Education News: सुप्रीम कोर्ट ने एक जनहित याचिका दायर कर नेशनल बोर्ड ऑफ एग्जामिनेशंस इन मेडिकल साइंसेज द्वारा जारी उस नोटिस को चुनौती दी गई है जिसमें NEET PG राउंड-2 काउंसलिंग के लिए जनरल कैटेगरी की कट-ऑफ 7जी पर्सेंटाइल तक और रिजर्व कैटेगरी के लिए 0जी पर्सेंटाइल तक की गई है। याचिका में कहा गया है, मेडिसिन कोई सामान्य पेशा नहीं है, यह सीधे इंसानी जिंदगी, शारीरिक अखंडता और गरिमा से जुड़ा है. जनहित याचिका दायर करने वालों ने इसे मेडिकल सीट्स की नीलामी का रास्ता खोलना बताया है।
यह जनहित याचिका समाज सेवक हरिशरण देवगन, न्यूरोसर्जन सौरभ कुमार, डॉ. लक्ष्य मित्तल (प्रेसिडेंट, यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट) और डॉ. आकाश सोनी (मेंबर, वर्ल्ड मेडिकल एसोसिएशन) ने दायर की है। इसमें बताया गया है कि विवादित नोटिस के जरिए क्वालिफाइंग कट-ऑफ को असामान्य रूप से बहुत कम स्तर तक (यहां तक कि शून्य और नेगेटिव) कर दिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में क्या है?
सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में कहा गया है, मेडिसिन कोई सामान्य पेशा नहीं है, यह सीधे इंसानी जिंदगी, शारीरिक अखंडता और गरिमा से जुड़ा है… जिस कार्रवाई पर सवाल उठाया गया है, उसे मुख्य रूप से खाली सीटों को भरने के आधार पर सही ठहराया गया है, यह मेरिट को एक मानदंड के तौर पर खत्म कर देती है, एक प्रतियोगी परीक्षा को सिर्फ एक प्रशासनिक औपचारिकता में बदल देती है, और जीवन के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्र में प्रोफेशनल्स स्टैंडर्ड में गिरावट को संस्थागत बनाती है।
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मेडिकल कॉलेज माफियाओं को फायदा देने वाला फैसला
यूनाइटेड डॉक्टर्स फ्रंट के अध्यक्ष डॉ. लक्ष्य मित्तल ने नीट पीजी की कट-ऑफ माइनस 40 नंबर तक कम करने को मरीजों की सुरक्षा के लिए खतरा बताया है। उन्होंने इस फैसले के खिलाफ एक वीडियो बनाया है। वीडियों में डॉ. लक्ष्य मित्तल ने कहा, हमने नीट-पीजी कट-ऑफ को घटाकर -40 मार्क्स करने के चौंकाने वाले फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की है। यह फैसला अचानक लिया गया नहीं लगता। यह एक पूरी योजना और एक ऐसे सिस्टम का हिस्सा लगता है जो प्राइवेट मेडिकल कॉलेज माफियाओं को फायदा पहुंचाता है।
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मेडिकल सीटों की नीलामी का रास्ता खोलने का आरोप
उन्होंने आगे कहा, यह कदम साफ तौर पर मेडिकल सीटों की नीलामी का रास्ता खोल रहा है, जहां पैसे योग्यता की जगह ले रहे हैं। नेगेटिव मार्क्स वाले डॉक्टरों को ट्रेनिंग में शामिल होने की अनुमति देना न केवल योग्यता को खत्म करता है, बल्कि मरीजों की सुरक्षा को भी खतरे में डालता है। मेडिकल शिक्षा के स्टैंडर्ड में यह गिरावट अस्वीकार्य है और इसीलिए हमने योग्यता, नैतिकता और मरीजों की जान की रक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया है।



