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राजस्थान हाईकोर्ट ने 58 साल पुरानी शादी तोड़ने से किया इनकार: कहा- इस उम्र में परिवार की इज्जत दांव पर लगेगी

Rajasthan high court

जयपुर: राजस्थान हाईकोर्ट ने एक बुजुर्ग दंपती की 58 साल पुरानी शादी को खत्म करने से साफ मना कर दिया है। अदालत ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि वैवाहिक जीवन में सामान्य अनबन, झगड़े और उतार-चढ़ाव को क्रूरता नहीं माना जा सकता। इस उम्र (75+ साल) में तलाक मंजूर करने से पत्नी के साथ पूरे परिवार की गरिमा और सामाजिक प्रतिष्ठा को गहरा नुकसान पहुंच सकता है।जस्टिस सुदेश बंसल और जस्टिस अनिल कुमार उपमन की डिवीजन बेंच ने भरतपुर फैमिली कोर्ट के फैसले के खिलाफ पति की अपील (D.B. Civil Miscellaneous Appeal No. 5773/2019) को खारिज कर दिया। दंपती की शादी 29 जून 1967 को हुई थी और दोनों की उम्र 75 साल से ज्यादा है।

लंबे समय तक कोई शिकायत नहीं

हाईकोर्ट ने कहा कि दंपती ने 2013 तक यानी करीब 46 साल बिना किसी बड़ी शिकायत के साथ-साथ जीवन बिताया। पति ने खुद तलाक याचिका (26 मई 2014) में यह बात कबूल की थी। हाईकोर्ट ने टिप्पणी की:
“इतने लंबे समय और बढ़ती उम्र के साथ उनकी सहनशीलता और समझदारी बढ़ी होगी। शुरुआती दौर की छोटी परेशानियां बाद में आसान हो जाती हैं।

“पति के आरोप: झूठी FIR

FIR और संपत्ति का झगड़ा पत्नी ने 2014 में दहेज प्रताड़ना की झूठी FIR दर्ज कराई, जिसे पुलिस ने FR लगा दी, लेकिन इससे बदनामी हुई। पत्नी संपत्ति सिर्फ बड़े बेटे के नाम ट्रांसफर करना चाहती है, जबकि वह दोनों बेटों में बराबर बांटना चाहते हैं। पत्नी बड़े बेटे के प्रभाव में है, उसकी परवाह नहीं करती और खाना भी नहीं बनाती।

पत्नी अन्य महिलाओं से संबंध का आरोप लगाती है

पत्नी का पक्ष: पति संपत्ति बर्बाद कर रहे
पत्नी ने जवाब दिया: पति पारिवारिक संपत्ति बांटकर और बर्बाद करने की आदत रखते हैं, इसे रोकने के लिए विरोध किया। पति छोटे भाई के प्रभाव में तलाक याचिका दायर कर रहे हैं। पति के अन्य महिलाओं से संबंध हैं; एक महिला को कमरे में बुलाया, विरोध पर धक्का मारा। मजबूरन FIR दर्ज करानी पड़ी। संपत्ति खुद उसने खरीदी थी। हाईकोर्ट ने माना कि पुलिस ने FIR को गलत ठहराकर FR लगा दी, लेकिन अन्य महिला की घटना को पूरी तरह झूठा नहीं पाया।

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फैमिली कोर्ट का फैसला बरकरार

भरतपुर फैमिली कोर्ट ने 18 अक्टूबर 2019 को तलाक याचिका खारिज की थी। कोर्ट ने कहा था कि लंबे वैवाहिक जीवन में कोई गंभीर क्रूरता साबित नहीं हुई। विवाद मुख्य रूप से संपत्ति बंटवारे का है, जो हिंदू मैरिज एक्ट की धारा 13 के तहत क्रूरता नहीं माना जा सकता।हाईकोर्ट ने फैमिली कोर्ट के फैसले को सही ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। यह फैसला बुजुर्ग दंपतियों में संपत्ति विवाद को तलाक का आधार बनाने के खिलाफ मजबूत संदेश है और परिवार की एकता पर जोर देता है।

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