OBC Reservation :निकाय एवं पंचायत चुनावों के लिए ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की रिपोर्ट के आधार पर आरक्षण तय किए जाने के बाद ओबीसी एडवाइजरी काउंसिल के सदस्य एवं अखिल भारतीय कांग्रेस ओबीसी विभाग के पूर्व नेशनल कॉर्डिनेटर राजेन्द्र सेन ने राज्य सरकार की मंशा और आयोग की उपयोगिता पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि निकाय चुनावों में ओबीसी आरक्षण अंततः 21 प्रतिशत ही रखना था, तो आयोग के गठन, प्रदेश के लगभग 76 लाख परिवारों के सर्वे और पूरी प्रक्रिया पर करोड़ों रुपये खर्च करने का औचित्य सरकार स्पष्ट करे।
‘पहले भी 21% आरक्षण था, नया क्या मिला?’
कांग्रेस ओबीसी विभाग के पूर्व नेशनल कॉर्डिनेटर राजेन्द्र सेन ने कहा कि प्रदेश में पहले से ही ओबीसी वर्ग को 21 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा था। ऐसे में आयोग बनने के बाद भी यदि आरक्षण प्रतिशत में कोई बदलाव नहीं हुआ, तो ओबीसी समाज को इससे क्या अतिरिक्त लाभ मिला, यह सरकार को बताना चाहिए। उन्होंने कहा कि आयोग का उद्देश्य केवल आरक्षण का प्रतिशत तय करना नहीं था, बल्कि राजनीतिक रूप से वंचित ओबीसी जातियों को स्थानीय निकायों और पंचायतों में उचित प्रतिनिधित्व दिलाना भी था।
जयपुर, जोधपुर और कोटा के आंकड़ों पर उठाए सवाल
सेन ने आयोग के आंकड़ों का हवाला देते हुए कहा कि प्रदेश में ओबीसी आबादी लगभग 3.80 करोड़ बताई गई है, लेकिन इसके बावजूद जयपुर नगर निगम के 148 वार्डों में केवल 31, जबकि जोधपुर और कोटा नगर निगम के 100-100 वार्डों में केवल 21-21 वार्ड ही ओबीसी वर्ग के लिए आरक्षित किए गए हैं। उनका कहना है कि इससे ऐसा प्रतीत होता है कि पहले से लागू व्यवस्था को ही दोहराया गया है।
आयोग की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग
राजेन्द्र सेन ने राज्य सरकार से मांग की कि ओबीसी राजनीतिक प्रतिनिधित्व आयोग की पूरी रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। साथ ही यह भी बताया जाए कि सर्वे और आयोग की सिफारिशों के आधार पर किन वंचित ओबीसी जातियों को पहली बार राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला है। उन्होंने कहा कि ओबीसी समाज की वास्तविक जनसंख्या और राजनीतिक रूप से उपेक्षित जातियों की भागीदारी सुनिश्चित किए बिना सामाजिक न्याय का उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता।
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