Liquid Tree : सवाल है कि क्या एक कांच के टैंक में भरा हरा पानी, शहर के सबसे बड़े और घने पेड़ से भी ज्यादा तेजी से हवा को साफ कर सकता है? इसका जवाब है हां। सुनने में यह आश्चर्यजनक लग सकता है, लेकिन भारत के वैज्ञानिकों ने इसे सच कर दिखाया है। देश में बढ़ते प्रदूषण और कंक्रीट के जंगलों के बीच, भारतीय वैज्ञानिकों ने भारत का पहला चलता-फिरता लिक्विड ट्री तैयार कर लिया है, इसका नाम साल्ट दिया गया है। सीएसआईआर केंद्रीय खनन एवं ईंधन अनुसंधान संस्थान के रिसर्चर्स ने देश का पहला मोबाइल लिक्विड ट्री तैयार किया है, इसे ही SALT यानी Smart Algal Liquid Tree नाम दिया गया है।
लिक्विड ट्री कैसे करता है काम?
सरल शब्दों में कहें तो लिक्विड ट्री पानी और माइक्रोएल्गी से भरा एक टैंक होता है। माइक्रोएल्गी पानी में पाए जाने वाले बेहद छोटे, एक-कोशिका वाले जीव होते है। यह पूरा सिस्टम एक खास बायोलॉजिकल प्रोसेस पर काम करता है-
दूषित हवा को खींचना – शहरों या फैक्ट्रियों की प्रदूषित हवा को इस टैंक के अंदर खींचा या बुदबुदाया जाता है।
नेचुरल फिल्टरेशन-जैसे ही प्रदूषित हवा, पानी और एल्गी के टच में आती है, हवा में मौजूद कई तरह के प्रदूषण के तत्व इस लिक्विड में फंस जाते हैं या एल्गी इन्हें सोख लेती है।
सुपर-फोटोसिंथेसिस
असली पेड़ों की तरह ही ये माइक्रोएल्गी भी धूप और कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल करके अपना खाना बनाते हैं यानी प्रकाश संश्लेषण की क्रिया को करते हैं. इस प्रोसेस में वे हवा से भारी मात्रा में कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं। साइंसडायरेक्ट के अनुसार, दुनिया की आधी ऑक्सीजन पैदा करने के लिए यही माइक्रोएल्गी जिम्मेदार हैं।
क्यों खास है भारत का साल्ट ?
दुनिया में लिक्विड ट्री पहले भी बने हैं, लेकिन भारत का साल्ट दो बड़ी वजहों से अलग और एडवांस माना जा रहा है- यह पूरी तरह मोबाइल है। पुराने लिक्विड ट्री एक जगह फिक्स होते थे, लेकिन साल्ट को आसानी से एक जगह से दूसरी शिफ्ट किया जा सकता है. इसे प्रदूषण के हॉटस्पॉट के हिसाब से तैनात किया जा सकता है।
धूप के बिना भी काम
यह सिस्टम सोलर पावर और बिजली दोनों से चलने में सक्षम है. अच्छी बात यह है कि इसमें आर्टिफिशियल लाइट का भी सपोर्ट है. यानी अगर धूप न भी हो, तब भी यह रात-दिन हवा साफ करने का काम कर सकता है।
क्या ये असली पेड़ों की जगह ले सकते हैं?
इस प्रोजेक्ट में शामिल प्रिंसिपल साइंटिस्ट वेट्रिवेल अंगुसेल्वी के मुताबिक, इसका मुख्य उद्देश्य उन तंग शहरी इलाकों में वायु प्रदूषण से लड़ना है जहां बड़े पेड़ लगाने की बिल्कुल जगह नहीं है. वैज्ञानिकों ने साफ किया है कि यह तकनीक असली पेड़ों का विकल्प तो नहीं है, लेकिन उन जगहों के लिए एक मजबूरी और बेहतरीन सपोर्ट सिस्टम है जहां हरियाली लाना नामुमकिन है। संस्थान अब इस डिवाइस के कमर्शियल प्रोडक्शन पर काम कर रहा है. रिसर्चर्स की कोशिश इसे इतना सस्ता बनाने की है, जिससे आने वाले समय में इसे गंभीर प्रदूषण झेल रहे रिहायशी इलाकों और कॉलोनियों में भी आसानी से इस्तेमाल किया जा सके.
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