मुकेश मिश्रा की कलम से..
Questions : संविधान बचाओ… लोकतंत्र बचाओ… सत्ता से सवाल पूछो!…लेकिन सवाल ये है—दूसरों से हिसाब मांगने वाले खुद अपने सवालों का हिसाब देने को तैयार हैं?….राहुल गांधी के हलफनामे में 18 आपराधिक मामले… मोदी उपनाम केस में दो साल की सजा, जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई… सोनिया गांधी का नेशनल हेराल्ड मामला… रॉबर्ट वाड्रा से जुड़ी जमीन सौदे की जांच!…और बात सिर्फ गांधी परिवार की नहीं है!
राजस्थान का एंबुलेंस मामला… टेंडर पर उठे थे सवाल!
राजस्थान में एंबुलेंस टेंडर पर उठे सवाल… सरकारी विज्ञापन खर्च पर विवाद…इसी तरह, अशोक गहलोत सरकार के 2008 से 2013 के कार्यकाल में कथित ₹237 करोड़ के विज्ञापन घोटाले को लेकर चार FIR दर्ज होने का मामला भी चर्चा में आया। विज्ञापन बिलों और सरकारी धन के इस्तेमाल पर सवाल उठे। इस प्रकरण में राजस्थान सरकार की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने 2025 में नोटिस जारी किए थे।लेकिन इस मामले में भी हर आरोपी की भूमिका और वर्तमान न्यायिक स्थिति अलग-अलग देखना जरूरी है।सवाल यह है कि सरकारी धन के इस्तेमाल पर उठे सवालों का अंतिम हिसाब कब सामने आएगा? छत्तीसगढ़ में भर्ती अनियमितताओं की जांच!…हमारा सवाल बिलकुल सीधा है—जब दूसरों पर आरोप लगते हैं, तब संविधान खतरे में… और जब अपने नेताओं से सवाल होते हैं, तब जवाबदेही की बारी क्यों नहीं आती?….क्या भ्रष्टाचार के आरोपों पर जवाब देना सिर्फ विरोधियों की जिम्मेदारी है? क्या सत्ता पक्ष हो या विपक्ष—कानून का पैमाना सबके लिए एक नहीं होना चाहिए?…कानून के शब्दों में —FIR अपराध साबित नहीं करती… लेकिन सवालों से बचना भी तो इनका जवाब नहीं है!… देखिए, आरोपों और अदालती रिकॉर्ड के आधार पर हमारी यह पूरी पड़ताल। KBP TIMES की पड़ताल—में आप देखेंगे आरोप किस पर, जांच कहां तक?
संविधान की आड़… सत्ता की होड़?
संविधान बचाने का नारा…लोकतंत्र की रक्षा का दावा…और सरकार से जवाब मांगने की हुंकार!…लेकिन राजनीति में जवाबदेही का पैमाना एकतरफा नहीं हो सकता।राहुल गांधी के चुनावी हलफनामे में घोषित आपराधिक मामलों से लेकर नेशनल हेराल्ड प्रकरण तक… सोनिया गांधी और राहुल गांधी की कानूनी लड़ाई से लेकर रॉबर्ट वाड्रा के खिलाफ चल रही जांच तक… सवालों की फेहरिस्त लंबी है।और बात सिर्फ गांधी परिवार तक सीमित नहीं है।राजस्थान में एंबुलेंस सेवा के टेंडर पर कथित अनियमितताओं के आरोप लगे। अशोक गहलोत सरकार के कार्यकाल के दौरान विज्ञापन खर्च को लेकर कथित घोटाले का मामला उठा। छत्तीसगढ़ में कांग्रेस सरकार के समय हुई CGPSC भर्ती से जुड़ी अनियमितताओं की जांच में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यालय में तैनात रहे एक अधिकारी का नाम भी सामने आया।लेकिन इन सभी मामलों की कानूनी स्थिति एक जैसी नहीं है। कहीं FIR है, कहीं जांच, कहीं आरोपपत्र और कहीं अदालत में लंबित कार्यवाही। हमारा सवाल बिलकुल सीधा है—जो कांग्रेस सरकार से जवाबदेही मांगती है, क्या उसके नेताओं और पूर्व सरकारों के कार्यकाल से जुड़े मामलों की भी निष्पक्ष पड़ताल नहीं होनी चाहिए?.
गांधी परिवार पर सवाल… जवाबदेही का क्या हाल?
