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राजस्थान कांग्रेस – कद, कुर्सी और गलत फैसले? गहलोत–पायलट टकराव… कितना नुकसान?

Rajasthan Congress Politics

– मुकेश मिश्रा की विशेष रिपोर्ट –

Rajasthan Congress Politics : राजस्थान की सियासत में कांग्रेस के कई चेहरे ऐसे हैं…जिनका कभी सिर्फ नाम ही काफी था। …सत्ता थी… संगठन था… जनाधार था… और दिल्ली तक सीधी पकड़ थी।लेकिन फिर आए कुछ ऐसे राजनीतिक मोड़…कुछ ऐसे फैसले…कुछ ऐसी सियासी लड़ाइयां…जिन्होंने इन बड़े चेहरों की राजनीति की दिशा ही बदल दी।…गहलोत–पायलट की जंग…2020 की बगावत…2022 का विधायक संकट…पेपर लीक का मुद्दा…और चुनावी मैदान में कांग्रेस का प्रदर्शन…सवाल ये नहीं कि कांग्रेस हारी या जीती…सवाल ये है कि कांग्रेस के इन बड़े चेहरों ने ऐसे कौन से राजनीतिक फैसले लिए… जिनका असर उनके अपने राजनीतिक कद पर पड़ा?…क्या सत्ता की लड़ाई संगठन पर भारी पड़ी?….क्या आपसी टकराव ने विरोधी को मौका दिया?….और क्या कुछ फैसले ऐसे थे…जिनकी राजनीतिक कीमत आज भी चुकानी पड़ रही है?

कांग्रेस के दिग्गज… अपने ही फैसलों से कमजोर?

राजस्थान की राजनीति में कांग्रेस के कई चेहरे ऐसे रहे हैं…जिनके पास कद था… संगठन था… जनाधार था… सत्ता थी…लेकिन सवाल ये है…क्या कुछ राजनीतिक फैसलों ने इन्हीं नेताओं की ताकत को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया?….किसी ने अपने ही सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी को खत्म करने की लड़ाई में संगठन को कमजोर किया…किसी ने बगावत का रास्ता चुना…किसी ने सही समय पर समझौता नहीं किया…और किसी के सामने संगठन और सरकार के बीच तालमेल का संकट खड़ा हुआ। अशोक गहलोत… सचिन पायलट… गोविंद सिंह डोटासरा… सीपी जोशी… और कांग्रेस के दूसरे बड़े चेहरे…इन नेताओं की राजनीति में ऐसे कौन से मोड़ आए, जहां फैसला कुछ और हो सकता था?

गहलोत–पायलट टकराव… कांग्रेस को कितना नुकसान?

वर्ष 2018…राजस्थान में कांग्रेस सत्ता में लौटी।एक तरफ थे अनुभवी अशोक गहलोत…दूसरी तरफ युवा चेहरे के तौर पर सचिन पायलट…एक मुख्यमंत्री बने…दूसरे उपमुख्यमंत्री और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष। लेकिन सत्ता की शुरुआत के साथ ही नेतृत्व की खींचतान भी शुरू हो गई।कांग्रेस की अंदरूनी लड़ाई धीरे-धीरे ऐसी कहानी बनी…जिसमें सरकार के भीतर सरकार और संगठन के भीतर संगठन की चर्चा होने लगी। अशोक गहलोत राजस्थान कांग्रेस के सबसे अनुभवी नेताओं में रहे हैं। सबसे बड़ा कद… सबसे बड़ी चुनौती…तीन बार मुख्यमंत्री…लेकिन तीसरे कार्यकाल में सबसे बड़ी चुनौती विपक्ष नहीं…अपनी ही पार्टी का अंदरूनी संघर्ष था। 2020 में सचिन पायलट और उनके समर्थक विधायकों के विद्रोह ने गहलोत सरकार को संकट में डाल दिया। पायलट को उपमुख्यमंत्री और PCC अध्यक्ष पद से हटा दिया गया। लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई।2022 में कांग्रेस अध्यक्ष पद के चुनाव की संभावनाओं के बीच राजस्थान में फिर बड़ा संकट खड़ा हुआ।करीब 90 गहलोत समर्थक विधायकों के इस्तीफे का घटनाक्रम सामने आया।यानी सवाल सिर्फ मुख्यमंत्री बदलने का नहीं था…सवाल था—राजस्थान कांग्रेस में अंतिम राजनीतिक नियंत्रण किसके पास रहेगा?…आलोचकों के मुताबिक सबसे बड़ा सवाल यही रहा—क्या गहलोत-पायलट संघर्ष को शुरुआती दौर में ही खत्म किया जा सकता था?…क्योंकि 2023 के चुनाव से ठीक पहले भी दोनों खेमों की तल्खी चर्चा में थी। यहां तक कि चुनावी मैदान में उतरने से पहले भी दोनों नेताओं के समर्थकों के बीच तनाव की खबरें आती रहीं। तो क्या गहलोत की सबसे बड़ी राजनीतिक चुनौती BJP नहीं… बल्कि कांग्रेस के भीतर नेतृत्व का सवाल था?

