Nobel Prize for Economics: अर्थव्यवस्था में मंदी और तेजी के उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए आर्थिक नीतियों के नए आधार विकसित करने पर शोध के लिए 2026 का अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार अमेरिकी अर्थशास्त्रियों रॉबर्ट ई. हॉल और माइकल वुडफोर्ड को मिला है। रॉयल स्वीडिश एकेडमी ऑफ साइंसेज ने सोमवार को को इसकी घोषणा की। दोनों अर्थशास्त्रीयों के रिसर्च से समझने में मदद मिली कि आम लोगों के खर्च और कंपनियों के फैसले पूरी अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करते हैं। दोनों को कुल 1.2 करोड़ स्वीडिश क्रोनर यानी 11.5 करोड़ रुपए की पुरस्कार राशि बराबर मिलेगी।
1970 के दशक में आर्थिक संकट के दौरान नए मॉडल की जरूरत पड़ी
अर्थशास्त्री जॉन मेनार्ड कीन्स ने करीब 100 साल पहले सुझाव दिया था कि मंदी के समय सरकार को खर्च बढ़ाना चाहिए और केंद्रीय बैंक को ब्याज दरें घटानी चाहिए। इससे कारोबार और लोगों के खर्च को बढ़ावा मिल सकता है। वहीं, महंगाई बहुत बढ़ने पर ब्याज दरें बढ़ाकर और खर्च पर लगाम लगाकर मांग कम की जा सकती है। लेकिन 1970 के दशक में तेल संकट के दौरान पश्चिमी देशों में महंगाई और बेरोजगारी एक साथ बढ़ गईं। आर्थिक विकास भी धीमा पड़ गया। इससे साफ हुआ कि पुराने आर्थिक मॉडल हर स्थिति में सही नतीजे नहीं दे पा रहे थे।
लोग भविष्य देखकर खर्च तय करते हैं
रॉबर्ट हॉल ने अपनी रिसर्च में बताया कि परिवार सिर्फ आज की कमाई देखकर खर्च नहीं करते। वे यह भी सोचते हैं कि भविष्य में उनकी आमदनी कैसी रहेगी। अगर किसी परिवार को लगता है कि आगे उसकी कमाई बढ़ेगी, तो वह आज ज्यादा खर्च कर सकता है। इसके उलट, नौकरी जाने या आमदनी घटने का डर होने पर वह खर्च कम कर सकता है। हॉल ने 1978 में प्रकाशित अपने शोध में यह विचार रखा कि लोगों के खर्च में बदलाव का पहले से सटीक अनुमान लगाना मुश्किल है, क्योंकि यह नई जानकारी मिलने पर बदल सकता है। इस काम ने अर्थशास्त्रियों को परिवारों के खर्च के फैसलों को समझने का नया तरीका दिया।
ब्याज दरें कैसे बदलती हैं
माइकल वुडफोर्ड ने ऐसे आर्थिक मॉडल विकसित करने में योगदान दिया, जिनसे ब्याज दरों में बदलाव का महंगाई और आर्थिक विकास पर असर समझा जा सकता है। जब केंद्रीय बैंक ब्याज दरें घटाता है, तो कर्ज लेना सस्ता हो सकता है। इससे लोग घर और गाड़ी जैसी चीजें खरीदने के लिए कर्ज ले सकते हैं। कंपनियां भी निवेश बढ़ा सकती हैं। इससे बाजार में मांग बढ़ सकती है। इसके उलट, महंगाई बढ़ने पर ब्याज दरें बढ़ाने से कर्ज महंगा होता है और खर्च की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। वुडफोर्ड ने 2003 में प्रकाशित अपनी किताब में ऐसे मॉडल को विस्तार से समझाया।
कंपनियों की कीमतें तय करने की नीति भी अहम
कंपनियां अपने सामान की कीमतें तय करते समय भविष्य की लागत और मांग का भी अनुमान लगाती हैं। वे हर दिन कीमतें नहीं बदलतीं, क्योंकि ऐसा करने में समय और पैसा लगता है। इसलिए मांग घटने के बाद भी सामान के दाम तुरंत कम नहीं होते। इसी तरह, अगर कंपनियों को आगे लागत बढ़ने का डर हो, तो वे पहले ही कीमतें बढ़ा सकती हैं। इन फैसलों को समझना महंगाई का अनुमान लगाने और सही आर्थिक नीति बनाने में मदद करता है।
दुनिया भर के केंद्रीय बैंक करते हैं इन मॉडलों का इस्तेमाल
अर्थशास्त्र पुरस्कार समिति के अध्यक्ष जॉन हासलर के मुताबिक, दोनों अर्थशास्त्रियों के काम ने उन आर्थिक मॉडलों को मजबूत आधार दिया है, जिनका इस्तेमाल दुनिया भर की सरकारें और केंद्रीय बैंक करते हैं। इनकी मदद से ऊर्जा संकट और लोगों के खर्च में अचानक बदलाव जैसी स्थितियों में बेहतर फैसले लेने में मदद मिलती है। हालांकि, ये मॉडल मंदी या महंगाई को पूरी तरह खत्म नहीं करते, बल्कि उनके असर को कम करने में मदद करते हैं।
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