KBP Times

राजस्थान पंचायत में महिलाएं कागज पर सरपंच… जमीन पर पतिदेव का राज!

Mahila Sarpanch in Rajasthan

–  मुकुल मिश्रा की विशेष रिपोर्ट – 

Mahila Sarpanch : राजस्थान… वीरों और वीरांगनाओं की भूमि। वो प्रदेश जिसने देश को पंचायती राज की सौगात दी। साल 1959 में नागौर से ही देश में पंचायती राज की शुरुआत हुई थी। आज उसी राजस्थान में पंचायती राज संस्थाओं में महिलाओं को पूरे 50 फीसदी का आरक्षण हासिल है। कागजों पर दावा है कि मरुधरा की ग्रामीण सरकार को महिलाएं चला रही हैं। लेकिन आज ख्चौनल का नाम, आपको जयपुर के वातानुकूलित सचिवालय से दूर, थार के रेगिस्तान और अरावली की घाटियों में बसे गाँवों की वो हकीकत दिखाएगा जो शर्मनाक है। यहाँ चुनाव महिला जीतती है, लेकिन शपथ से लेकर सरपंच की कुर्सी तक पर उसका श्पतिदेवश् विराजमान होता है। घूंघट की ओट में महिलाओं के अधिकार कैसे बंधक बने हुए हैं, देखिए हमारी इस इस विशेष रिपोर्ट में कृश्थार का छलावारू सरपंच पतिराज!

महिला को बोलने तक की इजाजत ही नहीं

राजस्थान के कई गाँवों में ग्रामीणों द्वारा चुनी हुई सरपंच साहिबा हैं। लोकतंत्र की किताब के अनुसार गाँव के विकास की चाबी इनके पास है। करोड़ों रुपये का बजट इन्हीं के हस्ताक्षर से पास होना है। लेकिन राजस्थानी परंपरा और घूंघट की ऐसी ओट है कि मैडम सरपंच कैमरे के सामने नहीं आती हैं। असल में इन्हें बोलने की इजाजत ही नहीं है। क्योंकि गाँव के पोस्टर पर इनका चेहरा सिर्फ इसलिए छपा था ताकि इनके पतिदेव का राजनीतिक रसूख कम न हो। सीट महिला के लिए आरक्षित हुई, तो पति ने पत्नी को ही राजनीति का मोहरा बना दिया। सरपंच पति के अनुसार वो तो घर-गृहस्थी और बच्चे संभालती हैं। गाँव के मामलों के कलेक्ट्रेट भागना पड़ता है, पुलिस-थाना देखना पड़ता है। वो सब जव सरपंच पति ही संभालता है । दस्तखत की जरूरत होती है तो घर पर आकर करवा लेते हैं। सरकारी मीटिंग या पंचायत की बैठक में में ये द्रश्य आम है की वहां महिला सरपंचों के पति या देवर बैठे रहते हैं। बीडीओ साहब उन्हीं पतियों के हाथ में सरकारी फाइलें थमा रहे हैं और चाय की चुस्कियों के साथ श्लेन-देनश् की बातें हो रही हैं।

प्रशासनिक अमला खामोश क्योंकि …..

.इस खेल का सबसे स्याह पहलू यह है कि राजस्थान का प्रशासनिक अमला इस असंवैधानिक कृत्य का सबसे बड़ा साझीदार है। राजस्थान पंचायती राज अधिनियम के तहत किसी भी सरकारी बैठक में सरपंच के अलावा कोई प्रॉक्सी या प्रतिनिधि भाग नहीं ले सकता। लेकिन उपखंड कार्यालयों से लेकर ग्राम पंचायतों तक, सरेआम कानून का तमाशा बनाया जाता है। सरकारी ग्राम विकास अधिकारी और विकास अधिकारी अच्छी तरह जानते हैं कि जो व्यक्ति कुर्सी पर बैठा है, वह कानूनन कोई नहीं है। लेकिन वे चुप रहते हैं, क्योंकि सरपंच पतियों के साथ मिलकर भ्रष्टाचार की स्क्रिप्ट लिखना आसान होता है, और घूंघट में बैठी महिला से सरकारी कमीशन की सेटिंग नहीं की जा सकती।

