Unnao Rape Case: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बड़ा फैसला सुनाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी, जिसमें बीजेपी से निष्कासित पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर की उम्रकैद की सज़ा को निलंबित कर उन्हें ज़मानत दी गई थी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली तीन जजों की पीठ ने कहा कि आमतौर पर बिना आरोपी को सुने ऐसे आदेश पर रोक नहीं लगाई जाती, लेकिन इस मामले की परिस्थितियां अलग हैं। अदालत ने साफ किया कि सेंगर को आईपीसी की धारा 304-II के तहत भी सज़ा मिली है, जो पीड़िता के पिता की गैर-इरादतन हत्या से जुड़ा मामला है, इसलिए हाईकोर्ट के आदेश के आधार पर उनकी रिहाई नहीं होगी।
पॉक्सो कानून और लोक सेवक की परिभाषा पर बहस
सुनवाई के दौरान सीबीआई की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि हाईकोर्ट ने यह मानने में गलती की कि पॉक्सो अधिनियम के तहत गंभीर अपराध की धाराएं इस मामले में लागू नहीं होतीं। उन्होंने कहा कि पॉक्सो कानून यौन उत्पीड़न की गंभीरता को अपराधी की स्थिति और उसके प्रभाव से जोड़ता है। सेंगर उस समय क्षेत्र के एक ताकतवर विधायक थे और उन्होंने अपने प्रभुत्व का दुरुपयोग किया। मेहता ने कहा कि पॉक्सो अधिनियम में ‘लोक सेवक’ की अलग से परिभाषा नहीं है और इसे संदर्भ के अनुसार देखा जाना चाहिए। उन्होंने जोर देते हुए कहा, “हम उस बच्ची के प्रति जवाबदेह हैं।”
बचाव पक्ष की दलीलें और अदालत की टिप्पणी
वहीं सेंगर की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ दवे और एन. हरिहरन ने सीबीआई की दलीलों का विरोध किया। उनका कहना था कि पॉक्सो के तहत गंभीर अपराधों के लिए विधायक को लोक सेवक नहीं माना जा सकता और किसी कानून की परिभाषा दूसरे कानून में तब तक नहीं ली जा सकती, जब तक उसका स्पष्ट प्रावधान न हो। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने चिंता जताते हुए कहा कि अगर ऐसी व्याख्या मानी गई, तो कांस्टेबल या पटवारी लोक सेवक होंगे लेकिन विधायक और सांसद नहीं। गौरतलब है कि 23 दिसंबर को दिल्ली हाईकोर्ट के ज़मानत आदेश के बाद से ही पीड़िता, उनके परिवार और सामाजिक संगठनों ने इसका लगातार विरोध किया था।
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