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Film Review: दमदार एक्शन, कमजोर कहानी, बॉबी दयोल और आलिया के प्रभावी अभिनय से सजी ‘अल्फा’

film review Alpha

Alpha :  यशराज स्पाई यूनिवर्स की पहली फीमेल लीड फिल्म अल्फा अपनी दमदार कहानी लेकर नए कॉन्सेप्ट के साथ सिनेमाघरों में उतरी है। बॉबी दयोल और आलिया भट्ट का अभिनय भी प्रभावशाली है लेकिन कमजोर कहानी ने फिल्म को वो उंचाई नहीं दी जिसकी यह फिल्म हकदार है। अल्फा के ट्रेलर से उम्मीद थी कि यह स्पाई यूनिवर्स को नया मुकाम देगी, लेकिन फिल्म उस उम्मीद पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती। डायरेक्टर शिव रवैल ने इसे इंटरनेशनल स्पाई थ्रिलर का लुक देने में मेहनत की है।

फिल्म को फाइनल वर्डिक्ट

अल्फा ऑन स्क्रीन दृश्य अच्छे बन पडे हैं , एक्शन दमदार है और बॉबी देओल अपने किरदार से सबसे ज्यादा प्रभावित भी करते हैं। आलिया ने भी पूरी ईमानदारी से फिल्म को संभालने की कोशिश की है। इंटरवल के बाद फिल्म रोमांचक बनती है जब बॉबी देओल के ग्रे शेड वाले किरदार का एक बड़ा सच सामने आता है। यही ट्विस्ट कहानी में नई जान डालता है और कुछ देर के लिए फिल्म धुरंधर जैसी स्पाई थ्रिलर वाली फील देने लगती है। हालांकि, इसके बाद भी कमजोर स्क्रीनप्ले फिल्म को पूरी तरह उड़ान नहीं भरने देता। अगर आप बड़े पर्दे पर स्टाइलिश एक्शन और यशराज स्पाई यूनिवर्स के फैन हैं तो फिल्म एक बार देख सकते हैं, लेकिन कहानी के लेवल पर यह आपको पूरी तरह संतुष्ट नहीं कर पाएगी।

फिल्म की कहानी

करीब 140 मिनट लंबी फिल्म की शुरुआत 27 जुलाई 1999 से होती है। इंडियन आर्मी के विक्रांत कौल (अनिल कपूर) और फतेह सिंह लाखावत (बॉबी देओल) देश की सबसे खतरनाक सीक्रेट फोर्स बनाने का सपना देखते हैं। इसी सोच से टीम अल्फा की शुरुआत होती है, जिसके सैनिकों को अल्फा सीरम दिया जाता है। यह सीरम इंसान की ताकत, रिफ्लेक्स और रिकवरी को कई गुना बढ़ा देता है। इसी दौरान विक्रांत अपनी गर्भवती पत्नी जानकी (दिया मिर्जा) की जान बचाने के लिए उसे भी अल्फा सीरम दे देता है। यह फैसला उसकी पूरी जिंदगी बदल देता है। फतेह का मानना होता है कि इस सीरम पर सिर्फ सेना का हक था। वह विक्रांत की नवजात बेटी को उससे अलग कर देता है और उसे यकीन दिला देता है कि उसकी बेटी मर चुकी है। सालों बाद वही बेटी सीता (आलिया भट्ट) फतेह की निगरानी में एक खतरनाक हथियार बन चुकी होती है। बचपन से उसे मिशन दिए जाते हैं और वह देश के दुश्मनों को खत्म करती रहती है, लेकिन एक दिन उसे पता चलता है कि जिस इंसान को वह अपना गुरु मानती रही, वही सबसे बड़ा गुनहगार है। दूसरी तरफ स्पेन में पली विक्रांत की दूसरी बेटी दुर्गा (शरवरी) की एंट्री होती है। दोनों बहनों का आमना सामना होता है और कहानी ऑपरेशन ओडिसी के रहस्य तक पहुंचती है। आखिर फतेह का असली मिशन क्या है, ऑपरेशन ओडिसी के पीछे उसका मकसद क्या है और क्या सीता उसे रोक पाएगी, फिल्म का क्लाइमैक्स इन्हीं सवालों के जवाब देता है।

फिल्म में एक्टिंग

सीता के किरदार में आलिया ने पूरी मेहनत की है। उन्होंने एक्शन सीक्वेंस में अपनी पूरी ताकत झोंक दी है और कई सीन में प्रभाव भी छोड़ती हैं। हालांकि, इमोशनल सीन में उनका किरदार दर्शकों से उतना जुड़ नहीं पाता, जितनी जरूरत थी। शरवरी को स्क्रीन स्पेस कम मिला है, लेकिन जितना मौका मिला उसमें उन्होंने अच्छा काम किया है और अपने किरदार के साथ न्याय किया है। बॉबी देओल फिल्म के सबसे बड़े सरप्राइज पैकेज हैं। फतेह सिंह लाखावत के रोल में उनका जुनून, खामोशी और खतरनाक स्क्रीन प्रेजेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरती है। अनिल कपूर भी अपने किरदार में पूरी तरह फिट बैठते हैं। वहीं, फिल्म के आखिर में ऋतिक रोशन का कैमियो स्पाई यूनिवर्स के फैंस के लिए एक अच्छा सरप्राइज बनकर आता है और आगे की फिल्मों के लिए उत्सुकता भी बढ़ा देता है।

फिल्म में डायरेक्शन और टेक्निकल पक्ष

डायरेक्टर शिव रवैल ने फिल्म को हॉलीवुड स्टाइल का स्पाई थ्रिलर बनाने का पूरा प्रयास किया है। सिनेमैटोग्राफी शानदार है। सेपिया टोन, बड़े सेट्स और खूबसूरत लोकेशंस फिल्म को देखने में शानदार बनाते हैं। आलिया और शरवरी के बीच पहला फाइट सीक्वेंस फिल्म का सबसे मजबूत हिस्सा है। कहानी के लेवल पर फिल्म कई जगह कमजोर पड़ जाती है। स्क्रीनप्ले ढीला है और कई घटनाएं बिना ठोस आधार के आगे बढ़ती हैं। कुछ ट्विस्ट जरूर हैं, लेकिन उनमें वह रोमांच नहीं है जो दर्शकों को पूरी फिल्म बांधकर रख सके। इमोशनल सीन में भी फिल्म असर छोड़ने में नाकाम रहती है। कई जगह स्पाई एजेंट्स को इतना सुपरह्यूमन बना दिया गया है कि कहानी वास्तविकता से दूर जाती महसूस होती है। इतने अच्छे कॉन्सेप्ट के बावजूद, कहानी प्रभाव नहीं छोडती।

फिल्म का संगीत

फिल्म का संगीत फिल्म के मिजाज के अनुरुप है लेकिन गानों में ऐसा कोई ट्रैक नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद भी याद रह जाए।

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