EXCLUSIVE GROUND REPORT : डिंपल राजावत
Vacant Posts in various Departments : सोचिए… आप किसी सरकारी दफ्तर में शिकायत लेकर पहुंचे हैं। किसी कर्मचारी को सेवा से जुड़ा न्याय चाहिए… किसी महिला को अपनी शिकायत दर्ज करानी है… किसी बेरोजगार युवा को भर्ती प्रक्रिया आगे बढ़ने का इंतजार है… या किसी नागरिक को भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायत लेकर एक संवैधानिक और वैधानिक संस्था का दरवाजा खटखटाना है। लेकिन वहां जाकर पता चले कि जिस कुर्सी पर बैठने वाले अधिकारी से आपको उम्मीद थी, वही कुर्सी महीनों से खाली है।अगर मामला किसी एक विभाग या एक पद तक सीमित होता तो इसे प्रशासनिक देरी कहा जा सकता था। लेकिन राजस्थान में आयोगों, बोर्डों, निगमों, प्राधिकरणों और दूसरी संस्थाओं में 100 से ज्यादा महत्वपूर्ण पद खाली होने की बात सामने आ रही है।इन खाली पदों की कहानी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इनमें से कई संस्थाएं सीधे जनता, महिलाओं, सरकारी कर्मचारियों, बेरोजगार युवाओं और शिकायतकर्ताओं से जुड़ी हैं। कहीं अध्यक्ष नहीं है… कहीं सदस्य नहीं हैं… कहीं चेयरमैन का इंतजार है… और कहीं भर्ती कराने वाली संस्था के भीतर ही महत्वपूर्ण पद खाली बताए जा रहे हैं।ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि इन कुर्सियों पर नियुक्ति कब होगी। असली सवाल यह है कि जब फैसले लेने वाली कुर्सियां खाली होंगी, तो जनता की सुनवाई कितनी तेज होगी? शिकायतों का निपटारा कौन करेगा? और लाखों युवाओं की भर्ती प्रक्रिया को रफ्तार कौन देगा?आज के इस विशेष पैकेज में समझते हैं राजस्थान की इन खाली कुर्सियों की पूरी कहानी… और यह भी कि इसका असर सिर्फ सरकारी दफ्तरों तक सीमित है या सीधे आम आदमी तक पहुंच रहा है।
राजस्थान महिला आयोग का हाल
राजस्थान की सरकारी व्यवस्था में इन दिनों एक ऐसी तस्वीर चर्चा में है, जिसमें बड़े-बड़े सरकारी भवन तो मौजूद हैं, कार्यालय खुले हैं, कर्मचारी भी दिखाई देते हैं, लेकिन कई महत्वपूर्ण संस्थाओं में फैसले लेने वाली कुर्सियों पर नियुक्तियों का इंतजार बना हुआ है। बात की शुरुआत राजस्थान महिला आयोग से करें तो यह वह संस्था है जहां प्रदेश की महिलाएं उत्पीड़न, अन्याय और अपनी विभिन्न शिकायतों को लेकर उम्मीद के साथ पहुंचती हैं। लेकिन आयोग में अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति नहीं होने का मुद्दा सामने आ रहा है। बताया जा रहा है कि पिछली सरकार के दौरान नियुक्त अध्यक्ष का कार्यकाल समाप्त होने के बाद से अध्यक्ष का पद खाली है और तीन सदस्यों की नियुक्ति भी नहीं हुई है। यानी जिस संस्था का मकसद महिलाओं की आवाज को संस्थागत मंच देना है, उसी संस्था में शीर्ष स्तर की व्यवस्था अधूरी दिखाई दे रही है। आयोग के कार्यालय में कमरे हैं, टेबल हैं, कुर्सियां हैं, दीवारों पर संविधान की प्रस्तावना भी दिखाई देती है, लेकिन इन तस्वीरों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर अध्यक्ष और सदस्य नहीं होंगे तो किसी पीड़ित महिला की शिकायत के अंतिम स्तर पर सुनवाई और निर्णय की प्रक्रिया कितनी प्रभावी रह पाएगी? यहां खाली पड़ी कुर्सी केवल फर्नीचर नहीं है, यह उस महिला की उम्मीद से जुड़ी है जो पुलिस, प्रशासन या किसी दूसरे स्तर पर राहत नहीं मिलने के बाद आयोग तक पहुंचती है।
