KBP Times

मीना कुमारी की 54वीं पुण्यतिथि, एक दर्द भरा अफ़साना रही ज़िंदगी

Meena Kumari

Actress Meena Kumari : अपने दौर की बेहद खूबसूरत, नाजुक मिजाज और एक बेहतरीन अदाकारा मीना कुमारी की जिंदगी पर्दे पर जितनी चमकदार दिखी, पर्दे के पीछे रियल लाइफ में उतना ही दर्द भरा अफसाना रही है। जिंदगी के हालातों ने महज चार साल की उम्र में ही उन्हें परिवार का सहारा बनने पर मजबूर कर दिया। आगे चलकर फिल्मी दुनिया में नाम कमाने के बावजूद उनका निजी जीवन तकलीफों से भरा रहा। बैजू बावरा’, ‘साहिब बीबी और गुलाम’ और ‘पाकीजा’ जैसी फिल्मों में अपने शानदार अभिनय से उन्होंने दर्शकों के दिलों पर अमिट छाप छोड़ी। लेकिन असल जिंदगी में दर्द, अकेलेपन और टूटे रिश्तों से घिरी रही। शौहर कमाल अमरोही के साथ रिश्तों में आई कड़वाहट और उनके असिस्टेंट के थप्पड़ मारने जैसी घटनाओं ने उनके भीतर के दर्द को और गहरा किया। यही पीड़ा उनके अभिनय में झलकी और उन्हें ट्रेजेडी क्वीन बना गई। 31 मार्च 1972 को महज 38 साल की उम्र में उनका निधन हो गया, लेकिन उनकी अदाकारी और शायरी आज भी जीवित है। उनकी जिंदगी इस बात की मिसाल है कि सच्ची कला अक्सर गहरे दर्द और अनुभवों से जन्म लेती है।

 पिता अनाथालय में छोड़ आए

मीना कुमारी का जन्म 1 अगस्त 1933 को मुंबई (तब बॉम्बे) में हुआ था। उनका बचपन का नाम महजबीं बानो था। उनका जन्म पिता अली बख्श़ के लिए निराशाजनक था क्योंकि वे पुत्र चाहते थे। मीना कुमारी परिवार में दूसरी बेटी थीं, उनकी दो बहनें थीं। बड़ी बहन खुर्शीद जूनियर और छोटी बहन महलीका (मधु), जो बाल कलाकार और अभिनेता महमूद की पत्नी थीं। जब महजबीं का जन्म हुआ, तब उनके पिता को डॉक्टर की फीस देने के पैसे नहीं थे, और उन्हें अनाथालय की सीढ़ियों पर छोड़ दिया, लेकिन कुछ ही समय बाद अब उन्हें पछतावा हुआ तो बेटी को वापस लाए।

खानदान से रिश्ता

मीना कुमारी के पिता, मास्टर अली बख्श़, भेरा (अब पाकिस्तान) से आए एक सुन्नी मुस्लिम थे, जो रंगमंच के कलाकार, हारमोनियम वादक और उर्दू कवि थे। उनकी माता, इकबाल बेगम (मूल नाम प्रभावती देवी), उत्तर प्रदेश के मेरठ की थीं और बंगाली परिवार से संबंध रखती थीं। उन्होंने विवाह के बाद इस्लाम धर्म अपनाया। मीन कुमारी की नानी, हेम सुंदरी टैगोर, रवींद्रनाथ टैगोर के दूर के चचेरे रिश्तेदार की बेटी थीं। उन्होंने अपने पति के निधन के बाद मेरठ जाकर नर्सिंग की और प्यारे लाल शाकिर मेरठी से शादी की, जिससे मीना कुमारी की माता प्रभावती पैदा हुई।

परिवार का सहारा बनीं

मीना कुमारी को फिल्मी करियर में कोई खास दिलचस्पी नहीं थी। वे बचपन से ही पढ़ना चाहती थीं, लेकिन घर की हालत इतनी खराब थी कि चार साल की उम्र में उन्हें परिवार का पेट पालने के लिए फिल्मों में काम करना पड़ा। उनके माता-पिता उन्हें शूटिंग के लिए फिल्म स्टूडियो ले जाने लगे। उन्हें नियमित स्कूल में दाखिला मिला, लेकिन काम की व्यस्तता के कारण पढ़ाई बाधित रही। उन्होंने अपनी शिक्षा मुख्य रूप से निजी ट्यूशन और स्व-अध्ययन से पूरी की।

यह भी पढ़ें : अभिनेत्री सोनम कपूर ने बेटे को दिया जन्म, कई सेलेब्रिटीज ने दी बधाईयां और शुभकामनाएं

चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर करियर की शुरुआत

डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी को फिल्म ‘लेदरफेस’ (1939) में एक बाल कलाकार के रूप में कास्ट किया। यही उनका फिल्मी सफर बेबी महजबीं के नाम से शुरू हुआ। पहले दिन उन्हें 25 रुपए का भुगतान किया गया। बहुत कम उम्र में ही वे बख्श़ परिवार की मुख्य कमाई का स्रोत बन गई थीं। 1962 में फिल्मफेयर को दिए गए एक इंटरव्यू में मीना कुमारी ने बताया था कि चार साल की उम्र से ही अपने माता-पिता का सहारा बनने से उन्हें अपार संतुष्टि मिली।

