Ajmer Nagar Nigam : अजमेर कांग्रेस की अंदरूनी राजनीति का असर अब नगर निगम के आयोजनों तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। कभी शहर कांग्रेस में समानांतर गतिविधियों को लेकर चर्चा होती थी, अब नगर निगम के धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में भी अलग-अलग खेमों की तस्वीर सामने आने लगी है। दुर्गा पूजा महोत्सव को लेकर भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों के बीच पैदा हुआ विवाद इसी राजनीतिक खींचतान की नई कड़ी बन गया है। नगर निगम के बुलावे को दरकिनार कर कांग्रेस पार्षदों ने अलग से दुर्गा पूजा महोत्सव आयोजित किया। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा शुरू हो गई है कि कहीं यह विवाद विजयदशमी पर भी अलग-अलग रावण दहन तक तो नहीं पहुंच जाएगा? यदि ऐसा हुआ तो सवाल केवल दो आयोजनों का नहीं होगा, बल्कि नगर निगम की सामूहिक परंपराओं और निर्वाचित प्रतिनिधियों के आपसी समन्वय पर भी उठेगा।
कांग्रेस की पुरानी कहानी, नए किरदार!
अजमेर शहर कांग्रेस की राजनीति में समानांतर गतिविधियों का मुद्दा नया नहीं है। विजय जैन के शहर जिला कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए पूर्व आरटीडीसी अध्यक्ष धर्मेंद्र सिंह राठौड़ की राजनीतिक गतिविधियों को लेकर समानांतर नेतृत्व की चर्चा होती रही थी। अब डॉ. राजकुमार जयपाल के अध्यक्षीय कार्यकाल में विजय जैन की भूमिका को लेकर ऐसी ही चर्चाएं फिर सुनाई देने लगी हैं। राजनीतिक समीक्षकों के बीच सवाल है कि क्या कांग्रेस की अंदरूनी खींचतान अब निगम में निर्वाचित पार्षदों के व्यवहार और आयोजनों को भी प्रभावित कर रही है? जिस पार्टी में संगठनात्मक एकजुटता को लेकर लगातार सवाल उठते रहे हैं, उसके पार्षदों का अलग आयोजन करना इस चर्चा को और हवा देता है।
दुर्गा पूजा पर ऐसा क्या हुआ कि अलग पंडाल लगाना पड़ा?
अजमेर नगर निगम पिछले करीब 36 वर्षों से दुर्गा पूजा महोत्सव आयोजित करता रहा है। इन आयोजनों में भाजपा और कांग्रेस के पार्षदों की भागीदारी रहती थी। लेकिन इस बार महोत्सव की समितियों के गठन को लेकर विवाद सामने आया। जानकारी के अनुसार, महापौर अनामिका शर्मा ने महोत्सव के लिए पांच समितियों का गठन किया, जिनमें एक समिति का संयोजक कांग्रेस पार्षद को बनाया गया। कांग्रेस पार्षदों ने समिति गठन में पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिलने पर आपत्ति जताई। इसी दौरान भाजपा पार्षद सतीश बंसल के कथित अभद्र व्यवहार को लेकर भी विवाद खड़ा हो गया। कांग्रेस पार्षदों ने इसे अपने साथ भेदभाव का मामला बताते हुए 11 अक्टूबर को आजाद पार्क में आयोजित दुर्गा महोत्सव के पहले दिन के कार्यक्रम का बहिष्कार कर दिया। इसके बाद कांग्रेस पार्षदों ने पाल बीसला स्थित गढ़वाल पैलेस में अलग से दुर्गा पूजा का आयोजन किया। अब सवाल यह है कि क्या समितियों में प्रतिनिधित्व को लेकर पैदा हुआ विवाद बातचीत से नहीं सुलझाया जा सकता था? क्या धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन भी राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई का मैदान बनेंगे?