राजस्थान सिविल सेवा प्राधिकरण का हाल
अब राजस्थान सिविल सेवा प्राधिकरण की स्थिति पर नजर डालिए। सरकारी कर्मचारियों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिहाज से यह संस्था महत्वपूर्ण मानी जाती है। लेकिन यहां भी चेयरमैन समेत कई पद खाली होने की बात सामने आई है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक पांच स्वीकृत पदों में एक चेयरमैन, एक न्यायिक सदस्य और तीन अन्य सदस्य होते हैं। बताया गया कि चेयरमैन का पद मार्च से खाली है, जबकि दो सदस्यों के पद दिसंबर 2025 से नियमित रूप से खाली चल रहे हैं। यानी कुल मिलाकर कई महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्ति नहीं होने से काम का भार शेष सदस्यों पर आ सकता है और मामलों की सुनवाई प्रभावित होने की आशंका भी उठ रही है। बड़ी संख्या में सरकारी कर्मचारी पदोन्नति, तबादले, सेवा संबंधी विवाद और अन्य मामलों को लेकर ऐसी संस्थाओं का दरवाजा खटखटाते हैं। ऐसे में अगर सुनवाई करने वाला ढांचा ही पूरा न हो तो लंबित मामलों की संख्या बढ़ने और न्याय मिलने में देरी का सवाल स्वाभाविक है। इस स्थिति को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट की गंभीर टिप्पणी का भी जिक्र सामने आया है। यानी मामला सिर्फ प्रशासनिक रिक्तियों तक नहीं रह जाता, बल्कि यह न्यायिक और प्रशासनिक दक्षता से भी जुड़ जाता है।
राजस्थान लोक सेवा आयोग का हाल
अब आते हैं राजस्थान के लाखों बेरोजगार युवाओं की सबसे महत्वपूर्ण संस्था—राजस्थान लोक सेवा आयोग यानी RPSC पर। राजस्थान में सरकारी नौकरी का सपना देखने वाला युवा वर्षों तक तैयारी करता है। आवेदन भरता है, परीक्षा की तारीख का इंतजार करता है, परीक्षा देता है, फिर परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और नियुक्ति का इंतजार शुरू होता है। इस पूरी श्रृंखला में RPSC की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन अजमेर स्थित आयोग में अध्यक्ष और सचिव के पद खाली होने की बात कही जा रही है। इसके साथ ही आयोग के 10 सदस्यों में केवल पांच सदस्यों के कार्यरत होने की बात भी सामने आई है। अब यही वह जगह है जहां खाली पदों का मुद्दा सीधे रोजगार की राजनीति से जुड़ जाता है। सरकार लगातार भर्ती और रोजगार देने के लक्ष्य की बात कर रही है और पांच साल में चार लाख रोजगार देने का दावा भी किया गया है। लेकिन युवाओं का सवाल है कि अगर भर्ती कराने वाली संस्था के भीतर ही शीर्ष स्तर के कई पद खाली रहेंगे तो भर्ती कैलेंडर, परीक्षा प्रक्रिया और परिणामों को तय समय में पूरा करने की जिम्मेदारी आखिर किस रफ्तार से आगे बढ़ेगी? सवाल राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड को लेकर भी उठ रहा है। यहां दो सदस्यों के पद करीब दो साल से खाली होने की बात कही गई है और दावा है कि कामकाज को संभालने के लिए बाहर से अधिकारियों की सेवाएं लेनी पड़ रही हैं। यदि ऐसा है तो भर्ती प्रक्रिया की संस्थागत क्षमता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्योंकि भर्ती सिर्फ परीक्षा कराने का नाम नहीं है। प्रश्नपत्र निर्माण से लेकर परीक्षा आयोजन, आपत्तियां, परिणाम, दस्तावेज सत्यापन और विभागों को चयनित अभ्यर्थियों की सूची भेजने तक लंबी प्रशासनिक प्रक्रिया होती है। इसमें हर खाली पद का सीधा अर्थ परीक्षा रुक जाना नहीं होता, लेकिन जब रिक्तियां लगातार बनी रहें तो काम के दबाव, निर्णय में देरी और प्रक्रिया की गति को लेकर सवाल जरूर खड़े होते हैं।
