– मुकुल मिश्रा की विशेष रिपोर्ट –
Panchayat Raj Management : जयपुर की सत्ता के गलियारों में बैठकर जो हुक्मरान आज अपनी पीठ थपथपा रहे हैं, उन्हें ग्रामीण राजस्थान की इस कड़वी हकीकत को ज़रूर देखना चाहिए। सूबे में पंचायत चुनावों की आहट है, लेकिन ग्रामीण अंचल का गुस्सा इस बार सरकार की नींद उड़ाने के लिए आमादा है। जयपुर के एयर-कंडीशनर कमरों में बैठकर ‘विकास’ के खोखले दावे करने वाले मंत्रियों को जमीनी हकीकत का कतई अंदाजा नहीं है। सच तो यह है कि गाँवों में लोकतंत्र की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। घूंघट की आड़ में महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का मर्डर हो रहा है, पेपर लीक के दंश से तड़पते युवा सरकार को कोस रहे हैं, और बूंद-बूंद पानी को तरसता किसान इस बार सर्कार और सरकारी कारिंदों को सबक सिखाने की कसम खा चुका है। यह चुनाव बीजेपी के लिए परीक्षा नहीं, बल्कि उसके ग्रामीण वजूद के खत्म होने की शुरुआत भी साबित हो सकता है।
कलेक्टर और एसडीएम के भरोसे चल रहा है सूबा!
पूरे ग्रामीण तंत्र पर निरंकुश नौकरशाही और अफसरशाही का नंगा नाच चल रहा है। मंत्रियों और विधायकों की औकात अब कलेक्ट्रेट के बाबुओं के सामने शून्य हो चुकी है, जिसके कारण आम जनता के काम दफ्तरों की फाइलों में सड़ रहे हैं। खेती के वक्त बिजली की अघोषित कटौती ने किसानों की फसलें सुखा दी हैं, और जल जीवन मिशन के नाम पर केवल भ्रष्टाचार के खोखले पाइप गाड़े गए हैं, जिनमें पानी की एक बूंद तक नसीब नहीं है। ऊपर से, हनुमान बेनीवाल की आरएलपी (RLP) और आदिवासियों की ‘बाप’ (BAP) जैसी क्षेत्रीय ताकतें बीजेपी के पारंपरिक वोट बैंक पर घात लगाए बैठी हैं। टिकट वितरण को लेकर पार्टी के भीतर सुलग रही अंदरूनी बगावत और ‘भीतरघात’ का कैंसर इस बार सरकार को चारों खाने चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है।” ग्रामीण मतदाता इस बार ईवीएम का बटन दबाकर अपनी बर्बादी का हिसाब चुकता करने के मूड में है। देखना होगा कि क्या सरकार इस जमीनी हकीकत को स्वीकार करती है या फिर अहंकार के मद में चूर होकर अपनी राजनीतिक कब्र खुद खोदती है।
चौपाल से उठ रही आवाज… क्या सुन पाएगी सत्ता?
राजस्थान…वो धरती जहां से देश को पंचायती राज व्यवस्था की नई राह मिली थी…लेकिन आज उसी मरुधरा के गांवों में एक बड़ा सवाल खड़ा है…क्या गांव की सरकार सच में गांव वालों के हाथ में है?….क्या पंचायत भवनों में जनता की आवाज गूंज रही है…या फिर कुर्सी किसी और की है और सत्ता का संचालन किसी और के हाथों में?….पंचायत चुनावों की आहट के बीच राजस्थान के गांवों में कई मुद्दे उभरकर सामने आ रहे हैं…महिला आरक्षण और महिला प्रतिनिधियों की भूमिका पर सवाल…भर्ती परीक्षाओं और रोजगार को लेकर युवाओं की चिंता…बिजली-पानी और खेती की परेशानियों से जूझते किसान…और सरकारी सिस्टम में आम आदमी की सुनवाई को लेकर नाराजगी…विपक्ष इन मुद्दों को सरकार के खिलाफ बड़ा हथियार बता रहा है…तो सरकार अपनी योजनाओं और विकास कार्यों को अपनी उपलब्धि बता रही है।……लेकिन इन दावों और आरोपों के बीच…गांव की चौपाल पर आखिर क्या सोच रहा है आम मतदाता?….क्या पंचायत चुनाव सिर्फ गांव की सरकार चुनने का चुनाव होगा?….या फिर यह ग्रामीण राजस्थान के सियासी मूड का बड़ा संकेत बनेगा?….
विकास के दावों और जमीनी हकीकत के बीच फासला!
राजस्थान का युवा…जिसके हाथ में डिग्री है…लेकिन आंखों में रोजगार का इंतजार। भर्ती परीक्षाओं से जुड़े विवादों और पेपर लीक के मामलों ने युवाओं के भरोसे को चुनौती दी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी लंबे समय से पारदर्शी भर्ती प्रक्रिया और समय पर नियुक्ति की मांग करते रहे हैं। सरकार की ओर से ऐसे मामलों में कार्रवाई और सुधार के दावे किए जाते रहे हैं…लेकिन जमीन पर युवाओं की अपनी परेशानियां हैं। कई परिवारों के लिए एक सरकारी नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं…बल्कि पूरे परिवार की उम्मीद होती है। दूसरी तरफ किसान…जो राजस्थान की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। खेती के लिए समय पर बिजली…सिंचाई के लिए पानी…फसल का उचित मूल्य…ये मुद्दे हर चुनाव में सामने आते हैं। कई इलाकों में किसान स्थानीय समस्याओं को लेकर आवाज उठाते नजर आते हैं। कहीं नहर और पानी की मांग…कहीं बिजली कटौती की शिकायत…तो कहीं सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी।ग्रामीण जनता की सबसे बड़ी मांग यही है कि योजनाएं सिर्फ कागजों तक सीमित न रहें…बल्कि उनका लाभ गांव के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचे।
महिला आरक्षण या ‘सरपंच पति’ का समानांतर राज?
