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“PM मोदी के इजरायल से निकलते ही अमेरिका ईरान पर हमला कर दें…” ओवैसी के बयान से हड़कंप

Asaduddin Owaisi

PM Modi Israel Visit: AIMIM चीफ असदुद्दीन ओवैसी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Narendra Modi) के इजराइल दौरे की आचोलना की है. उन्होंने सोशल मीडिया अकाउंट एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि पीएम मोदी ने फिलिस्तीन के प्रति भारत के ऐतिहासिक समर्थन के साथ विश्वासघात किया है. हो सकता है कि पीएम मोदी के इजरायली दौर खत्म होने के बाद अमेरिका, ईरान पर हमला कर दें. ओवैसी ने गाजा की स्थिति को नरसंहार करार दिया. उन्होंने लिखा कि गाजा में जो कुछ भी हो रहा है. उसे इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा. ओवैसी ने इजरायली पीएम नेतन्याहू को युद्ध अपराधी बताया. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी ने ऐसे व्यक्ति को गले लगाया है जो युद्ध अपराधी है. यह भारत की विदेश नीति के खिलाफ है. भारत हमेशा फिलिस्तीनी लोगों और उनके अधिकारों का समर्थन करता आया है. पीएम मोदी का दौरा भारत के उस लंबे समय से चले आ रहे सैद्धांतिक समर्थन के साथ सीधा धोखा है.

‘प्रधानमंत्री गलत समय पर वहां गए’
वहीं दूसरी तरफ कांग्रेस प्रवक्ता शमा मोहम्मद (Shama Mohammed) ने पीएम मोदी के इजरायल दौरे पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि जब दुनिया आपके खिलाफ होती है, तो जो वहां जाता है, वो उनका अच्छा दोस्त हो जाता है. इज़राइल डिफेंस फोर्स अभी भी लोगों को मार रहे हैं. क्या हो रहा है? वहां तो घर भी नहीं हैं. गाज़ा में बाहर से अंदर आने के लिए मना किया गया है. प्रधानमंत्री गलत समय पर वहां गए हैं. इस समय जाना नहीं चाहिए था. आपको भी पता है, सबको पता है कि नेतन्याहू वॉर क्राइम्स के लिए जिम्मेदार हैं. तो यह गलत है.

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“उनके मेज़बान का खुला बचाव था”
वहीं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश (Jairam Ramesh) ने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि कल कनेसेट में दिए गए अपने संबोधन में-जो उनके मेज़बान का खुला बचाव था प्रधानमंत्री मोदी ने इस तथ्य पर ध्यान दिलाया कि जिस दिन उनका जन्म हुआ था, उसी दिन भारत ने इजरायल को एक नए राष्ट्र के रूप में मान्यता दी थी. दरअसल, 13 जून 1947 को अल्बर्ट आइंस्टीन ने इजरायल की स्थापना के विषय पर जवाहरलाल नेहरू को पत्र लिखा था. एक महीने बाद नेहरू ने आइंस्टीन को उसका उत्तर दिया. 5 नवंबर 1949 को दोनों की मुलाकात प्रिंसटन स्थित आइंस्टीन के घर पर हुई थी.

उन्होंने आगे लिखा कि नवंबर 1952 में आइंस्टीन को इजरायल के राष्ट्रपति पद का प्रस्ताव दिया गया था, जिसे उन्होंने अस्वीकार कर दिया. अप्रैल 1955 में उनके निधन से कुछ समय पहले, आइंस्टीन और नेहरू के बीच परमाणु विस्फोटों और हथियारों के मुद्दे पर पत्रों का आदान-प्रदान भी हुआ था.

 

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