं स्वतः ही उसका अनुसरण करने लगती हैं.

मन को नियंत्रित कर सकते हैं

सांस शरीर और मन के मध्य की कड़ी है. जब भावनाएं उद्वेलित होती हैं, तो सांस अनियमित हो जाती है. जब सांस लयबद्ध होती है, तो भावनाएं स्थिर हो जाती हैं. सांस को लयबद्ध करके आप मन को नियंत्रित कर सकते हैं और यही कारण है कि प्राणायाम और सुदर्शन क्रिया जैसे श्वसन अभ्यासों को सीखना अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी है.

सुखद अनुभूति

वैज्ञानिक कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति प्रतिदिन लगभग दस हजार लीटर वायु को सांस के द्वारा ग्रहण करता है. नब्बे प्रतिशत विषाक्त पदार्थ हमारी सांस के माध्यम से बाहर जाते हैं और फिर भी हम अपने फेफड़ों की क्षमता का केवल 30 प्रतिशत ही उपयोग करते हैं. प्राणायाम के नियमित अभ्यास से हमारे फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, विषैले तत्व बाहर निकलते हैं, भीतर से एक सुखद अनुभूति उत्पन्न होती है, मन स्पष्ट हो जाता है, और आप हल्का तथा ऊर्जावान अनुभव करते हैं. यह प्रत्यक्ष ज्ञान, अवलोकन, अभिव्यक्ति और हमारे सोचने के ढंग में सुधार करता है.

भीतर की चेतना

जब आप आभामंडल (ऑरा) का अध्ययन करते हैं, तो आप देखते हैं कि हर रोग पहले सूक्ष्म स्तर पर अथवा प्राणिक शरीर में उत्पन्न होता है, फिर स्थूल शरीर में प्रकट होता है. ऐसा कहा जाता है कि आपके शारीरिक रूप से अस्वस्थ होने से छह माह पूर्व ही यह आपके प्राणिक शरीर या आपके आभा मंडल में दिखाई देने लगती है. प्राणायाम ‘प्राण’ के आयाम पर कार्य करता है. यह आपके चारों ओर की ऊर्जा को शुद्ध करता है. यह आपके भीतर की चेतना को उन्नत करता है और उस प्रकाश पर पड़े आवरण को क्षीण करता है जो आपका आत्म है.

प्राण-ऊर्जा के स्तर में वृद्धि

प्राण या ‘जीवन-शक्ति’ ऊर्जा हमारे मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है. जब प्राण का स्तर गिरता है, तो मन नकारात्मकता और अवसाद के प्रति संवेदनशील हो जाता है. जब प्राण-ऊर्जा के स्तर में वृद्धि होती है तो नकारात्मक विचार स्वतः ही विलीन होने लगते हैं. हम स्वाभाविक रूप से बेहतर अनुभव करने लगते हैं, रचनात्मक रूप से सोचने लगते हैं और अपनी भावनाओं तथा विचारों पर बेहतर नियंत्रण प्राप्त करते हैं.

सांस में बहुत से रहस्य

हमारी सांसमें बहुत से रहस्य छिपे हैं, जिनमें से अधिकांश का हमने अभी तक उपयोग नहीं किया है. यह एक अत्यंत सूक्ष्म और रोचक विज्ञान है. दाहिनी नासिका को सूर्य-नाड़ी और बाईं-नासिका को चंद्र नाड़ी से जोड़ा जाता है. जीवन के विभिन्न कार्य इन नाड़ियों द्वारा संचालित होते हैं. बाईं नासिका मस्तिष्क के दाहिने हिस्से को सक्रिय करती है और दाहिनी नासिका बाएं हिस्से को. जब सांस का प्रवाह दोनों नासिकाओं में संतुलित होता है, तो मस्तिष्क की तरंगें संतुलित हो जाती हैं और अंतःस्रावी ग्रंथियाँ अधिक प्रभावी ढंग से कार्य करने लगती हैं.

बेहतर पाचन और पूर्ण निष्कासन

जब दाहिनी नाड़ी सक्रिय होती है, तो आप बातों को बेहतर ढंग से ग्रहण कर सकते हैं और आपकी समझ अधिक स्पष्ट हो जाती हैं. जब दाहिनी नासिका कार्य कर रही हो, तब भोजन करना बेहतर पाचन और पूर्ण निष्कासन में सहायता करता है, जिससे शरीर हल्का और स्थिर अनुभव करता है. नींद भी श्वास के प्रवाह से प्रभावित होती है. जब कोई बाईं करवट सोता है, जिससे दाहिनी नासिका सक्रिय रहती है, तो नींद अधिक गहरी और स्फूर्तिदायक होती है, जिससे जागने पर व्यक्ति ऊर्जावान रहता है.

ध्यान और प्रार्थना

सांस की गति सूर्याेदय, चंद्रोदय और ब्रह्मांडीय चक्रों जैसी प्राकृतिक लयों से निकट रूप से जुड़ी हुई है. योगियों ने इस संबंध को समझकर सांस को नियंत्रित करने के सरल उपाय विकसित किए हैं. जब दोनों नासिकाएं एक साथ कार्य करती हैं, तो मन स्वाभाविक रूप से अंतर्मुखी हो जाता है. यह ध्यान और प्रार्थना के लिए उपयुक्त समय होता है. योग में वर्णित अनुलोम-विलोम और नाड़ी-शोधन प्राणायाम सूक्ष्म ऊर्जा तंत्र को संतुलित कर प्राण के प्रवाह को सुगम बनाते हैं. दोनों नासिकाओं से बारी-बारी से सांस लेने से पूरा तंत्र शुद्ध होता है, नई ऊर्जा का संचार होता है और तनाव स्वाभाविक रूप से दूर हो जाता है.

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