सामाजिक रूढ़िवादिता महिला जनप्रतिनिधियों के लिए बेड़िया

राजस्थान की घूंघट प्रथा और राजनीतिक शोषण का गठजोड़ ,राजस्थान में घूंघट प्रथा और सामाजिक रूढ़िवादिता महिला जनप्रतिनिधियों के लिए बेड़ियां बनी हुई हैं।मीडिया और सामाजिक संस्थाओं के सर्वे के अनुसार, राजस्थान के ग्रामीण अंचलों में 80ः से अधिक महिला सरपंचों के कामकाज का संचालन उनके पति, ससुर या जेठ करते हैं। राजस्थान में सदियों पुरानी घूंघट प्रथा और पितृसत्तात्मक सोच ने इस 50 फीसदी आरक्षण को सिर्फ एक मजाक बनाकर रख दिया है। पुरुष प्रधान समाज ने इस कानून की काट ढूंढ ली है। जब तक सीट सामान्य रहती है, पुरुष खुद मूंछों पर ताव देकर राज करता है। जैसे ही सीट महिला, अनुसूचित जाति या जनजाति की महिला के लिए आरक्षित होती है, पुरुष रातों-रात अपने घर की उस महिला को उम्मीदवार बना देता है जिसने कभी गाँव की चौपाल की सीढ़ियां तक नहीं चढ़ीं। यह सशक्तिकरण नहीं, बल्कि महिलाओं की लाचारी का राजनीतिक इस्तेमाल है। सरकारी योजनाओं का पैसा, पट्टों का आवंटन और गाँव के ठेके दृ सब कुछ इन श्सरपंच पतियोंश् की मर्जी से तय होता है।ष्…..मुख्यमंत्री से लेकर पंचायती राज मंत्री तक जयपुर में बड़े-बड़े मंचों से दावा करते हैं कि राजस्थान की महिलाएं डिजिटल हो रही हैं, वे सरकार चला रही हैं। लेकिन जमीनी हकीकत इस मरुस्थल की तपती रेत जैसी है, जो पैर जला देती है। सच यह है कि आज भी राजस्थान के गाँवों में महिलाओं का राजनीतिक सशक्तिकरण सिर्फ सरकारी विज्ञापनों और फाइलों तक सीमित है। असली सत्ता आज भी पुरुषों के हुक्के की गुड़गुड़ाहट और सफारी गाड़ियों के हॉर्न के बीच सिमटी हुई है।

गंभीर कानूनी अपराध घोषित करने की जरुरत

.जब तक राजस्थान सरकार सरपंच पति प्रथा को एक गंभीर कानूनी अपराध घोषित नहीं करती, जब तक नकली सरपंचों के दस्तखत वाली फाइलों को निरस्त करके उन पर केस दर्ज नहीं किया जाता, तब तक मरुधरा में आधी आबादी को उनका हक मिलना सिर्फ एक मृगमरीचिका (छलावा) ही रहेगा। तो यह है राजस्थान के पंचायती राज का असली चेहरा। कागज़ की रानी और जमीन का राजा। बदलाव केवल कानून बना देने से या वोटिंग मशीन का बटन दबा देने से नहीं आता। बदलाव तब आएगा जब ग्रामीण समाज की सोच से यह घूंघट हटेगा और प्रशासनिक अधिकारी श्सरपंच पतियोंश् को दुत्कार कर बाहर निकालेंगे। जब तक ऐसा नहीं होता, राजस्थान में महिला आरक्षण सिर्फ पुरुषों की सत्ता को री-पैकेज करके परोसने का जरिया मात्र बना रहेगा। हमारी इस विशेष रिपोर्ट पर आपकी क्या राय है, हमें हमारे लिखकर ज़रूर बताएं

यह भी पढ़ें –राजस्थान पंचायती राज चुनाव; प्रदेश में 7200 महिला सरपंच और 65 हजार महिला वार्ड पंच बनेंगी

यह भी देखें – #Jaipur: वनभूमि पर RIICO का कब्जा? खसरा 7/2 पर NGT के आदेश के बाद उठे बड़े सवाल | KBP Times

 

ताजा खबरें

ताजा खबरें

Meta

केन्द्र सरकार ने मेटा से कहा-एक तरफा नैरेटिव वाला कंटेंट नहीं हो, एल्गोरिदम की करें समीक्षा

Blast in pickup

भीलवाड़ा में विस्फोटक से भरी पिकअप में ब्लास्ट; ड्राइवर की मौत, धमाके से गाड़ी के परखच्चे उड़े

Navratri in Udaipur

उदयपुर में नवरात्र विशेष कार्यक्रम की धूम, नवदुर्गा के नौ स्वरूपों की प्रस्तुति ने मोहा मन

Share Market down today

शेयर मार्किट में आज सेंसेक्स 1000 अंक गिरा, निफ्टी में भी 300 अंक की गिरावट

attackers identified

टाइगर श्राफ के हमलावरों की हुई पहचान, अनिल पंडित ने ऑडियो मैसेज में फिर दी धमकी

Para Asian Games

Para Asian Games- भारत की मोना ने गोल्ड और अवनी ने सिल्वर जीता

threat to majistrate

दिल्ली में मजिस्ट्रेट को धमकी; CJP ने कहा “इससे आशुतोष और सौरव की जमानत से क्या संबंध?”

Bomb Information in flight

इजराइल से ऑस्ट्रिया जा रही फ्लाइट में बम होने की सूचना; फाइटर जेट की निगरानी में कराई इमरजेंसी लैंडिंग

Tiger Shroff attack

अभिनेता टाइगर श्रॉफ पर फायरिंग; लॉरेंस गैंग ने ली जिम्मेदारी, कोटा पुलिस ने तीन संदिग्ध पकड़े

2

2