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क्या ममता बनर्जी बदल रही हैं अपनी राजनीतिक रणनीति? चुनाव से पहले मंदिरों पर हजारों करोड़ का निवेश

क्या ममता बनर्जी बदल रही हैं अपनी राजनीतिक रणनीति?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की राजनीति को लंबे समय तक एक खास वोट बैंक से जोड़कर देखा जाता रहा है। विपक्ष लगातार उन पर तुष्टीकरण की राजनीति के आरोप लगाता रहा है। लेकिन हालिया महीनों में ममता बनर्जी के फैसलों और सरकारी प्राथमिकताओं में एक अलग ही रुख नजर आ रहा है, जिसने सियासी गलियारों में नई बहस छेड़ दी है।

दरअसल, साल 2026 में पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं और उससे पहले राज्य सरकार ने धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है। इस बदलाव को ममता बनर्जी की बदली हुई राजनीतिक रणनीति के तौर पर देखा जा रहा है।

धार्मिक और सांस्कृतिक परियोजनाओं पर बड़ा खर्च

राज्य सरकार ने हाल के वर्षों में धार्मिक स्थलों के विकास पर भारी रकम खर्च की है। गंगासागर मेले के इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं को बेहतर बनाने के लिए करीब 4000 करोड़ रुपये का निवेश किया गया। इसके अलावा, पूरे बंगाल में मंदिरों के जीर्णोद्धार और नए धार्मिक स्थलों के निर्माण पर कुल खर्च 10 हजार करोड़ रुपये से अधिक बताया जा रहा है।

दीघा में बने भव्य जगन्नाथ मंदिर पर लगभग 300 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह मंदिर ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ मंदिर की तर्ज पर विकसित किया गया है, जिसे लेकर सरकार की खूब चर्चा हो रही है।

कई प्रमुख मंदिरों का हुआ कायाकल्प

ममता सरकार के कार्यकाल में कालीघाट मंदिर का नवीनीकरण, दक्षिणेश्वर और कालीघाट स्काईवॉक, तारापीठ, कंकालीटोला, मदन मोहन मंदिर, मायापुर इस्कॉन और दार्जिलिंग के काली मंदिर जैसे कई प्रमुख धार्मिक स्थलों का विकास किया गया है।
गंगासागर मेले में देशभर से आए श्रद्धालुओं ने व्यवस्थाओं की सराहना की और कई लोगों ने इसकी तुलना कुंभ मेले जैसी सुविधाओं से की।

बाहर से आए श्रद्धालुओं का कहना है कि बंगाल सरकार अब केवल किसी एक वर्ग की नहीं, बल्कि व्यापक विकास पर ध्यान देने वाली सरकार की छवि पेश कर रही है।

पार्टी के भीतर भी सख्ती का संदेश

हाल ही में बाबरी मस्जिद से जुड़े बयान को लेकर तृणमूल कांग्रेस नेता हुमायूं कबीर पर हुई कार्रवाई को भी इसी बदली हुई रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ममता बनर्जी अब खुले तौर पर धार्मिक बयानबाजी से दूरी बनाना चाहती हैं।

सूत्रों के मुताबिक, पार्टी बैठकों में नेताओं और कार्यकर्ताओं को धार्मिक मुद्दों पर बयान देने से बचने के सख्त निर्देश दिए गए हैं, ताकि किसी भी तरह का विवाद न खड़ा हो।

सवाल भी उठ रहे हैं

हालांकि, सरकार के इस रुख पर सवाल भी खड़े हो रहे हैं। विपक्ष पूछ रहा है कि मंदिरों पर इतने बड़े पैमाने पर खर्च क्यों किया जा रहा है और क्या अन्य धार्मिक स्थलों के विकास पर भी समान ध्यान दिया जा रहा है।

ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि क्या यह बदलते जनमत को साधने की कोशिश है, या फिर ममता बनर्जी की सोच में वाकई बदलाव आया है? यह रणनीति चुनावी मजबूरी है या समावेशी विकास का संकेत—इसका जवाब आने वाला समय देगा। लेकिन इतना साफ है कि बंगाल की राजनीति अब एक नए मोड़ पर खड़ी नजर आ रही है।

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