यह भी देखें : मनोज मीणा का बड़ा बयान, राजपूत इतिहास पर उठाए सवाल | आमेर किला, महाराणा प्रताप पर नई बहस | KBPTimes

बेबी महजबीं से बनीं बेबी मीना

चाइल्ड आर्टिस्ट के तौर पर पर मीना कुमारी ने अधूरी कहानी (1939), पूजा(1940), एक ही भूल(1940), नई रोशनी(1941), विजय (1942), लाल हवेली( 1944) जैसी कई फिल्मों में काम किया। वे कई बार सेट पर इतनी भावुक हो जाती थीं कि रोती थीं, लेकिन जैसे ही कैमरा ऑन होता, उनका अभिनय अपने भीतर की पीड़ा की ताकत के साथ सामने आता था। यही सच्ची संवेदना और गहराई उन्हें बाकी कलाकारों से अलग बनाती थी। फिल्म ‘एक ही भूल की’ शूटिंग के दौरान डायरेक्टर विजय भट्ट ने मीना कुमारी का नाम बेबी महजबीं से बेबी मीना कर दिया। बाद में यही नाम मीना कुमारी के नाम से फेमस हुआ।

फिल्म ‘शारदा’ से मिला ट्रैजडी क्वीन का खिताब

1954-56 के बीच मीना कुमारी ने समाज और ऐतिहासिक कहानियों पर आधारित फिल्मों में काम किया, जिसमें ‘चांदनी चौक’, ‘एक ही रास्ता’, ‘अद्ल-ए-जहांगीर’, ‘हलाकू’, और ‘आजाद’ जैसी फिल्में प्रमुख रही हैं। दिलीप कुमार के साथ उनकी फिल्म ‘आजाद’ दर्शकों में बेहद लोकप्रिय हुई। 1957 में फिल्म शारदा ने मीना कुमारी को ट्रैजडी क्वीन बना दिया। उनके साहस और अभिनय के लिए उन्होंने पहला बंगाल फिल्म जर्नलिस्ट्स एसोसिएशन अवार्ड जीता। इसके बाद की फिल्मों जैसे ‘सहारा’, ‘यहूदी’, ‘फरिश्ता’, ‘चिराग कहां रोशनी कहां’, ने उन्हें लगातार सफलता दिलाई। ‘साहिब बीबी और गुलाम’ (1962) में उनके अभिनय ने उन्हें चार फिल्मफेयर पुरस्कार दिलाए और यह भारत की ऑस्कर प्रविष्टि भी बनी। इसके बाद उन्होंने ‘प्रीत पराई’, ‘कोहिनूर’, ‘भाभी की चूड़ियां’, ‘फूल और पत्थर’ जैसी यादगार फिल्मों में काम किया। 1972 में उनकी अंतिम रिलीज ‘गोमती के किनारे’ और ‘पाकीजा’ थी। ‘पाकीजा’ में उनके प्रदर्शन ने उन्हें मरणोपरांत भी फिल्म फेयर नामांकन दिलाया।

दुनिया से विदा

जब उनकी आखिरी फिल्म पाकीजा 4 फरवरी 1972 में रिलीज हुई, जिसे उनके पति कमाल अमरोही ने डायरेक्ट किया था। इस फिल्म के पूरा होने में 14 साल लगे थे। उन्हें उसके परिणाम देखने के लिए जिंदगी नहीं मिली। वह 28 मार्च 1972 को बीमार पड़ीं, और 31 मार्च 1972 को लीवर सिरोसिस के कारण केवल 38 वर्ष की उम्र में दुनिया से विदा हो गयीं।

ताजा खबरें

ताजा खबरें

Protest Demonstration

जयपुर में भाजपा-कांग्रेस का एक दूसरे के खिलाफ प्रदर्शन, पुलिस से धक्का-मुक्की, दोनों दलों पर चला वाटर कैनन

Brain health

तेज याददाश्त के लिए अपनी डाइट में शामिल करें ये चीजें

Rahul Gandhi

“धर्मेंद्र प्रधान ने भारत की सबसे बड़ी संपत्ति बर्बाद कर दी…” राहुल गांधी ने बोला हमला

CJP Protest

CJP प्रोटेस्ट पर हाईकोर्ट में सुनवाई, दिल्ली पुलिस पर FIR की मांग, क्या मिला जवाब?

Viral Video

सांप के साथ बेड पर लेटकर कार्टून देखता रहा बच्चा, VIDEO देखकर लोग रह गए दंग

Love at first sight

स्थाई प्यार, भरोसे और अच्छे व्यवहार से ही होता है, चेहरे से नहीं

Guru Purnima

गुरु पूर्णिमा पर खास दोहे; इन्हे पढ़कर प्राप्त करें गुरुओं की विशेष कृपा

Acharya Pramod Krishnam

“राहुल गांधी को हटाकर डिंपल यादव को…” आचार्य प्रमोद कृष्णम ने विपक्षी नेताओं को दी नसीहत

Sachin Pilot News

“इतनी जिद, अड़ियल रवैया क्यों?…” कांग्रेस नेता सचिन पायलट ने केंद्र सरकार पर बोला हमला

2

2