2020 की बगावत… पायलट की सबसे बड़ी राजनीतिक बाजी?

अब बात उस चेहरे की…जिसे 2018 में राजस्थान कांग्रेस की सत्ता वापसी का प्रमुख चेहरा माना गया। सचिन पायलट।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर संगठन को चुनाव तक ले जाने वाले पायलट मुख्यमंत्री पद की दौड़ में थे।लेकिन मुख्यमंत्री बने अशोक गहलोत।और इसके बाद शुरू हुआ लंबा राजनीतिक संघर्ष।2020 में पायलट ने अपने समर्थक विधायकों के साथ सरकार के खिलाफ बगावत की।नतीजा—डिप्टी CM का पद गया…PCC अध्यक्ष का पद गया…और कांग्रेस सरकार बच गई।

आलाकमान के निर्देश पर सचिन पायलेट की कांग्रेस में वापस घर वापसी हुई …लेकिन वापसी के बाद भी संघर्ष पूरी तरह खत्म नहीं हुआ। 2023 में पायलट ने पिछली BJP सरकार के कथित भ्रष्टाचार के मामलों में कार्रवाई की मांग को लेकर अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना दिया। यानी चुनावी साल में कांग्रेस के भीतर एक बार फिर सरकार बनाम सरकार के सवाल खड़े हुए। सवाल ये नहीं कि पायलट की शिकायतें सही थीं या गलत…सवाल ये है—क्या उन शिकायतों को उठाने का राजनीतिक समय और तरीका कांग्रेस के लिए चुनावी नुकसान का कारण बना?…यह एक राजनीतिक विश्लेषण का विषय रहा। 2018 में दोनों नेता एक साथ नजर आए थे।2023 तक दोनों के बीच राजनीतिक दूरी राजस्थान कांग्रेस की सबसे बड़ी खबरों में शामिल रही।एक तरफ गहलोत का संगठन और विधायकों पर मजबूत प्रभाव…दूसरी तरफ पायलट का युवा चेहरा और अपना राजनीतिक आधार।लेकिन इस संघर्ष का असर सिर्फ जयपुर तक सीमित नहीं रहा।जमीनी स्तर पर भी दोनों खेमों की खींचतान दिखाई देती रही। 2023 में हाईकमान ने दोनों नेताओं को साथ लाने की कोशिश की।लेकिन तब तक सवाल बड़ा हो चुका था—क्या पार्टी का संगठन एक था… या सिर्फ मंच एक था?

कुर्सी की लड़ाई में संगठन कितना कमजोर हुआ?

अब बात गोविंद सिंह डोटासरा की।प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के तौर पर उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी—गुटों में बंटी पार्टी को चुनाव तक एकजुट रखना।लेकिन कांग्रेस सरकार के दौरान REET और दूसरी भर्ती परीक्षाओं के पेपर लीक के मुद्दे विपक्ष के बड़े राजनीतिक हथियार बने। REET मामले में पुलिस जांच में पेपर लीक की पुष्टि की बात सामने आई और सरकार ने बोर्ड के अधिकारियों पर कार्रवाई की।2023 चुनाव से पहले यही मुद्दा कांग्रेस सरकार के खिलाफ BJP के प्रमुख अभियान मुद्दों में शामिल रहा।डोटासरा के परिवार से जुड़े लोगों को REET मामले में ED के समन और छापों ने भी चुनावी माहौल में राजनीतिक विवाद को बढ़ाया; कांग्रेस ने इन कार्रवाइयों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया दी। यहां सवाल डोटासरा की व्यक्तिगत भूमिका तय करने का नहीं…सवाल ये है—क्या प्रदेश संगठन इन मुद्दों का राजनीतिक जवाब समय रहते प्रभावी तरीके से दे पाया?

