KBP Times

मायावती की राजनीति में आज भी है ‘दम’, वक्त आने पर कर सकती हैं बड़ा सियासी उलटफेर

मायावती की राजनीति में आज भी है ‘दम’

भारतीय राजनीति में कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जिन्हें समय के साथ कमतर आंकना आसान लगता है, लेकिन इतिहास बार‑बार साबित करता है कि वे अचानक सियासी समीकरण बदलने की ताकत रखते हैं। बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती भी उन्हीं नेताओं में शामिल हैं। भले ही आज उनकी पार्टी सत्ता से दूर हो, लेकिन उन्हें राजनीति से बाहर मान लेना अब भी किसी के लिए आसान नहीं है।

संघर्ष से सियासत तक का सफर

मायावती ने राजनीति में कदम उस दौर में रखा, जब दलित समाज की आवाज मुख्यधारा की राजनीति में सीमित थी। छात्र जीवन से ही उन्होंने सामाजिक सम्मान और पहचान की लड़ाई को गंभीरता से लिया। शुरुआती दौर में ही उन्होंने जाति आधारित अपमान और शब्दावली पर खुलकर विरोध दर्ज कराया, जिससे उनकी अलग पहचान बनी।

कांशीराम से मुलाकात ने बदली दिशा

कांशीराम से मुलाकात मायावती के जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई। प्रशासनिक सेवा की तैयारी कर रहीं मायावती ने राजनीति को अपना माध्यम बनाया। बहुजन समाज पार्टी के गठन के बाद उन्होंने संगठन को जमीन से मजबूत किया और दलित‑बहुजन समाज को एकजुट करने में अहम भूमिका निभाई।

सत्ता तक पहुंच और मजबूत पकड़

उत्तर प्रदेश की राजनीति में मायावती ने कई बार सत्ता का स्वाद चखा। गठबंधन सरकारों से लेकर अपने दम पर बहुमत हासिल करने तक, उनका सफर आसान नहीं था। 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ सरकार बनाना उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में गिना जाता है। इस दौरान उन्होंने दलितों के साथ‑साथ ब्राह्मण और अन्य वर्गों को भी अपने साथ जोड़ने की रणनीति अपनाई।

सत्ता से बाहर, लेकिन सियासी असर कायम

पिछले कुछ वर्षों से बसपा सत्ता से दूर जरूर है, लेकिन उसका कोर वोट बैंक अब भी बरकरार माना जाता है। कई राज्यों में पार्टी की मौजूदगी सीमित हुई है, फिर भी चुनावी राजनीति में बसपा को नजरअंदाज करना किसी भी दल के लिए जोखिम भरा हो सकता है। हाल के चुनावों में छिटपुट जीत ने यह संकेत दिया है कि पार्टी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है।

संसद से सड़क तक मुखर आवाज

मायावती ने संसद में भी कई बार आक्रामक और बेबाक रुख अपनाया है। सामाजिक न्याय, दलित उत्पीड़न और सरकारी नीतियों पर उनका तीखा अंदाज उन्हें अन्य नेताओं से अलग बनाता है। विरोध के दौरान उनके बयान अक्सर राष्ट्रीय बहस का हिस्सा बन जाते हैं।

रणनीति और धैर्य की राजनीति

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मायावती की सबसे बड़ी ताकत उनकी रणनीति और धैर्य है। वे जल्दबाजी में फैसले नहीं लेतीं और सही समय का इंतजार करती हैं। यही वजह है कि उनके समर्थक मानते हैं कि यदि परिस्थितियां अनुकूल हुईं, तो मायावती एक बार फिर राजनीति में बड़ा ‘चमत्कार’ कर सकती हैं।

निष्कर्ष

आज भले ही बसपा का दायरा पहले जितना बड़ा न हो, लेकिन मायावती का नाम अब भी सियासी समीकरणों को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। उत्तर भारत की राजनीति में उनका प्रभाव पूरी तरह खत्म हुआ है, ऐसा कहना जल्दबाजी होगी। इतिहास गवाह है कि मायावती को कम आंकने वाले अक्सर चौंकते रहे हैं।

यह भी पढ़ें : तारक मेहता का उल्टा चश्मा की टीम ने Pinkcity Jaipur में उड़ाई पतंग

ताजा खबरें

ताजा खबरें

Election in America

अमेरिका में Midterm चुनाव के लिए Voting जारी; ट्रम्प हारे तो Powerless President होंगे

Amit Shah and Rahul Gandhi

गृह मंत्री बोले- सरकार हर मुद्दे पर चर्चा को तैयार, राहुल ने दिया पीएम मोदी को बहस का चैलेंज

Tushar kapoor

एक्टर तुषार कपूर को लॉरेंस गैंग की धमकी, पांच करोड़ मांगे, हैरी बॉक्सर के नाम से आया फोन

DRDO

भारत ने एक लॉन्चर से 2 मिसाइलें दागीं, 500 किलोमीटर दूर 2 टारगेट का टेस्ट सफल

Shikhar Agarwal IAS and Prashakha mathur

IAS शिखर ने जिस कंपनी से 40 विला खरीदे उसके सरकारी फायदों पर रोक, IPS पत्नि से मांगा स्पष्टीकरण

Sharad pawar admit in hospital

शरद पवार के सीने में दर्द की शिकायत के बाद अस्पताल में कराया भर्ती; हालत स्थिर, निगरानी में रखा

Awarness Program in Jaipur

जयपुर में हृदय रोग जागरूकता शिविर का आयोजन, समाज की प्रतिभाओं का भी सम्मान

Sardar patel jayanti

जयपुर कलेक्ट्रेट में मनाई गई सरदार पटेल की 151वीं जयंती, जिला कलक्टर संदेश नायक ने दिलाई राष्ट्रीय एकता की शपथ

UCC Protest by All India Ulama Board

महाराष्ट्र में UCC के खिलाफ ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड का विरोध, मुंबई में कॉन्फ्रेंस कर सरकार को सौंपे सुझाव

2

2