Haridwar : हरिद्वार गंगा किनारे बसा एक पवित्र शहर है जहां देश भर से श्रद्धालु तीर्थ यात्रा करने के लिए आते हैं. हरिद्वार में संवत के पहले दिन से होने वाले नवरात्रि से लेकर अक्षय तृतीया, एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या, पूर्णिमा आदि सभी शुभ तिथियां समेत गंगा दशहरा और गंगा सप्तमी आदि पर्वों पर देशभर से आने वाले श्रदालूओं की रौनक रहती है. इन सभी पर्वों में गंगा सप्तमी के पर्व का सबसे अधिक महत्व बताया गया है. गंगा सप्तमी का पर्व वैशाख शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को होता है. इस दिन हरिद्वार हर की पौड़ी पर दीपदान के साथ गंगा आरती भी विशेष रूप से की जाती है.
हरिद्वार और गंगा सप्तमी का महत्व
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, गंगा सप्तमी पर हरिद्वार हर की पौड़ी पर विशेष समय गंगा स्नान करने का सबसे अधिक शुभ फल प्राप्त होता है. शास्त्रों की जानकारी के अनुसार हरिद्वार में अक्षय तृतीया से लेकर एकादशी, त्रयोदशी, अमावस्या, पूर्णिमा, गंगा दशहरा, गंगा सप्तमी पर बडी संख्या में लोग आते हैं। देश विदेश से श्रद्धालु मोक्ष पाने की लालसा को लेकर आते हैं. गंगा किनारे बसा हरिद्वार शहर जहां आदि अनादि काल में ब्रह्मदेव ने हजारों साल तक तपस्या की थी. इसके बाद गंगा स्वर्ग लोक से धरती लोक पर आई थी. मां गंगा भगवान शिव की जटाओं से धरती लोक पर मानव कल्याण के लिए आई थी. गोमुख से निकलकर पहाड़ों के रास्ते होती हुई समतल क्षेत्र हरिद्वार में सबसे पहले आई थी. इसलिए मां गंगा का सबसे अधिक महत्व हरिद्वार में बताया गया है.
यहां छलक कर गिरी थी अमृत की बूंदे
धार्मिक ग्रंथो में वर्णित कथाओं के अनुसार मोक्ष दायिनी मां गंगा हरिद्वार हर की पौड़ी के ब्रह्म कुंड घाट से होते हुए हरिद्वार की अनेक जगहों से होते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि राज्यों के जिलों से होकर गुजरती है. लेकिन गंगा सप्तमी का सबसे अधिक महत्व हरिद्वार में इसलिए भी बताया गया है क्योंकि यहां अमृत की बूंदे छलक कर गिरी थी. पंडित श्रीधर शास्त्री आगे बताते हैं कि धार्मिक ग्रंथो के अनुसार गंगा सप्तमी के दिन हर की पौड़ी ब्रह्मकुंड का घाट अमृत तुल्य हो जाता है, इसलिए 23 अप्रैल गुरुवार को ब्रह्म मुहूर्त 4रू02 से 5रू13 के मध्य गंगा स्नान करने पर सभी पाप खत्म हो जाएंगे और मोक्ष के द्वार खुल जाएंगे. इस दिन दान का भी महत्व होता है.



