Delimitation 2026: राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने परिसीमन विधेयक(Delimitation Bill) को लेकर एनडीए सरकार पर निशाना साधा है. उन्होंने एक्स पर पोस्ट कर लिखा कि कांग्रेस पार्टी ने हमेशा महिला आरक्षण का समर्थन किया है. सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण के लिए पहल करते हुए यूपीए सरकार के दौरान राज्यसभा से महिला आरक्षण बिल पास करवाया था. परन्तु महिला आरक्षण की आड़ में एनडीए सरकार जिस तरह आनन-फानन में 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की तैयारी कर रही है, वह स्वाभाविक रूप से संदेह पैदा करता है. आखिर ऐसी कौन सी आपात स्थिति है कि चुनावों के बीच इतनी जल्दबाज़ी दिखाई जा रही है? क्या यह आचार संहिता का स्पष्ट उल्लंघन नहीं है?
“लोकतंत्र आम सहमति से चलता है, मनमर्जी से नहीं”
अशोक गहलोत ने एक्स पोस्ट में आगे लिखा कि जब नई जनगणना का कार्य जारी है, तो 2011 के पुराने आंकड़ों के आधार पर परिसीमन का विचार करना लोकतंत्र और नए मतदाताओं के साथ अन्याय होगा. यह बेवजह ही उत्तर और दक्षिण भारत के बीच खाई पैदा करने का प्रयास है. सर्वदलीय बैठक की बजाय विपक्षी दलों से अलग-अलग बात करना, बिना व्यापक चर्चा और राज्यों को विश्वास में लिए इतना संवेदनशील कदम उठाना अनुचित है. उन्होंने कहा कि एकतरफा निर्णय लेना और विपक्ष की राय न लेना इस सरकार की कार्यशैली बन चुकी है. लोकतंत्र ‘आम सहमति’ से चलता है, मनमर्जी से नहीं. सरकार को पहले सभी पक्षों से विधिवत परामर्श करना चाहिए.
कांग्रेस पार्टी ने हमेशा महिला आरक्षण का समर्थन किया है। श्रीमती सोनिया गांधी ने महिला आरक्षण के लिए पहल करते हुए यूपीए सरकार के दौरान राज्यसभा से महिला आरक्षण बिल पास करवाया था।
परन्तु महिला आरक्षण की आड़ में एनडीए सरकार जिस तरह आनन-फानन में 131वां संविधान संशोधन विधेयक लाने की…
— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) April 15, 2026
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क्या है परिसीमन विवाद?
परिसीमन(Delimitation) भारत में लोकसभा और विधानसभा सीटों की सीमाओं को जनसंख्या के आधार पर नए सिरे से तय करने की संवैधानिक प्रक्रिया है. 84वें संशोधन के अनुसार 2026 तक सीटों की कुल संख्या फ्रीज थी, लेकिन 2026 के बाद परिसीमन की तैयारी हो रही है. सरकार लोकसभा सीटों की संख्या 543 से बढ़ाकर 815 करने की योजना बना रही है ताकि 2029 चुनावों से पहले 33 प्रतिशत महिला आरक्षण लागू हो सके. उत्तर भारत(यूपी, बिहार,एमपी और राजस्थान) में जनसंख्या वृद्धि दर दक्षिण भारत (तमिलनाडू, आंध्र प्रदेश, केरल, कर्नाटक और तेलंगाना) की तुलना में काफी अधिक रही है. इसमें उत्तर के राज्यों को ज्यादा सीटें मिलने जा रही हैं, जबकि दक्षिण के राज्यों की हिस्सेदारी घटेगी.