लोकायुक्त का पद मार्च 2026 से खाली
राजस्थान में लोकायुक्त का पद मार्च 2026 से खाली होने की बात सामने आ रही है। पूर्व लोकायुक्त न्यायमूर्ति पीके लोरा का कार्यकाल समाप्त होने के बाद नई नियुक्ति का इंतजार बताया जा रहा है। लोकायुक्त का नाम आम नागरिक के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह व्यवस्था प्रशासनिक जवाबदेही और भ्रष्टाचार से जुड़ी शिकायतों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच मानी जाती है। इसलिए जब संस्था का मुखिया ही मौजूद न हो तो संदेश क्या जाता है? नागरिक शिकायत तो दे सकता है, कार्यालय काम भी करता रह सकता है, लेकिन शीर्ष स्तर के निर्णय और संस्थागत नेतृत्व के बिना व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना तय है। इस पूरी तस्वीर में अगला नाम राजस्थान खादी एवं ग्रामोद्योग से जुड़ी संस्था का आता है। विशाल सरकारी भवन, लंबा प्रशासनिक ढांचा और हजारों कारीगरों तथा खादी से जुड़े लोगों के हितों से संबंधित व्यवस्था—लेकिन यहां भी अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं होने का मुद्दा सामने है। कार्यालय में चेयरमैन के कमरे पर ताला और बंद पड़े कमरे की तस्वीरें इस पूरे मुद्दे को प्रतीकात्मक रूप से और बड़ा बना देती हैं। सवाल यह है कि जिस संस्था से बुनकर, कारीगर, छोटे उद्यमी और ग्रामीण उद्योग जुड़े हों, वहां लंबे समय तक राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व का पद खाली रहने से नीतिगत फैसलों की गति पर कितना असर पड़ता होगा?
मामला प्रशासन से निकलकर राजनीति के मैदान में
यही कहानी अकेले खादी बोर्ड की नहीं बताई जा रही। समाज कल्याण बोर्ड, हाउसिंग बोर्ड, पर्यटन निगम और बीस सूत्री कार्यक्रम जैसी कई संस्थाओं में भी अध्यक्ष या अन्य राजनीतिक नियुक्तियों का इंतजार होने की बात सामने आ रही है। यही वह जगह है जहां मामला प्रशासन से निकलकर सीधा राजनीति के मैदान में पहुंच जाता है। क्योंकि इन संस्थाओं में कई पद प्रशासनिक नियुक्तियों के साथ-साथ राजनीतिक नियुक्तियों से भी भरे जाते हैं। आमतौर पर सरकार बदलने के बाद बोर्ड, निगम और आयोगों में नए चेहरों को जिम्मेदारी देने की चर्चा शुरू होती है। पार्टी संगठन के नेताओं, कार्यकर्ताओं और सामाजिक प्रतिनिधियों की नजर इन नियुक्तियों पर रहती है। लेकिन जब सरकार बनने के काफी समय बाद तक नियुक्तियां लंबित रहें तो राजनीतिक सवाल उठते हैं—क्या सरकार किसी बड़े संगठनात्मक संतुलन का इंतजार कर रही है? क्या अलग-अलग क्षेत्रों और सामाजिक समीकरणों को साधने के लिए नामों पर मंथन चल रहा है? या फिर इन संस्थाओं की नियुक्तियां सरकार की तत्काल प्राथमिकताओं में पीछे हैं?
‘जल्द’ का मतलब आखिर कब?
