Mission : चंद्रमा पर इंसानों की बस्ती बसाने का ख्वाब और इसकी संभावना की खोज के लिए अंतरिक्ष यात्रा पर गए चार यात्री धरती पर लौट आए हैं। चारों यात्री चंद्रमा पर नहीं उतरे लेकिन चंद्रमा के सबसे नजदीक जाकर फोटो लेकर आए हैं। आज 11 अप्रैल को सुबह 5.37 बजे अमेरिका का अंतरिक्ष यान सैन डिएगो के तट के पास प्रशांत महासागर में स्प्लैशडाउन हुआ। नासा के आर्टेमिस 2 मिशन के तहत चार अंतरिक्ष यात्री चंद्रमा की दहलीज को छूकर धरती पर वापस लौट आए हैं। ये मिशन 2 अप्रैल को लॉन्च हुआ था।
चांद के अंधेरे हिस्से की फोटोग्राफी
जानकारी के अनुसार कि 1972 के बाद यह पहली बार है, जब इंसान चंद्रमा के इतने करीब पहुंचा है। आर्टेमिस 2 मिशन के अंतरिक्ष यात्रियों ने 6 अप्रैल को पृथ्वी से सबसे ज्यादा दूरी तक यात्रा करके किसी भी इंसानी अंतरिक्ष मिशन का रिकॉर्ड तोड़ा था। उन्होंने चांद के अंधेरे हिस्से की फोटोग्राफी भी की थी। इस मिशन का मकसद स्पेसक्राफ्ट के लाइफ सपोर्ट सिस्टम की जांच करना था। नासा देखना चाहता था कि अंतरिक्ष में इंसानों के रहने के लिए यह कितना सुरक्षित है। यान अभी चंद्रमा की सतह पर नहीं उतरा, लेकिन भविष्य में चंद्रमा पर इंसानों के बसने का रास्ता आसान बनाएगा।
ऐसे रही यान की लैंडिंग
सुबह 5:03 AM: सर्विस मॉड्यूल से अलग होने के बाद यान की हीट शील्ड सक्रिय हो गई। घर्षण की वजह से यान के बाहर का तापमान करीब 3,000 डिग्री फेरनहाइट तक पहुंच गया। इस दौरान लगभग 6 मिनट के लिए ‘कम्युनिकेशन ब्लैकआउट’ रहा। यानी धरती से संपर्क टूट गया। ऐसा तापमान के बढ़ने से यान के चारों ओर प्लाज्मा की परत बनने से हुआ। सुबह 5:23 AM : यान जब करीब 22 हजार फीट की ऊंचाई पर था तो ड्रोग पैराशूट खुले। पैराशूट ने समुद्र में गिरने से पहले ओरियन की रफ्तार कम की और उसे स्थिर बनाया। सुबह 5:34 AM: करीब 6,000 फीट की ऊंचाई पर छोटे पैराशूट अलग हो गए और तीन मुख्य पैराशूट खुले। इससे ओरियन की रफ्तार घटकर 218 किमी प्रति घंटे से भी कम रह गई। सुबह 5:37 AM: रफ्तार धीमी होकर सिर्फ 51 किमी प्रति घंटा रह गई और ओरियन सैन डिएगो के तट के पास प्रशांत महासागर में उतर गया। 11.17 लाख किमी लंबी यात्रा पूरी हुई।
42 हजार किमी प्रति घंटा रफ्तार
धरती के वायुमंडल में प्रवेश करते समय ओरियन स्पेसक्राफ्ट की रफ्तार 40,000 से 42,000 किमी प्रति घंटा थी। यह इंटरनेशनल स्पेस स्टेशन (ISS) से लौटने वाले यानों की तुलना में बहुत ज्यादा है। अधिक रफ्तार और गुरुत्वाकर्षण के कारण पैदा होने वाले भारी दबाव और गर्मी को सहने के लिए इस यान को खास तौर पर मजबूत बनाया गया था।
चांद के इतने करीब
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार इस मिशन में अमेरिका के रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और कनाडा के जेरेमी हेंसन शामिल थे। ये चारों एस्ट्रोनॉट्स 50 साल से भी ज्यादा समय के बाद चंद्रमा के करीब जाने वाले पहले इंसान बन गए हैं। हालांकि, इन्होंने चांद पर लैंडिंग नहीं की, लेकिन इनका स्पेसक्राफ्ट धरती से 4,06,778 किमी की दूरी तक गया। यह दूरी 1970 के मशहूर अपोलो-13 मिशन द्वारा तय की गई दूरी से भी करीब 6,606 किमी ज्यादा है।
अब 2028 में चांद पर उतरने की तैयारी
मीडिया रिपोर्ट के अनुसार आर्टेमिस-2 मिशन की इस सफलता ने साल 2028 में होने वाली मानव लैंडिंग का रास्ता साफ कर दिया है। नासा का लक्ष्य केवल चांद पर फिर से जाना ही नहीं, बल्कि वहां इंसानों के रहने के लिए एक परमानेंट बेस बनाना भी है। इस सफलता के बाद अब चांद का इस्तेमाल भविष्य में मंगल और अन्य ग्रहों की यात्रा के लिए एक लॉन्चपैड के रूप में किया जा सकेगा।
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अपोलो और आर्टेमिस प्रोग्राम में बड़ा अंतर
जानकारी के अनुसार 70 के दशक में हुए अपोलो मिशन का मुख्य उद्देश्य सोवियत संघ के साथ चल रही ‘स्पेस रेस’ में खुद को बेहतर साबित करना था। आर्टेमिस प्रोग्राम पूरी तरह से भविष्य की तैयारी है। नासा इस बार चांद पर एक स्थायी बेस बनाना चाहता है, ताकि इंसान वहां रहकर काम करना सीख सके। यह अनुभव भविष्य में मंगल पर जाने के सपने को पूरा करने में मदद करेगा। इस मिशन से पहले केवल 24 लोग ही चांद के पास या उसकी सतह तक पहुंच पाए हैं। वे सभी अमेरिकी एस्ट्रोनॉट्स थे। सभी 1968 से 1972 के बीच चले अपोलो मिशन का हिस्सा थे। नासा के ‘अपोलो प्रोग्राम’ में क्रू और बिना क्रू वाले मिलाकर कुल 17 मिशन हुए। अगर सिर्फ उन मुख्य मिशनों की बात करें जिनमें अंतरिक्ष यात्री शामिल थे, तो ये 11 थे।
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