Tel (Oil) : ईरान के साथ अमेरिका और इजराइल युद्व में दुनियाभर के देशों में तेल की कीमतें आसमान छू रही हैं। लगभग सभी जगह पेट्रोल और डीजल के दामों में बढोत्तरी हुई है। भारत में राहत की बात यह है कि यहां पेट्रोल और डीजल के दाम पिछले चार साल से नहीं बढे हैं। माना जा रहा है कि भारत के पांच राज्यों में होने जा रहे चुनावों के कारण केन्द्र सरकार ने पेट्रोल डीजल के दामों को स्थित कर रखा है हालांकि खबरें मिल रही है कि तेल कंपनियों को भारी नुकसान हो रहा है। जानकारों का कहना है कि चुनाव में बाद भारत में भी तेल और पेट्रोल के दामों में तेजी देखने को मिलेगी। जहां तक अर्थव्यवस्था की बात है तो भारत इस मामले में लगभग अकेला नहीं है. मेडागास्कर जैसे कुछ गिने-चुने देशों ने भी कीमतें स्थिर रखी हैं. लेकिन किसी बड़ी अर्थव्यवस्था ने भारत जैसा कदम नहीं उठाया. दुनिया के हालात देखें तो तस्वीर साफ है. अमेरिका, जिसके पास तेल भंडार और रिफाइनिंग क्षमता है, उसने भी कीमतें बढ़ाईं.
हर जगह तेल के दाम बढ़े
28 फरवरी को ईरान के साथ युद्ध शुरू होने के बाद से अमेरिका ने गैसोलीन (पेट्रोल) की कीमतों में 40 फीसदी तक की बढ़ोतरी की है. फरवरी में अमेरिका में रेगुलर गैसोलीन की राष्ट्रीय औसत कीमत करीब 2.94 डॉलर प्रति गैलन था, वहीं अप्रैल की शुरुआत तक ये 4.11 से 4.14 डॉलर तक पहुंच गया. पड़ोस में पाकिस्तान ने पेट्रोल की कीमत 42.7 फीसदी बढ़ाकर 458.40 पाकिस्तानी रुपए प्रति लीटर कर दी. पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री अली परवेज मलिक ने कहा कि कीमतों में यह बढ़ोतरी आपूर्ति और मूल्य निर्धारण में वैश्विक अस्थिरता के कारण हुई है.
पडोसी देशों में हालात
नेपाल और श्रीलंका भी पाकिस्तान की राह पर चले. बांग्लादेश ने चुनाव के बाद कीमतें बढ़ा दीं. ईंधन की कीमतें सिर्फ गाड़ियों तक सीमित नहीं होतीं. ये सीधे महंगाई को प्रभावित करती हैं. कच्चा तेल महंगा होता है तो उद्योगों की रफ्तार धीमी पड़ती है. सरकारों पर वित्तीय दबाव बढ़ता है. भारत जैसे देश के लिए ये और चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि यहां करीब 90 फीसदी तेल आयात होता है. चीन ने इस चुनौती को अलग तरीके से संभाला. उसने कीमतों में करीब 20 फीसदी की बढ़ोतरी की है, लेकिन उद्योगों और नागरिकों को राहत देने के उपाय भी किए है. उसने संतुलन बनाने की कोशिश की है. भारत में कीमतें स्थिर हैं, लेकिन ये मतलब नहीं कि लागत नहीं बढ़ी है. मैक्वेरी ग्रुप की एक रिपोर्ट के अनुसार, यहां सरकारी तेल कंपनियों को पेट्रोल पर 18 रुपए और डीजल पर 35 रुपए प्रति लीटर का नुकसान है. दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपए और डीजल 87.67 रुपए प्रति लीटर है. कुछ निजी कंपनियों ने हल्की बढ़ोतरी की, लेकिन सरकारी कंपनियों ने ईंधन की कीमतों को नहीं छुआ. सरकार ने इथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दिया है, ताकि आयात कम करना पड़े. इसके साथ ही एक्साइज ड्यूटी में कटौती करके कंपनियों का बोझ कम किया गया है.
चुनाव बाद होगी बढोत्तरी
चर्चा है कि सरकारी तेल कंपनियां कीमतें बढ़ाना चाहती हैं. ऐसे में सवाल है कि तेल की कीमतें बढ़ क्यों नहीं रहीं? इस सवाल का जवाब सियासी गलियारे में छिपा दिखता है. कई राज्यों जैसे कि पश्चिम बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडु और पुडुचेरी में चुनाव हो रहे हैं. 4 मई को नतीजे आने हैं. सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर व्यंग्यकार और स्तंभकार कमलेश सिंह लिखते हैं, श्श्28 अप्रैल श्टैंकफुल डेश् हैष्. वो पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव के मतदान के अंतिम दिन का ज़िक्र कर रहे हैं.
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चुनाव के मद्देनजर
चुनाव के मद्देनजर पेट्रोल-डीजल की कीमतें स्थिर रखकर बताने की कोशिश की जा रही है कि सब सरकार के नियंत्रण में है. बांग्लादेश का उदाहरण भी यही दिखाता है. वहां भी चुनाव के बाद ही कीमतें बढ़ाई गईं. वहां शनिवार (18 अप्रैल) को पेट्रोल की कीमतें 19 टका बढ़ाकर 135 टका प्रति लीटर और डीजल की कीमतें 15 टका बढ़ाकर 115 टका कर दी गईं. भारत ने उसे डीजल सप्लाई कर मदद भी की, लेकिन वहां लोगों को पेट्रोल के लिए घंटों कतार में लगना पड़ा. भारत ने अपने ईंधन की सप्लाई को सुरक्षित बताया है. मार्च के आखिर में च्प्ठ ने कई रिपोर्टों में कहा गया कि घबराने की कोई जरूरत नहीं है. 27 मार्च को ग् पर पोस्ट च्प्ठ ने लिखा, ष्भारत के पास कुल 74 दिनों की रिजर्व क्षमता है और मौजूदा स्टॉक करीब 60 दिनों का है.
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