Supreme Court : सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इंटरनेट इस्तेमाल करना हर व्यक्ति, यहां तक कि हर उम्र के बच्चे का मौलिक अधिकार है। बच्चों को इंटरनेट से पूरी तरह दूर रखना बेतुका होगा। बच्चों की सुरक्षा और उनकी आजादी एक-दूसरे के खिलाफ नहीं हैं। बच्चों को दोनों का अधिकार है।
पाबंदी समस्या का समाधान नहीं
कोर्ट ने कहा- इंटरनेट पर गलत कंटेंट होने के कारण उन पर पूरी तरह रोक लगाना समाधान नहीं है। ऐसी पाबंदियों से बच्चे कम सुरक्षित वेबसाइटों और प्लेटफॉर्म पर जा सकते हैं। साथ ही, ऑनलाइन धमकी या शोषण का सामना करने वाले बच्चे शिकायत करने से भी डर सकते हैं। जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट को इंटरनेट से हटाने की व्यवस्था मजबूत करने से जुड़े मामले में ये टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने केंद्र सरकार को ऐसे कंटेंट का राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने और सोशल मीडिया कंपनियों को दो घंटे के भीतर पुलिस को रिपोर्ट देने समेत कई निर्देश दिए हैं।
डेटाबेस में सिर्फ कंटेंट की डिजिटल पहचान और लिंक
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को बच्चों के यौन शोषण से जुड़े प्रमाणित कंटेंट का राष्ट्रीय डेटाबेस बनाने का निर्देश दिया है। इसे मौजूदा सहयोग पोर्टल पर या अलग से तैयार किया जा सकता है।
हैश और URL दर्ज होंगे: डेटाबेस में तस्वीर या वीडियो की डिजिटल पहचान यानी हैश और उस वेबसाइट का लिंक रखा जाएगा, जहां सामग्री मौजूद है।
असली तस्वीरें-वीडियो नहीं रखे जाएंगे: डेटाबेस में आपत्तिजनक सामग्री के बजाय उसकी डिजिटल पहचान और लिंक दर्ज होंगे।
तीन विशेषज्ञ करेंगे जांच: हर एंट्री की कई स्तरों पर जांच होगी। कम से कम तीन प्रशिक्षित विशेषज्ञ स्वतंत्र रूप से तय करेंगे कि सामग्री बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी है या नहीं।
गलत एंट्री हटाने की व्यवस्था: जांच का रिकॉर्ड रखा जाएगा, समय-समय पर स्वतंत्र ऑडिट होगा और गलत तरीके से दर्ज सामग्री को हटाने के लिए शिकायत निवारण की व्यवस्था बनाई जाएगी।
इस डेटाबेस से सोशल मीडिया कंपनियां अपने प्लेटफॉर्म पर मौजूद सामग्री का मिलान कर सकेंगी। इससे किसी एक प्लेटफॉर्म से हटाई गई सामग्री दूसरे प्लेटफॉर्म पर दोबारा अपलोड होने पर भी पहचानी जा सकेगी।
कंटेंट हटाने पर पुलिस को देनी होगी रिपोर्ट
कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को बच्चों के यौन शोषण से जुड़े कंटेंट की जानकारी भारतीय कानून के तहत संबंधित पुलिस इकाई, विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) या साइबर क्राइम पोर्टल को देने का निर्देश दिया है।
अपनी जांच में कंटेंट मिलने पर: कंपनी अज्ञात स्रोत का ऐसा कंटेंट अपनी जांच में हटाती है, तो उसे दो घंटे के भीतर रिपोर्ट करनी होगी।
शिकायत के बाद कंटेंट हटाने पर: शिकायत का निपटारा होने के बाद जल्द से जल्द और अधिकतम दो घंटे के भीतर रिपोर्ट देनी होगी।
डेटाबेस से मिलान होने पर: राष्ट्रीय डेटाबेस में दर्ज सामग्री से मिलान के कारण हटाए गए कंटेंट की जानकारी संबंधित प्राधिकरण को हर सप्ताह एक साथ देनी होगी।
शिकायत पर 24 घंटे में रेफरेंस नंबर देना होगा
