Supreme Court Order : देश में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश के स्थान पर कैबिनेट मंत्री को रखे जाने के विरोध में याचिका पर निर्णय देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मामले को बड़ी बेंच को सौंपने को कहा है। फैसले को लेकर दो जजों की अलग राय रही इसलिए अब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ती का फैसला बड़ी बेंच करेगी। बड़ी बेंच को मामला भेजने पर जस्टिस दत्ता और जस्टिस शर्मा एकमत नहीं है इसलिए अब सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की बेंच यह तय करेगी कि इस मामले की सुनवाई 5 जजों की बेंच करे या नहीं। मामला संविधान पीठ के पास भेजा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह बंटा हुआ फैसला CEC और ECI एक्ट की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनाया है।
SC ने 30 जुलाई को सुरक्षित रखा था फैसला
सुप्रीम कोर्ट में 2023 के चुनाव आयुक्त अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को बड़ी पीठ के पास भेजने की मांग की गई थी. इस कानून में चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए चयन समिति में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) की जगह कैबिनेट मंत्री को रखा गया है. इसी प्रावधान को चुनौती दी जा रही है. केंद्र सरकार ने संविधान के अनुच्छेद 145(3) के तहत मामले को बड़ी बेंच भेजने की अपील की थी. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने 30 जुलाई को इस मांग पर फैसला सुरक्षित रखा था.
हमारी राय अलग-अलग
जस्टिस दत्ता ने सरकार की इस मांग को खारिज कर दिया और 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामले पर अपनी प्रारंभिक राय दी. जस्टिस दत्ता ने फैसला सुनाते हुए कहा, हमने इन याचिकाओं पर पांच दिनों से अधिक समय तक सुनवाई की. एकमत होकर बोलने से संस्थागत एकता को बल मिलता. दुर्भाग्यवश, हमारी राय अलग-अलग है. संवैधानिक व्यवस्था का यह मूलभूत सिद्धांत है कि शासक कानून से बंधे होते हैं, उससे ऊपर नहीं।
फैसला बड़ी बेंच को करना चाहिए
जस्टिस शर्मा ने जस्टिस दत्ता की बातों से असहमति जताई. उन्होंने कहा कि इस मामले में कानून का एक महत्वपूर्ण सवाल है, जिसका फैसला बड़ी पीठ को करना चाहिए. मतभेद के कारण बेंच ने आदेश दिया कि मामला मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा जाए. वे तय करेंगे कि संविधान पीठ बनाकर इसकी वैधता पर फैसला लिया जाए या नहीं. जस्टिस दत्ता ने कहा कि चुनाव आयोग का सिर्फ स्वतंत्र होना काफी नहीं है, वह स्वतंत्र दिखना भी चाहिए।
कैबिनेट मंत्री पीएम के खिलाफ कैसे जाएगा
उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री द्वारा नामित मंत्री से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह प्रधानमंत्री के खिलाफ जाए, क्योंकि सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत उसे रोकता है. जस्टिस दत्ता ने कहा कि यह उम्मीद बेकार है कि कैबिनेट मंत्री नेता या सरकार से असहमत होगा। मंत्रियों को शामिल करने से वह स्वतंत्र संतुलन नहीं मिलता जो निष्पक्ष चयन के लिए जरूरी है।
याचिकाओं में क्या कहा गया है?
2023 के कानून के तहत चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का पैनल प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री से बना है. याचिकाओं में कहा गया है कि मुख्य न्यायाधीश को चयन प्रक्रिया से बाहर रखने से स्वतंत्र चुनाव आयोग की संवैधानिक जरूरत का उल्लंघन होता है. यह चुनौती अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के 2023 के फैसले से निकली है. उसमें कहा गया था कि जब तक संसद कानून नहीं बनाती, तब तक नियुक्तियां प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति करेगी ।
यह भी देखें- KBP Times का एक साल बेमिसाल | 1st Anniversary | जयपुर से देश-दुनिया तक खबरों का सफर



