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शंकराचार्य बनने के लिए करनी पड़ती है कौन सी पढ़ाई ?

Shankaracharya

Education: हिंदू धर्म में सर्वाेच्च माने जाने वाले शंकराचार्य पद के लिए कौन सी पढ़ाई करनी पडती है ?. आपको जानकारी देते हैं – यह पद केवल नामांकन या चुनाव से नहीं मिलता, बल्कि इसके लिए कठिन शास्त्रीय पैमाने तय हैं-

ब्रह्मचारी और दंडी संन्यासी
शंकराचार्य बनने के लिए व्यक्ति का दंडी संन्यासी होना जरूरी है। उसे सांसारिक मोह-माया का त्याग कर ब्रह्मचर्य का पालन करना होता है।
वेदों का ज्ञान
उम्मीदवार को चारों वेदों, उपनिषदों और षड्दर्शन (छह दर्शनों) की गहन जानकारी होना चाहिए।

संस्कृत में निपुणता
उसकी संस्कृत भाषा पर मजबूत पकड़ होनी चाहिए ताकि, वह दुनिया के किसी भी विद्वान के साथ दार्शनिक और धार्मिक वाद-विवाद कर सके।
शास्त्रार्थ
यह सबसे कठिन चरण है। चुने गए शिष्य को अन्य मठों के शंकराचार्यों, आचार्य महामंडलेश्वरों और प्रतिष्ठित संतों की सभा के सामने शास्त्रों पर कठिन सवाल पूछे जाते हैं, जिसके जरिए उनके ज्ञान को परखा जाता है।
त्याग और तपस्यारू केवल किताबी ज्ञान ही काफी नहीं है, बल्कि व्यक्ति का आचरण शुद्ध, संयमित और लोक कल्याण के प्रति पूरी तरह समर्पित होना चाहिए।
काशी विद्वत परिषदरू वाराणसी के प्रकांड विद्वानों की परिषद (विद्वत परिषद) जब योग्यता पर अपनी मुहर लगाती है, तभी नाम फाइनल होता है। जिसके बाद विधिवत श्पट्टाभिषेकश् किया जाता है।

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स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद कितने पढ़े हैं ?

ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की विद्वत्ता जगजाहिर है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का जन्म उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में हुआ था। संन्यास लेने से पहले उनका नाम उमाशंकर था। उन्होंने अपनी शुरुआती पढ़ाई गांव से ही हासिल की। इसके बाद उन्होंने वाराणसी के मशहूर संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से आगे की पढ़ाई पूरी की।

उन्होंने संस्कृत व्याकरण, साहित्य और धर्मशास्त्र में शास्त्री और आचार्य की उपाधि हासिल की, जो स्नातक (ठ।) और स्नातकोत्तर (ड।) के समकक्ष मानी जाती हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने संस्कृत और धर्मशास्त्रों में शोध करते हुए डॉक्टरेट (च्ीक्) की डिग्री भी हासिल की है। उनकी इसी शैक्षणिक योग्यता और शास्त्रों पर मजबूत पकड़ के कारण उन्हें उनके गुरु ब्रह्मलीन शंकराचार्य स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती ने अपना उत्तराधिकारी चुना था।

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