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महाभारत के रचियता महर्षि वेदव्यास के जन्म की कहानी

maharishi vedvyas

Maharishi Ved vyas : महाभारत का नाम आते ही सबसे पहले कौरवों और पांडवों के बीच हुए महायुद्ध तथा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए श्रीमद्भगवद्गीता के उपदेश की याद आती है। लेकिन महर्षि वेदव्यास रचित महाभारत केवल युद्ध का ग्रंथ नहीं है। इसमें अनेक राजवंशों, महायोद्धाओं, ऋषि-मुनियों और उनके जन्म से जुड़ी अद्भुत कथाओं का भी विस्तार से वर्णन मिलता है। महर्षि वेदव्यास के जन्म की कहानी भी बडी दिलचस्प और रोमांचित करती है।

इस तरह हुआ महर्षि वेद व्यास का जन्म

मत्‍स्‍यगंधा अपनी पिता की सेवा के लिए यमुना के जल में नाव चलाया करती थी। एक दिन तीर्थयात्रा के उद्देश्‍य से सब ओर विचरने वाले महर्षि पराशर ने उसे देखा। वह अतिशय रुप सौन्दर्य से सुशोभित थी। सिद्धों के हृदय में भी उसे पाने की अभिलाषा जाग उठती थी। उस दिव्‍य सुकुमारी को देखकर परम बुद्धिमान मुनिवर पराशर ने उसके साथ समागम की इच्‍छा प्रकट की। इस पर सत्यवती ने कहा कि देखिये नदी के आर-पार दोनों तटों पर बहुत से ऋषि खड़े हैं। और हम दोनों को देख रहे हैं। ऐसी दशा में हमारा समागम कैसे हो सकता है? उसके ऐसा कहने पर शक्तिशाली भगवान पराशर ने कुहरे की सृष्टि की। जिससे वहां का सारा प्रदेश अंधकार से आच्छादित सा हो गया। महर्षि द्वारा कुहरे की सृष्टि देखकर वह तपस्विनी कन्‍या आश्चर्यचकित एवं लज्जित हो गयी।

सदा नारीपन का वरदान

सत्‍यवती ने कहा कि भगवन! आपको मालूम होना चाहिए कि मैं सदा अपने पिता के अधीन रहने वाली कुमारी कन्‍या हूं। आपके संयोग से मेरा कन्‍या भाग (कुवारीपन) दूषित हो जायेगा। कन्‍या भाग दूषित हो जाने पर मैं कैसे अपने घर जा सकती हूं। अपने कन्‍यापन के कलंकित हो जाने पर मैं जीवित रहना नहीं चाहती। इस बात पर भलि-भाँति विचार करके जो उचित जान पड़े, वह कीजिए। मुनिश्रेष्ठ पराशर प्रसन्न होकर बोले कि मेरा प्रिय कार्य करके भी तुम कन्‍या ही रहोगी। तुम जो चाहो, वह मुझसे वर मांग लो। शुचिस्मिते! आज से पहले कभी भी मेरा अनुग्रह व्यर्थ नहीं गया है’। महर्षि के ऐसा कहने पर सत्‍यवती ने अपने शरीर में उत्तम सुगन्‍ध होने का वरदान मांगा। भगवान पराशर ने उसे इस भूतल पर वह मनोवांछित वर दे दिया।

दिव्य सुगंध से फैली कीर्ती

वरदान पाकर प्रसन्न हुई सत्यवती नारीपन के समागमोचित गुण से विभूषित हो गयी और उसने अद्भुतकर्मा महर्षि पराशर के साथ समागम किया। उसके शरीर से उत्तम गंध फैलने के कारण पृथ्‍वी पर उसका गन्धवती नाम विख्यात हो गया। इस पृथ्‍वी पर एक योजन दूर के मनुष्य भी उसी दिव्य सुगंध का अनुभव करते थे इस कारण उसका दूसरा नाम योजनगन्धा हो गया। इस प्रकार परम उत्तम वर पाकर हर्षाेल्लास के भरी हुई सत्यवती ने महर्षि पराशर का संयोग प्राप्त किया और तत्काल ही एक शिशु को जन्म दिया। जो आगे चलकर वेदव्यास कहलाएं।

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