राजस्थान…वो प्रदेश जिसने 1959 में नागौर की धरती से पंचायती राज का इतिहास लिखा।आज पंचायतों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आरक्षण व्यवस्था लागू है।हजारों महिलाएं चुनाव जीतकर गांव की सरकार का हिस्सा बनीं…लेकिन सवाल यह है कि क्या उन्हें फैसले लेने की पूरी आजादी मिल पाई?…..कई ग्रामीण इलाकों में लंबे समय से यह आरोप सामने आते रहे हैं कि महिला सरपंच चुने जाने के बाद भी उनके पति या परिवार के पुरुष सदस्य पंचायत के कामकाज में ज्यादा सक्रिय रहते हैं।….यही वजह है कि “सरपंच पति” शब्द राजस्थान की पंचायत राजनीति में एक बहस का विषय बन चुका है।
“महिला आरक्षण… अधिकार या अधूरी तस्वीर?”
कई जगहों पर सवाल उठते हैं कि…अगर जनता ने महिला प्रतिनिधि को चुना है…तो फैसले लेने की शक्ति भी उन्हीं के पास होनी चाहिए।महिला सशक्तिकरण सिर्फ चुनाव जीतने तक सीमित नहीं होना चाहिए…बल्कि पंचायत की बैठक से लेकर विकास योजनाओं के फैसलों तक महिलाओं की वास्तविक भागीदारी दिखनी चाहिए।वहीं प्रशासनिक व्यवस्था की भूमिका भी सवालों के घेरे में आती है। पंचायत सचिव, विकास अधिकारी और स्थानीय प्रशासन पर जिम्मेदारी होती है कि निर्वाचित प्रतिनिधि अपनी भूमिका स्वतंत्र रूप से निभाएं।क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत तभी मजबूत होगी…जब कुर्सी पर बैठा प्रतिनिधि ही जनता के फैसले लेगा। पंचायतों की कहानी सिर्फ महिला नेतृत्व तक सीमित नहीं है…ग्रामीण राजस्थान में एक और बड़ा मुद्दा है…युवा भविष्य को लेकर चिंतित हैं…किसान अपनी समस्याओं को लेकर परेशान हैं…और आम आदमी सरकारी दफ्तरों में अपनी सुनवाई चाहता है। सवाल यही है…क्या ये मुद्दे आने वाले पंचायत चुनावों में बड़ा असर डालेंगे?…
गांव की सरकार… लेकिन फैसलों पर किसका अधिकार?
गांव की राजनीति में एक और मुद्दा लगातार चर्चा में रहता है…वो है…जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच तालमेल का।कई बार स्थानीय नेता आरोप लगाते हैं कि अधिकारियों की वजह से जनता के कामों में देरी होती है…वहीं प्रशासन अपनी प्रक्रिया और नियमों का हवाला देता है।लेकिन इन सबके बीच सवाल आम आदमी का है…क्या उसकी समस्या समय पर सुनी जा रही है?…क्या पंचायत स्तर पर फैसले तेजी से हो रहे हैं?…और क्या सरकारी योजनाओं का फायदा वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंच रहा है?
ग्रामीण राजस्थान के मुद्दे सत्ता के लिए सबसे बड़ी चुनौती?
राजस्थान की ग्रामीण राजनीति हमेशा से स्थानीय समीकरणों पर टिकी रही है। जातीय समीकरण…स्थानीय नेतृत्व…उम्मीदवार की छवि…और क्षेत्रीय मुद्दे…ये सभी चुनावी गणित को प्रभावित करते हैं। कुछ इलाकों में क्षेत्रीय दलों और स्थानीय नेताओं की मौजूदगी भी चुनावी मुकाबले को बहुकोणीय बनाती है। मारवाड़ में आरएलपी जैसे दलों की भूमिका…आदिवासी क्षेत्रों में भारत आदिवासी पार्टी जैसे संगठनों का प्रभाव…और स्थानीय स्तर पर निर्दलीय उम्मीदवारों की ताकत…पंचायत चुनावों में समीकरण बदल सकती है। वहीं बड़े राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती होती है…संगठन को एकजुट रखना…स्थानीय नाराजगी को दूर करना…और सही उम्मीदवार का चयन करना। क्योंकि पंचायत चुनाव में अक्सर पार्टी से ज्यादा उम्मीदवार की व्यक्तिगत पकड़ मायने रखती है।
मरुधरा की महापंचायत में जनता लिखेगी नया अध्याय!
मरुधरा की महापंचायत में मुद्दे कई हैं…महिला अधिकारों से लेकर युवाओं के रोजगार तक…किसानों की परेशानियों से लेकर प्रशासनिक व्यवस्था तक…हर मुद्दा गांव की चौपाल पर चर्चा में है। आने वाले पंचायत चुनावों में जनता किन मुद्दों को सबसे ज्यादा महत्व देती है…ये आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन इतना तय है…कि लोकतंत्र की असली परीक्षा सिर्फ चुनाव के दिन नहीं होती…बल्कि तब होती है जब चुने हुए प्रतिनिधि जनता की उम्मीदों पर कितना खरा उतरते हैं। गांव की सरकार…गांव के लोगों की आवाज बने…यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है।
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