Caste Survey : राजस्थान में सामने आए जातिगत आंकड़ों की वर्ष 2008 और 2026 की तुलना को लेकर सवाल उठने लगे हैं। उपलब्ध तुलनात्मक विवरण में जाट, गुर्जर, माली, सैन-नाई और कुम्हार-प्रजापति सहित विभिन्न समाजों की संख्या में अलग-अलग बदलाव दिखाई दे रहे हैं। खास तौर पर सैन-नाई समाज की संख्या 2008 की तुलना में 2026 में कम दर्शाए जाने को लेकर सवाल खड़े किए गए हैं। ओबीसी एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य एवं ऑल इंडिया कांग्रेस ओबीसी विभाग के पूर्व नेशनल कोऑर्डिनेटर राजेन्द्र सेन ने जातिगत आंकड़ों की गणना के आधार, सर्वे की पद्धति और इसमें शामिल जातियों व उपजातियों की जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है।
सैन-नाई समाज की संख्या में 10.99 फीसदी की कमी
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2008 में सैन-नाई समाज की संख्या 9,95,968 दर्ज बताई गई थी, जबकि 2026 के आंकड़ों में यह संख्या 8,86,043 दिखाई गई है। इस हिसाब से सैन-नाई समाज की संख्या में 1,09,425 यानी करीब 10.99 प्रतिशत की कमी दिखाई देती है। राजेन्द्र सेन ने सवाल उठाया कि सामान्य रूप से आबादी बढ़ने के बावजूद सैन-नाई समाज की संख्या कम कैसे हो गई। उन्होंने पूछा कि क्या सर्वे के दौरान सैन, नाई और इस समाज से जुड़े विभिन्न उपनामों तथा समूहों को सही तरीके से दर्ज किया गया था या नहीं।
अन्य समाजों की संख्या में बढ़ोतरी
उपलब्ध तुलनात्मक विवरण के मुताबिक कई अन्य समाजों की संख्या में वर्ष 2008 से 2026 के बीच बढ़ोतरी दर्शाई गई है। माली समाज की संख्या 2008 में 22,07,057 बताई गई थी, जबकि 2026 में यह करीब 27,97,253 दिखाई गई है। इस हिसाब से करीब 5,90,196 यानी 26.74 प्रतिशत की बढ़ोतरी बनती है। कुम्हार/प्रजापति समाज की संख्या 2008 में 21,49,097 से बढ़कर 2026 में 29,97,901 दिखाई गई है। इसमें 8,48,804 यानी करीब 39.49 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज होती है। इसी तरह गुर्जर समाज की संख्या 2008 में 30,29,494 से बढ़कर 2026 में 32,68,863 और जाट समाज की संख्या 59,92,380 से बढ़कर 71,76,325 दिखाई गई है।
माली समाज के आंकड़ों की प्रस्तुति पर भी मांगा स्पष्टीकरण
राजेन्द्र सेन ने कहा कि माली समाज के आंकड़ों को लेकर भी स्थिति स्पष्ट की जानी चाहिए। उपलब्ध दस्तावेज में 2026 का एक आंकड़ा हस्तलिखित और कुछ अस्पष्ट बताया गया है। उसमें दिए गए अंतर 5,90,196 और वृद्धि दर 26.74 प्रतिशत के आधार पर संख्या करीब 27,97,253 बनती है। उन्होंने कहा कि इस आंकड़े की पुष्टि सरकारी मूल दस्तावेज से की जानी चाहिए ताकि किसी भी प्रकार का भ्रम न रहे।
जातियों और उपजातियों को शामिल करने का आधार स्पष्ट हो
सेन के मुताबिक केवल अंतिम संख्या जारी करना पर्याप्त नहीं है। यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी जाति के अंतर्गत किन उपजातियों, उपनामों और संबंधित समूहों को शामिल किया गया है। उन्होंने कहा कि यदि 2008 और 2026 में जातियों की परिभाषा या उन्हें दर्ज करने की प्रक्रिया अलग-अलग रही है तो दोनों वर्षों के आंकड़ों की सीधी तुलना करने से पहले इसका स्पष्टीकरण जरूरी है।
‘जातिगत आंकड़े सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व का आधार’
राजेन्द्र सेन ने कहा कि जातिगत आंकड़ों का सीधा संबंध सामाजिक न्याय, आरक्षण और राजनीतिक प्रतिनिधित्व जैसे महत्वपूर्ण विषयों से है। ऐसे में आंकड़ों में किसी भी तरह की त्रुटि या अस्पष्टता से विभिन्न समाजों के हित प्रभावित हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि आंकड़े पूरी तरह पारदर्शी, प्रमाणित और वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित होने चाहिए।
सरकार से स्वतंत्र जांच और पूरा डेटा सार्वजनिक करने की मांग
राजेन्द्र सेन ने सरकार से मांग की है कि 2008 और 2026 के जातिगत आंकड़ों का आधार, सर्वे की पद्धति, जातिवार मूल डेटा और प्रत्येक जाति के तहत शामिल उपजातियों एवं उपनामों की जानकारी सार्वजनिक की जाए। उन्होंने विशेष रूप से सैन-नाई समाज की संख्या में दर्शाई गई कमी की स्वतंत्र जांच कराने की मांग की। सेन ने कहा कि किसी भी समाज की संख्या कम या अधिक दिखाने के बजाय वास्तविक जनसंख्या के आधार पर सामाजिक न्याय और उचित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
आंकड़ों का सरकारी मूल दस्तावेज से सत्यापन जरूरी
उपलब्ध विवरण में कुछ आंकड़े दस्तावेज या फोटो के आधार पर सामने आए हैं। ऐसे में इन संख्याओं को अंतिम या आधिकारिक मानने से पहले संबंधित सरकारी मूल रिपोर्ट और रिकॉर्ड से सत्यापित किया जाना जरूरी है। जातिगत आंकड़ों की सटीकता और उनकी गणना की प्रक्रिया स्पष्ट होने के बाद ही इनके आधार पर किसी अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचना उचित होगा।
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