सरकार की तरफ से सामने आए पक्ष में कहा गया है कि राजनीतिक नियुक्तियों के मामलों में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा अधिकृत हैं और केंद्रीय नेतृत्व से विचार-विमर्श के बाद फैसला करेंगे। सरकार से जुड़े पक्ष का कहना है कि इस दिशा में विचार-विमर्श चल रहा होगा और जल्द सुखद परिणाम देखने को मिल सकते हैं। लेकिन जनता और राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए सवाल अभी भी वही है—‘जल्द’ का मतलब आखिर कब? क्योंकि अब कैलेंडर में एक और महत्वपूर्ण मोड़ सामने है। राजस्थान में पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। चुनावी प्रक्रिया के साथ आचार संहिता का चरण भी आएगा। ऐसे में राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर आयोगों, बोर्डों और निगमों में नियुक्तियां चुनावी आचार संहिता से पहले नहीं हुईं तो क्या इन पदों पर नियुक्ति का इंतजार और लंबा हो सकता है?
रिक्त पद कितनी जल्दी भरे जाते हैं ?
राजस्थान में आने वाले दिनों में नजर केवल इस बात पर नहीं रहेगी कि किस नेता या किस अधिकारी को कौन-सा पद मिलता है। असली परीक्षा इस बात की होगी कि महिला आयोग, लोकायुक्त, भर्ती संस्थाओं, कर्मचारी मामलों की सुनवाई करने वाली संस्थाओं और अलग-अलग बोर्ड-निगमों में रिक्त पद कितनी जल्दी भरे जाते हैं और नियुक्ति होने के बाद लंबित काम कितनी तेजी से आगे बढ़ता है। क्योंकि सरकारी दफ्तर की एक खाली कुर्सी बाहर से भले ही सामान्य दिखाई दे, लेकिन उस कुर्सी के दूसरी तरफ किसी महिला की शिकायत, किसी कर्मचारी का मुकदमा, किसी कारीगर की योजना, किसी नागरिक की भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत और किसी बेरोजगार युवा की नौकरी की उम्मीद जुड़ी हो सकती है। सरकारें बदलती रहेंगी, चुनाव आते-जाते रहेंगे, राजनीतिक नियुक्तियों के समीकरण बनते-बिगड़ते रहेंगे, लेकिन जनता के लिए सबसे जरूरी सवाल हमेशा यही रहेगा—मेरी शिकायत कौन सुनेगा और मेरा काम कब होगा?
जनता की सुनवाई कब शुरू ?
तो राजस्थान की इन खाली कुर्सियों की कहानी को सिर्फ राजनीतिक नियुक्तियों की सूची समझना शायद तस्वीर का आधा हिस्सा देखना होगा। पूरी तस्वीर तब दिखाई देती है जब इन कुर्सियों के सामने खड़े उस नागरिक को देखा जाए जो महीनों से अपनी सुनवाई का इंतजार कर रहा है… उस महिला को देखा जाए जो आयोग तक उम्मीद लेकर पहुंची है… उस सरकारी कर्मचारी को देखा जाए जिसकी सेवा संबंधी लड़ाई लंबी होती जा रही है… और उस युवा को देखा जाए जिसकी जिंदगी भर्ती कैलेंडर की एक तारीख पर टिकी है।अब सरकार के सामने दो चुनौतियां हैं—पहली, खाली पदों को भरना… और दूसरी, नियुक्तियों के बाद इन संस्थाओं में लंबित काम को रफ्तार देना।क्योंकि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि कुर्सी पर कौन बैठेगा… सवाल यह भी है कि उस कुर्सी पर बैठने वाला जनता की सुनवाई कब शुरू करेगा।और शायद राजस्थान की इन तमाम खाली कुर्सियों की पूरी कहानी एक ही लाइन में समझी जा सकती है..सरकारी दफ्तर में खाली पड़ी कुर्सी सिर्फ एक खाली पद नहीं होती… कई बार उसके सामने किसी नागरिक की अटकी हुई उम्मीद खड़ी होती है।
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