कांग्रेस के बड़े चेहरे… सियासी कद क्यों घटा?

कांग्रेस के एक और बड़े चेहरे…सीपी जोशी।2008 में वे राजस्थान कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष थे।कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी बनी…और जोशी मुख्यमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में माने जा रहे थे।लेकिन नाथद्वारा विधानसभा सीट पर…सिर्फ एक वोट से हार।जोशी को 62,215 वोट मिले…जबकि उनके प्रतिद्वंद्वी कल्याण सिंह चौहान को 62,216 वोट। ये हार किसी राजनीतिक गलती का सीधा प्रमाण नहीं थी…लेकिन इस एक नतीजे ने मुख्यमंत्री पद की उनकी तत्काल दावेदारी का पूरा समीकरण बदल दिया। यानी राजनीति में कभी-कभी…एक वोट भी राजनीतिक कद की दिशा बदल सकता है।

कांग्रेस के कई दूसरे नेताओं की कहानी भी यही बताती है—सिर्फ पद हासिल करना काफी नहीं…राजनीतिक परिणाम भी साथ होना चाहिए। राजस्थान के वरिष्ठ नेता रघु शर्मा को 2022 गुजरात विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का प्रभारी बनाया गया।कांग्रेस के बेहद खराब प्रदर्शन के बाद उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद से इस्तीफा दिया।ये उदाहरण बताता है कि पार्टी की राष्ट्रीय जिम्मेदारी भी नेता के राजनीतिक कद को बढ़ा सकती है…और खराब परिणाम के बाद वही जिम्मेदारी राजनीतिक दबाव भी बन सकती है। राजस्थान कांग्रेस की कहानी में सवाल सिर्फ ये नहीं—कौन हारा?…सवाल ये है—किस फैसले ने संगठन को कमजोर किया?…क्या 2020 की बगावत ने कांग्रेस को भीतर से कमजोर किया?…क्या 2022 का विधायक संकट टाला जा सकता था?…क्या गहलोत-पायलट विवाद को चुनाव से पहले स्थायी रूप से सुलझाया जा सकता था?…क्या पेपर लीक जैसे मुद्दों पर सरकार और संगठन का राजनीतिक बचाव ज्यादा प्रभावी हो सकता था?…और सबसे बड़ा सवाल—क्या कांग्रेस ने अपने बड़े चेहरों की व्यक्तिगत राजनीतिक ताकत को सामूहिक संगठन की ताकत में बदलने में चूक की?

कांग्रेस के बड़े चेहरे बीच पिसता रहा—कांग्रेस का संगठन

राजस्थान कांग्रेस की कहानी में चेहरे बड़े रहे…लेकिन सवाल ये है कि क्या फैसले उतने ही बड़े थे?..एक तरफ अनुभव…दूसरी तरफ युवा नेतृत्व…एक तरफ सत्ता…दूसरी तरफ भविष्य की दावेदारी…और इनके बीच पिसता रहा—कांग्रेस का संगठन। 2020 की बगावत से लेकर 2022 के विधायक संकट तक…और 2023 के चुनावी मैदान तक…कई मौके आए…कई समझौते हुए…लेकिन सवाल आज भी वही है—अगर कांग्रेस के बड़े नेता एक-दूसरे को कमजोर करने के बजाय संगठन को मजबूत करते… तो क्या राजस्थान की राजनीतिक कहानी कुछ और होती?…फैसला किसी एक नेता के पक्ष या खिलाफ नहीं…फैसला उन राजनीतिक घटनाओं का है, जिन्हें राजस्थान की जनता ने देखा है। हमारा तो यही कहना है की “कद बड़ा हो तो राजनीतिक फैसले भी बड़े होने चाहिए…”

यह भी पढ़ें –मरुधरा की महापंचायत… गांवों की चौपाल से सत्ता के सिंहासन तक उठते सवाल!

यह भी देखें – निकाय जीत के बाद BJP का पंचायत चुनाव मिशन शुरू | नितिन नवीन ने भरा कार्यकर्ताओं में जोश | KBP Times

 

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