Religion & Astrology: वैदिक पंचांग के अनुसार कालाष्टमी व्रत हर महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाने का विधान है। यह दिन काल भैरव को समर्पित होता है। इस साल आज 9 फरवरी को मनाया जाएगा। मान्यता है विशेष कामों में सफलता पाने के लिए व्रत रखा जाता है। इस व्रत को करने से साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। साथ ही शत्रुओं पर विजय मिलती है। वहीं इस दिन योग वृद्धि 10 फरवरी की रात 12 बजकर 52 मिनट तक है। जिससे इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया है। वहीं कई अन्य योग भी बन रहे हैं। आइए जानते हैं पूजा का शुभ मुहूर्त और भैरव स्तुति
कालाष्टमी पर पूजा का शुभ मुहूर्त
वैदिक पंचांग के अनुसार इस दिन ब्रह्म मुहूर्त सुबह 5 बजकर 21 मिनट से 6 बजकर 12 मिनट तक है। वहीं अभिजीत मुहूर्त दोपहर 12 बजकर 13 मिनट से 12 बजकर 57 मिनट तक है। साथ ही विजय मुहूर्त दोपहर 2 बजकर 27 मिनट से 3 बजकर 10 मिनट तक गोधूलि मुहूर्त शाम 6 बजकर 4 मिनट से 6 बजकर 30 मिनट तक और अमृत काल रात 10 बजकर 4 मिनट से 11 बजकर 52 मिनट तक है। इन शुभ मुहूर्त में भैरो बाबा की पूजा- अर्चना कर सकते हैं।
कालाष्टमी धार्मिक महत्व
इस दिन जो भी व्यक्ति पूरे दिन व्रत रखकर काल भैरव की पूजा- अर्चना करता है। उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं। साथ ही काल भैरव की पूजा करने से महादेव प्रसन्न होते हैं। साथ ही अज्ञात भय खत्म होता है और गुप्त शत्रुओं का नाश होता है। कालभैरव की उपासना से रोगों से मुक्ति मिलती है और जीवन के सभी संकट दूर होते हैं।
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भैरव स्तुति
यं यं यं यक्षरूपं दशदिशिविदितं भूमिकम्पायमानं। सं सं संहारमूर्तिं शिरमुकुटजटाशेखरं चन्द्रबिम्बम्।।
दं दं दं दीर्घकायं विकृतनखमुखं चोर्ध्वरोमं करालं। पं पं पं पापनाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।
रं रं रं रक्तवर्णं कटिकटिततनुं तीक्ष्णदंष्ट्राकरालं। घं घं घं घोषघोषं घ घ घ घ घटितं घर्घरं घोरनादम्।।
कं कं कं कालपाशं धृकधृकधृकितं ज्वालितं कामदेहं। तं तं तं दिव्यदेहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।
लं लं लं लं वदन्तं ल ल ल ल ललितं दीर्घजिह्वाकरालं। धुं धुं धुं धूम्रवर्णं स्फुटविकटमुखं भास्करं भीमरूपम्।।
रुं रुं रुं रुण्डमालं रवितमनियतं ताम्रनेत्रं करालं। नं नं नं नग्नभूषं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।
वं वं वं वायुवेगं नतजनसदयं ब्रह्मपारं परं तं। खं खं खं खड्गहस्तं त्रिभुवननिलयं भास्करं भीमरूपम्।।
टं टं टं टङ्कारनादं त्रिदशलटलटं कामवर्गापहारं। भृं भृं भृं भूतनाथं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम् ।।
इत्येवं कामयुक्तं प्रपठति नियतं भैरवस्याष्टकं यो। निर्विघ्नं दुःखनाशं सुरभयहरणं डाकिनीशाकिनीनाम्।।
नश्येद्धिव्याघ्रसर्पौ हुतवहसलिले राज्यशंसस्य शून्यं। सर्वा नश्यन्ति दूरं विपद इति भृशं चिन्तनात्सर्वसिद्धिम् ।।
भैरवस्याष्टकमिदं षण्मासं यः पठेन्नरः।। स याति परमं स्थानं यत्र देवो महेश्वरः ।।
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