CEC Gyanesh kumar : मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग पर जहां देश भर में पिछले तीन दिनों में तीन बडे प्रदर्शन हुए हैं वहीं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की एक टिप्पणी ने इस मुद्दे को और हवा दे दी है, जिससे विपक्ष के हमले और तेज हो गए हैं. कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने मुख्य चुनाव आयुक्त (ब्म्ब्) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की है।
कांग्रेस ने ज्ञानेश कुमार से मांगा इस्तीफा
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पोस्ट के जरिए ज्ञानेश कुमार पर तीखा हमला बोला है. उन्होंने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी के बाद ज्ञानेश कुमार को तुरंत पद से इस्तीफा दे देना चाहिए. रमेश ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग के प्रमुख के तौर पर ज्ञानेश कुमार का काम करना देश के लिए नुकसानदेह साबित हो रहा है. उन्होंने कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से यह साबित होता है कि ज्ञानेश कुमार ने संविधान का उल्लंघन किया है.
पोल-पट्टी खोलकर रख दी’
अपनी पोस्ट में जयराम रमेश ने कहा ‘हैदराबाद की नलसर यूनिवर्सिटी में कल जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने बेबाकी से अपनी बात रखी और सीईसी की पोल-पट्टी खोलकर रख दी. अगर ज्ञानेश कुमार में जरा भी शर्म-लिहाज है, तो उन्हें तुरंत इस्तीफा दे देना चाहिए. जी2 के गैर-कानूनी आदेशों को लागू करने की उनकी क्षमता ने उन्हें अब देश के लिए एक बोझ बना दिया है।
‘तो मैं जेल जाने को भी तैयार हूं’
इधर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने भी सोशल मीडिया पर एक पोस्ट किया है, जिसमें उन्होंने कहा ‘मैं भारत में लोकतंत्र को बचाने के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के नागरिकों के अधिकारों का मुद्दा उठाने पर सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा जज उज्ज्वल भुइयां को बधाई देता हूं. सीजेआई साहब, अब आपके करियर में खोने के लिए कुछ नहीं है, सिवाय शायद रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले फायदों के. अगर आपको बुरा लगे तो कृपया मुझे माफ़ करें, लेकिन अगर माननीय सुप्रीम कोर्ट को लगता है कि मैं अदालत की अवमानना कर रहा हूं, तो मैं जेल जाने को भी तैयार हूं’।
सागरिका घोष ने भी साधा निशाना
टीएमसी की राज्यसभा सांसद सागरिका घोष ने भी जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की टिप्पणी पर अपना रिएक्शन दिया है. उन्होंने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट शेयर करते हुए कहा ‘अगर किसी प्रक्रिया के कारण लाखों-करोड़ों भारतीय नागरिक अपने अधिकारों से वंचित हो जाते हैं और अपने ही देश में दूसरे दर्जे के नागरिक बन जाते हैं, तो ऐसी प्रक्रिया मूल रूप से मनमानी है. इसे किसी भी तरह के तर्क या लेकिन-मगर से सही नहीं ठहराया जा सकता.यह संविधान की मूल भावना पर प्रहार है’।
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