राहुल गांधी के 2024 के चुनावी हलफनामे में 18 आपराधिक मामले घोषित थे।मोदी उपनाम मानहानि मामले में निचली अदालत ने उन्हें दो साल की सजा सुनाई थी। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने दोषसिद्धि पर रोक लगा दी।नेशनल हेराल्ड प्रकरण में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर भी कानूनी लड़ाई जारी है। दिसंबर 2025 में निचली अदालत ने ED की अभियोजन शिकायत पर संज्ञान लेने से इनकार किया था। जुलाई 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट ने ED की चुनौती पर दोनों पक्षों से जवाब मांगा।दूसरी ओर, रॉबर्ट वाड्रा गुरुग्राम के शिकोहपुर भूमि सौदे से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग मामले में कानूनी कार्यवाही का सामना कर रहे हैं।यहां सवाल आरोपों को अपराध घोषित करने का नहीं, बल्कि हर मामले की स्थिति जनता के सामने रखने का है।
राजस्थान में कांग्रेस सरकार के कार्यकाल से जुड़े मामलों में एंबुलेंस सेवा का टेंडर विवाद भी शामिल रहा है।2014 में जयपुर में दर्ज मामले में एंबुलेंस सेवा के ठेके, कथित अनियमितताओं और बिलिंग को लेकर आरोप लगाए गए थे। बाद में मामला CBI को सौंपा गया। शुरुआती FIR में अशोक गहलोत और सचिन पायलट के नाम सामने आए थे
छत्तीसगढ़ में भर्ती घोटाले की जांच… पूर्व CM के दफ्तर तक पहुंची ED!
छत्तीसगढ़ में पूर्व कांग्रेस सरकार के दौरान CGPSC की 2020 और 2021 की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं की जांच हुई।इस मामले में 2024 में आर्थिक अपराध शाखा और भ्रष्टाचार निरोधक एजेंसी ने FIR दर्ज की। बाद में ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जांच शुरू की। सितंबर 2026 में ED ने पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के कार्यालय में OSD रहे चेतन बोरघरिया को गिरफ्तार किया। इसी महीने ED ने CGPSC मामले में सात लोगों के खिलाफ अभियोजन शिकायत भी दाखिल की।यह मामला भर्ती प्रक्रिया में कथित हेरफेर और अवैध लेनदेन के आरोपों से जुड़ा है। हालांकि, जांच एजेंसी के आरोप और अदालत में अपराध सिद्ध होना अलग-अलग बातें हैं।भर्ती में गड़बड़ी हुई या नहीं… किसकी भूमिका क्या थी… और जिम्मेदारी किसकी बनती है—इन सवालों का जवाब साक्ष्यों और न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा।
गांधी परिवार के कानूनी मामलों पर बड़े सवाल!
गांधी परिवार हो या कांग्रेस के दूसरे बड़े नेता… राजस्थान हो या छत्तीसगढ़—सवाल सबके लिए एक होना चाहिए।आरोपों की निष्पक्ष जांच हो।सरकारी धन का हिसाब सामने आए।भर्ती और टेंडर प्रक्रिया पारदर्शी हो।और दोष साबित होने पर कानून के मुताबिक कार्रवाई हो।संविधान बचाने की लड़ाई हो या सत्ता की राजनीति—जवाबदेही सबकी होनी चाहिए।
Anc…..संविधान बचाओ… लोकतंत्र बचाओ… लेकिन अपने नेताओं से सवाल पूछो तो जवाब कौन देगा?…….राहुल गांधी के घोषित आपराधिक मामले… सोनिया गांधी से जुड़ा नेशनल हेराल्ड विवाद… रॉबर्ट वाड्रा की जमीन सौदे से जुड़ी जांच… राजस्थान में टेंडर और विज्ञापन खर्च पर उठे सवाल… और छत्तीसगढ़ में भर्ती अनियमितताओं का मामला!…आखिर राजनीति में जवाबदेही का पैमाना अलग-अलग क्यों?….विरोधियों पर आरोप लगें तो प्रेस कॉन्फ्रेंस… सरकार पर सवाल उठें तो सड़क पर संघर्ष… लेकिन अपने नेताओं पर सवाल आएं तो चुप्पी क्यों?…क्या संविधान की रक्षा का मतलब सिर्फ सत्ता से सवाल पूछना है… या अपने खेमे से भी जवाब मांगना होगा?…याद रखिए—FIR अपराध साबित नहीं करती… लेकिन आरोपों का सच सामने आना भी जरूरी है!…जनता को न सियासी शोर चाहिए… न आरोपों की राजनीति… जनता को चाहिए जांच का हिसाब, अदालतों के फैसले और जवाबदेही!…. क्योंकि संविधान किसी परिवार की ढाल नहीं… और लोकतंत्र किसी पार्टी की जागीर नहीं!
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