Tiwari : देशभर में रक्षाबंधन का त्योहार शुक्रवार को मनाया गया लेकिन उत्तराखंड के कुमाऊं अंचल में एक ऐसा समाज भी है, जहां रक्षाबंधन सामान्य तिथि के करीब 18 दिन बाद मनाने की परंपरा आज भी जीवित है. यह अनोखी परंपरा तिवारी समाज की धार्मिक मान्यताओं और गौतम ऋषि से जुड़ी एक रोचक कथा से संबंधित बताई जाती है।
गौतम ऋषि से जुड़ी है पूरी कहानी
नैनीताल निवासीयों के अनुसार तिवारी समाज की इस परंपरा के पीछे गौतम ऋषि से जुड़ी पौराणिक कथा बताई जाती है। मान्यता है कि तिवारी समुदाय गौतम ऋषि के अनुयायी हैं और उनका गोत्र भी गौतम है। कथा के अनुसार, श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर जनेऊ से संबंधित धार्मिक कार्यक्रम चल रहा था. इसी दौरान भारद्वाज ऋषि ने गौतम ऋषि को सभी ऋषियों को जनेऊ धारण कराने की सलाह दी। गौतम ऋषि ने सभी ऋषियों को जनेऊ पहना दिया, लेकिन जब स्वयं उनके जनेऊ धारण करने की बारी आई, तब तक हस्त नक्षत्र का शुभ मुहूर्त निकल चुका था। इसके बाद उनके लिए दोबारा शुभ मुहूर्त निकाला गया. मान्यता के अनुसार यह शुभ समय करीब 18 दिन बाद आया. इसी दिन गौतम ऋषि ने जनेऊ धारण किया। इसी धार्मिक परंपरा से चलते तिवारी समाज में श्रावणी पूर्णिमा के 18 दिन बाद आने वाले पर्व को विशेष महत्व मिलने की बात कही जाती है।
हरतालिका के दिन मनाते हैं राखी
डीएसबी कॉलेज, नैनीताल के वनस्पति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर के अनुसार कुमाऊं में इस परंपरा का संबंध हरतालिका से भी जोड़ा जाता है. उनके अनुसार, रक्षाबंधन के 18 दिन बाद हरतालिका का पर्व मनाया जाता है. इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना के लिए व्रत रखती हैं. हरतालिका के दिन भगवान शिव और गणेश की पूजा की जाती है. महिलाएं मिट्टी से भगवान शिव और गणेश की प्रतिमाएं बनाकर उनकी पूजा करती हैं. कई महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल ग्रहण किए बिना उपवास रखती हैं. यह परंपरा तिवारी के साथ तिवारी, त्रिपाठी और त्रिवेदी समुदायों में भी देखने को मिलती है. इन समुदायों को सामवेदी ब्राह्मण परंपरा से जोड़ा जाता है।
हरतालिका और रक्षाबंधन का अनोखा संबंध
मैदानी इलाकों में इस दिन को आमतौर पर हरतालिका तीज के नाम से जाना जाता है, जबकि कुमाऊं में इसे हरतालिका के रूप में मनाने की परंपरा है. इस साल हरतालिका का पर्व 13 सितंबर को मनाया जाएगा. इस अवसर पर धार्मिक अनुष्ठानों के साथ परिवार और समाज की परंपराएं भी निभाई जाती है. तिवारी समाज में इसी दिन रक्षाबंधन मनाने की परंपरा होने के कारण भाई-बहन के रिश्ते का यह पर्व सामान्य रक्षाबंधन से अलग समय पर दिखाई देता है। बदलते समय और आधुनिक जीवनशैली के बावजूद तिवारी समाज में यह परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ रही है. बुजुर्ग जहां इस कथा और परंपरा को नई पीढ़ी तक पहुंचा रहे हैं, वहीं युवा भी इससे जुड़े धार्मिक रीति-रिवाजों को निभा रहे हैं।
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