Harsha Richhariya: प्रयागराज महाकुंभ 2025 से मशहूर हुईं हर्षा रिछारिया लगातार चर्चाओं में बनी हुई है. भोपाल में बुधवार को मीडिया से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि पहली बात तो यह है कि यह कहना गलत होगा कि कुंभ के दौरान मैंने सनातन धर्म को ‘अपनाया’, क्योंकि सनातन धर्म को मैं क्या, कोई भी अपना ही नहीं सकता जब तक घर्म आपको न अपनाए. मैं खुद को सौभाग्यशाली मानती हूं कि मेरा जन्म इस धर्म में हुआ. तो मैं इसे ‘अपनाने’ वाली कौन होती हूं?
“आप ये चाह रहे हैं कि ये आगे न बढ़े”
हर्षा ने आगे कहा कि महाकुंभ से हमने सनातन धर्म का जो प्रचार शुरू किया था, धार्मिक आयोजनों के माध्यम से, सोशल मीडिया, युवाओं और बेटियों से जुड़कर, मैंने उस पर रोक लगाने का बात कही थी. वो इसलिए क्योंकि पिछले एक साल से मैं जो प्रयत्न कर रही थी युवाओं और बेटियों को धर्म, संस्कृति से जोड़ने की मैं जितनी भी कोशिश कर रही थी. उसे रोक दिया जा रहा था, लगातार विरोध किया जा रहा था. ये विरोध जो कुंभ से शुरु हुआ था वो अभी तक थमने का नाम नहीं ले रहा है. तो मुझे लग रहा था कि जब आप किसी बड़े पद पर बैठे हैं आप ये चाह रहे हैं कि ये आगे न बढ़े. अगर आपने ये ठान लिया तो ठीक है मैं ये जगह छोड़कर जाती हूं. ये आपका धर्म हैं,आपका रास्ता है, आपका प्रचार-प्रसार का काम है तो आप किजिए लेकिन गद्दी पर बैठकर मत किजिए, लोगों के बीच उतरकर किजिए.
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“अग्नि परीक्षा नारी के हिस्से में क्यों आती है?”
वहीं एक अन्य सवाल के जवाब में हर्षा रिछारिया ने कहा कि देखिए, यह बिल्कुल सही बात है. अगर हम मां सीता की बात करें, तो वह धरती मां की गोद से प्रकट हुई थीं. आखिर में, जब वो अग्नि परीक्षा से तंग आ गई, तब उन्होंने अग्नि परीक्षा देकर स्वंय सारे रिश्ते तोड़कर अपनी मां की गोद में चली गईं. क्योंकि अगर आप सही हो, तो आप कब तक अग्नि परीक्षा दोगे? और हर बार अग्नि परीक्षा नारी के हिस्से में क्यों आती है? क्यों उसे अपना चरित्र, अपना जीवन हर बार साबित करना पड़ता है कि वो पवित्र है? मैं मां सीता नहीं हूं मैं खुद को उनके चरणों की धुल भी नहीं मानती हूं मैं एक मामूली तुच्छ सी प्राणी हूं. मैं जितनी परीक्षा दे सकती थी जितना विरोध झेल सकती थी वो सब मैंने अपने स्तर पर किया एक साल तक. जब मुझे लगा कि मैं आगे सहन नहीं कर पाऊंगी तो मैंने उसे विराम देने के लिए सोचा.