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया कंपनियों को अपनी वेबसाइट और ऐप पर शिकायत अधिकारी की जानकारी साफ-साफ दिखाने का निर्देश दिया है। बच्चों के यौन शोषण से जुड़े मामलों के लिए अलग शिकायत विकल्प होना चाहिए। हर शिकायत मिलने के 24 घंटे के भीतर उसकी प्राप्ति की जानकारी और रेफरेंस नंबर देना होगा। शिकायत की समीक्षा प्रशिक्षित अधिकारी करेंगे। शिकायतकर्ता को फैसले और उसके कारण की जानकारी भी देनी होगी। स्वचालित टूल का इस्तेमाल शुरुआती जांच में मदद के लिए किया जा सकता है। कोर्ट ने केंद्र सरकार से आईटी नियमों में जरूरी बदलाव कर जवाबदेही से जुड़े इन प्रावधानों को सभी ऑनलाइन इंटरमीडियरी पर लागू करने के लिए कदम उठाने को कहा है।
नियम तोड़ने वाली कंपनियों पर जुर्माने पर विचार
कोर्ट ने केंद्र सरकार से आईटी कानून और नियमों का उल्लंघन करने वाली कंपनियों पर आर्थिक जुर्माना लगाने की व्यवस्था पर विचार करने को कहा है। जुर्माना तय करते समय इन बातों को ध्यान में रखने का सुझाव दिया गया है: –
उल्लंघन कितना गंभीर है।
नियमों का उल्लंघन कितने समय तक हुआ।
कंपनी ने कितनी बार नियम तोड़े।
कंपनी का आकार और कारोबार कितना है।
अदालत ने पेड और सब्सक्रिप्शन आधारित सेवाओं की भी सख्त जांच करने को कहा है, ताकि इनके जरिए बच्चों के यौन शोषण से जुड़ी या अन्य प्रतिबंधित सामग्री न दिखाई जाए और न फैलाई जाए। सरकार से ऐसी सामग्री के प्रसार से होने वाली कमाई जब्त करने के विकल्प पर भी विचार करने को कहा गया है।
बच्चों के अकाउंट निजी रखने और ‘चाइल्ड मोड’ का सुझाव
कोर्ट ने बच्चों की उम्र के अनुसार ऑनलाइन सुरक्षा के उपाय अपनाने का सुझाव दिया है। इनमें शामिल हैं: –
बच्चों के सोशल मीडिया अकाउंट डिफॉल्ट रूप से निजी रखना।
अनजान वयस्कों के संदेश और संपर्क सीमित करना।
बच्चों को दिखाए जाने वाले विज्ञापनों और कंटेंट पर नियंत्रण रखना।
छोटे बच्चों के लिए अलग ‘चाइल्ड मोड’ देना।
अकाउंट इस्तेमाल करने में माता-पिता की सहमति, मार्गदर्शन और निगरानी को अहमियत देना।
इन उपायों को लागू करने का तरीका केंद्र सरकार तय करेगी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि सरकार वयस्क सामग्री वाली वेबसाइटों जैसे बच्चों के लिए नुकसानदेह सेवाओं या कंटेंट तक उनकी पहुंच सीमित कर सकती है। कोर्ट ने उम्र के आधार पर रोक लगाने के दौरान निजता से जुड़ी चिंता भी जताई। हर यूजर की उम्र जानने के लिए लगातार संवेदनशील जानकारी जुटाने और उसकी निगरानी करने से डेटा के गलत इस्तेमाल और निगरानी का खतरा बढ़ सकता है।
स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल होगी ऑनलाइन सुरक्षा की शिक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बच्चों को उनकी उम्र के अनुसार ऑनलाइन खतरों की पहचान करना और गलत व्यवहार की शिकायत करना सिखाना जरूरी है। इसके लिए इन विषयों पर शिक्षा देने का सुझाव दिया गया है:
सहमति और स्वस्थ रिश्ते।
सुरक्षित और असुरक्षित स्पर्श।
निजी जानकारी की सुरक्षा।
ऑनलाइन शोषण की पहचान और उससे बचाव।
शिकायत दर्ज कराने के तरीके।
अदालत ने NCERT और राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषदों को बाल मनोवैज्ञानिकों, शिक्षकों और अभिभावक विशेषज्ञों की सलाह से पढ़ाई की सामग्री तैयार करने को कहा है। डिजिटल सुरक्षा और उम्र के अनुसार यौन शिक्षा को स्कूली पाठ्यक्रम का हिस्सा बनाने पर भी जोर दिया गया है। केंद्र सरकार को इन निर्देशों को लागू करने के लिए जरूरी दिशानिर्देश, मानक संचालन प्रक्रिया और सूचना प्रौद्योगिकी कानून व नियमों में जरूरी बदलाव करने के लिए कदम उठाने होंगे। सरकार को प्रगति के बारे में हलफनामा दाखिल करना है। मामले की अगली सुनवाई 10 दिसंबर 2026 को होगी।
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