किरण गढ़वाल ने महापौर को ठहराया जिम्मेदार
कांग्रेस की ओर से महापौर पद की प्रत्याशी रही किरण गढ़वाल ने अलग आयोजन के लिए महापौर को जिम्मेदार ठहराया। उनका कहना है कि कांग्रेस पार्षद अब अलग ही दुर्गा पूजा महोत्सव करेंगे। उन्होंने महापौर की कार्यशैली और निगम प्रशासन पर नियंत्रण को लेकर भी सवाल उठाए। किरण गढ़वाल के आरोपों के बीच महापौर और भाजपा पार्षदों का पक्ष भी महत्वपूर्ण है। विवाद की पूरी तस्वीर सामने लाने के लिए समिति गठन के मानदंड, कांग्रेस पार्षदों की आपत्तियों और कथित अभद्र व्यवहार के मामले पर संबंधित पक्षों का जवाब सामने आना चाहिए।
क्या अब रावण भी अलग-अलग जलेगा?
दुर्गा पूजा महोत्सव के अलग-अलग आयोजन के बाद अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि विजयदशमी पर कांग्रेस और भाजपा के पार्षद अलग-अलग रावण दहन कार्यक्रम कर सकते हैं। फिलहाल इसे संभावित घटनाक्रम के रूप में ही देखा जा रहा है। लेकिन यदि ऐसा होता है तो अजमेर नगर निगम की साझा परंपरा पर एक और सवाल खड़ा होगा। जिस नगर निगम का काम शहर के विकास, नागरिक सुविधाओं और सार्वजनिक हितों के लिए मिलकर काम करना है, वहां धार्मिक-सांस्कृतिक आयोजनों को लेकर भी अलग-अलग खेमे बनना क्या जनता के हित में है?
भाजपा के वरिष्ठ नेता विवाद सुलझाने आगे क्यों नहीं आए?
इस पूरे घटनाक्रम में भाजपा के वरिष्ठ नेताओं की भूमिका भी चर्चा का विषय है। विवाद की शुरुआत समिति गठन और कथित दुर्व्यवहार को लेकर हुई। ऐसे मामले में वरिष्ठ नेता हस्तक्षेप कर दोनों पक्षों को बातचीत की मेज पर ला सकते थे। यदि कांग्रेस पार्षदों को प्रतिनिधित्व को लेकर शिकायत थी तो उसका समाधान निकाला जा सकता था। यदि किसी पार्षद के व्यवहार पर आपत्ति थी तो उस पर भी संगठनात्मक स्तर पर चर्चा संभव थी। लेकिन विवाद का अलग-अलग आयोजन तक पहुंचना यह सवाल जरूर खड़ा करता है कि क्या भाजपा के वरिष्ठ नेताओं ने समय रहते हस्तक्षेप किया? या फिर निगम के भीतर चल रहे मतभेदों को सुलझाने की कोशिश पर्याप्त नहीं रही? महापौर अनामिका शर्मा के लिए भी यह स्थिति राजनीतिक और प्रशासनिक समन्वय की चुनौती है। हालांकि विवाद के लिए किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराने से पहले सभी संबंधित पक्षों का पक्ष जानना जरूरी है।
समानांतर राजनीति का असर अब नगर निगम तक?
अजमेर कांग्रेस की गुटबाजी और नगर निगम में भाजपा-कांग्रेस के बीच टकराव—दोनों अलग-अलग राजनीतिक प्रक्रियाएं हैं, लेकिन दुर्गा पूजा विवाद ने इन्हें एक साथ चर्चा में ला दिया है।
कांग्रेस पार्षदों का अलग आयोजन करना उनके विरोध का तरीका हो सकता है, जबकि भाजपा इसे राजनीतिक असहमति के रूप में देख सकती है। लेकिन शहर के नागरिकों के लिए बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक मतभेद सार्वजनिक आयोजनों और निगम के कामकाज पर हावी होते रहेंगे?
अब निगाहें विजयदशमी पर हैं
क्या दोनों दलों के पार्षद रावण दहन के लिए एक मंच पर आएंगे, या दुर्गा पूजा की तरह यहां भी अलग-अलग आयोजन होंगे?
अजमेर में इस बार रावण के पुतले के साथ किसका अहंकार जलेगा, यह कहना जल्दबाजी होगी। फिलहाल इतना जरूर है कि दुर्गा पूजा महोत्सव ने नगर निगम के भीतर राजनीतिक समन्वय और आपसी संवाद की जरूरत को फिर उजागर कर दिया है।



