Sam Pitroda : इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के चेयरमैन सैम पित्रोदा ने एक इंटरव्यू में पीएम मोदी, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत और केंद्र सरकार पर कई मुद्दों को लेकर निशाना साधा है। उन्होंने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान पर कहा कि गरीबों, दलितों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में बोलना नक्सलवाद या कम्युनिज्म नहीं है।
अल्पसंख्यकों से पूछो कैसा महसूस करते हैं
एक न्यूज एजेंसी को दिए इंटरव्यू में मंगलवार को पित्रोदा ने कहा कि इंसानियत को हर चीज से ऊपर रखना चाहिए और सभी लोग एक ही जगह से आए हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर उन्होंने कहा कि मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध और यहूदी लोगों से पूछना चाहिए कि वे आज भारत में कैसा महसूस करते हैं। बता दें कि 15 अगस्त के भाषण में मोदी ने कहा था कि देश से नक्सलवाद खत्म हो गया, लेकिन दिमागी नक्सल अभी भी मौजूद हैं।
सिर्फ कह देना काफी नहीं
भागवत के बयान पर सैम पि़त्रोदा ने कहा कि सिर्फ यह कहना काफी नहीं है कि मुस्लिम, ईसाई, यहूदी और बौद्ध का सम्मान किया जाता है। अगर व्यवहार में इसके उलट होता है तो कथनी और करनी में अंतर दिखाई देता है। किसी के बारे में कही गई बातों से ज्यादा महत्वपूर्ण उसके साथ किया जाने वाला व्यवहार है। वास्तविक स्थिति समझने के लिए लोगों के अनुभवों को देखना जरूरी है।
2014 से पहले की सरकारों के काम
सैम पित्रोदा ने कहा कि “आज देश में जो कई सुविधाएं और संस्थान दिखाई दे रहे हैं, उनमें से बड़ी संख्या पिछले 70 सालों में तैयार हुई। पहले की सरकारों से भी गलतियां हुई होंगी, लेकिन देश में बड़ी संख्या में संस्थान और व्यवस्थाएं खड़ी की गईं। आईआईटी और आईआईएम जैसे संस्थानों से निकले लोग आज दुनियाभर में काम कर रहे हैं और यह देश के शुरुआती नेतृत्व द्वारा तैयार की गई व्यवस्था का परिणाम है। 2014 के बाद में ऐसे कौन से बड़े नए संस्थान बनाए गए, जिनकी तुलना उस दौर की संस्थागत विरासत से की जा सके।”
जीडीपी की 7.8ः ग्रोथ का समान लाभ
सैम पित्रोदा ने कहा कि सिर्फ जीडीपी बढ़ना ही पर्याप्त नहीं है। यह देखना जरूरी है कि इस आर्थिक वृद्धि का फायदा किसे मिल रहा है। क्या यह विकास देश के आम लोगों तक पहुंच रहा है और क्या इसका लाभ समान रूप से बंट रहा है।” राहुल गांधी के समर्थन मेंरू “राहुल गांधी को मजबूत नेता बताते हुए कहा कि उनमें बौद्धिक क्षमता, दृढ़ता, साहस और अपने विचारों पर विश्वास है। राहुल कांग्रेस की ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ की सोच को सामने रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।”
संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर हुई
संस्थाओं की स्वतंत्रता पर पित्रोदा ने कहा कि “सत्ता का बहुत अधिक केंद्रीकरण प्रधानमंत्री कार्यालय में होने से संस्थाओं की स्वतंत्रता कमजोर हुई है। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और स्थानीय पुलिस संस्थाओं को सरकार के खिलाफ स्वतंत्र रूप से कार्रवाई करने में दबाव महसूस होता है। अगर कोई संस्था सरकार के खिलाफ कदम उठाती है तो उस पर कार्रवाई या दबाव का खतरा रहता है। लोकतंत्र में स्वतंत्र संस्थाएं और मजबूत ‘वॉचडॉग’ जरूरी हैं, लेकिन मौजूदा व्यवस्था में ऐसे निगरानी तंत्र कमजोर हुए हैं।”
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