–Ground Report- मुकेश मिश्रा –
Rajasthan Panchayat Election : राजस्थान की सियासत में निकाय चुनाव का नतीजा सिर्फ एक चुनावी नतीजा नहीं…BJP और कांग्रेस दोनों के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकेत है।10 हजार से ज्यादा शहरी वार्डों के चुनाव में BJP सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी…कांग्रेस दूसरे नंबर पर रही…लेकिन इनके बीच 2 हजार 273 निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने पूरा चुनावी गणित हिला दिया।और अब सामने है…गांव की सरकार का चुनाव।…जहां मुकाबला सिर्फ BJP बनाम कांग्रेस नहीं होगा…क्योंकि मैदान में होंगे—पार्टी के टिकट से नाराज बागी…गांव के मजबूत स्थानीय चेहरे…और RLP जैसी क्षेत्रीय ताकतें। तो सवाल सीधा है—क्या निकाय चुनाव का निर्दलीय फैक्टर पंचायत चुनाव में भी और बड़ा खेल कर सकता है?
दोनों बड़ी पार्टियों के बाद तीसरी बड़ी ताकत के रूप में निर्दलीय
राजस्थान के निकाय चुनाव ने एक दिलचस्प तस्वीर दिखाई। BJP — 4,179 वार्ड….कांग्रेस — 3,613 वार्ड..और…निर्दलीय — 2,273 वार्ड। यानी दोनों बड़ी पार्टियों के बाद तीसरी बड़ी ताकत के रूप में निर्दलीय सामने आए।कई जगह किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला…और वहां निर्दलीय पार्षद सत्ता के समीकरण में महत्वपूर्ण हो गए।पंचायत चुनाव को लेकर भी अब यही सवाल उठ रहा है……..क्या गांव में भी निर्दलीय BJP-कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगा सकते हैं?…और यहीं से BJP और कांग्रेस के लिए असली चुनौती शुरू होती है।…पार्टी का टिकट एक होगा…लेकिन टिकट मांगने वाले चेहरे कई।जिसका टिकट कटेगा…वह क्या करेगा?….घर बैठेगा?…या…पार्टी के खिलाफ अपना झंडा उठाकर गांव की चौपाल में उतर जाएगा?….यही बगावत अगर बड़ी संख्या में हुई…तो मुकाबला BJP बनाम कांग्रेस से निकलकर…BJP बनाम कांग्रेस बनाम निर्दलीय बनाम RLP भी हो सकता है।
पंचायत चुनाव में सबसे बड़ा खेल हो सकता है…टिकट वितरण का।…एक गांव…कई दावेदार…एक टिकट।…टिकट मिला तो पार्टी का झंडा…टिकट नहीं मिला तो?….यहीं से निकल सकता है…बागी उम्मीदवार।…और पंचायत चुनाव में बागी उम्मीदवार के पास एक बड़ा हथियार होता है—उसकी अपनी स्थानीय पहचान।…गांव में रिश्ते…पुराना सामाजिक नेटवर्क…स्थानीय पकड़…और सबसे बड़ी बात—मतदाता से सीधा संपर्क।
छोटे दल सिर्फ वोट काटने तक सीमित नहीं रहे
निकाय चुनाव ने यह भी दिखाया कि छोटे दल सिर्फ वोट काटने तक सीमित नहीं रहे।RLP ने 63 वार्ड जीते।और बाद के अध्यक्ष चुनावों में भी RLP ने एक निकाय में बोर्ड बनाने में सफलता हासिल की।अब सवाल है—क्या RLP पंचायत में अपना आधार और फैलाने की कोशिश करेगी?….अगर RLP मजबूत स्थानीय उम्मीदवार उतारती है…तो कुछ क्षेत्रों में मुकाबला सीधे दो पार्टियों से निकलकर त्रिकोणीय या बहुकोणीय हो सकता है।….RLP पहले ही पंचायत चुनाव के मैदान में उतरने की तैयारी का ऐलान कर चुकी है।…अब RLP के सामने भी बड़ी चुनौती सामने कड़ी होगी—कितनी सीटों पर संगठन खड़ा कर पाती है?….कितने मजबूत स्थानीय चेहरे मैदान में उतारती है?….और क्या निकाय चुनाव में मिले समर्थन को गांव तक ले जा पाती है?…क्योंकि पंचायत चुनाव में सिर्फ पार्टी का नाम काफी नहीं…उम्मीदवार का अपना वोट बैंक भी मायने रखता है। लेकिन BJP और कांग्रेस के लिए असली सवाल RLP से भी बड़ा है।अपने ही घर के नाराज दावेदारों का क्या करेंगे?….किसे टिकट देंगे?…किसे मनाएंगे?…किसे संगठन में जगह देंगे?…और सबसे बड़ी बात to यह है की किस किस बागी को चुनाव से पहले रोक पाएंगे?….क्योंकि…एक बागी उम्मीदवार सिर्फ खुद नहीं लड़ता…वह पार्टी के वोटों में सेंध भी लगा सकता है।और अगर मुकाबला करीबी हुआ…तो कुछ वोटों का बंटवारा भी पूरा समीकरण बदल सकता है।
मतदाता के सामने सवाल होगा—की आखिर किसे चुनना है?
पंचायत चुनाव के सबसे दिलचस्प मुकाबले की बात करें तो शायद यही होगा—पार्टी का अधिकृत उम्मीदवार… गांव का अपना उम्मीदवार।…एक के पास होगा…पार्टी का चुनाव चिन्ह।दूसरे के पास होगा…अपना व्यक्तिगत नेटवर्क।और मतदाता के सामने सवाल होगा—की आखिर किसे चुनना है?…यहीं से निकाय चुनाव का सबसे बड़ा सबक सामने आता है—स्थानीय चुनाव में निर्दलीय को सिर्फ “वोट काटने वाला” समझना पर्याप्त नहीं।निकाय चुनाव में 2,273 निर्दलीय जीत चुके हैं।अब पंचायत में उनकी वास्तविक ताकत कितनी होगी…यह उम्मीदवारों, क्षेत्र और स्थानीय समीकरण पर निर्भर करेगा। BJP के सामने भी बड़े सवाल सामने खड़े हैं……क्या मजबूत स्थानीय दावेदारों को पहले से चिन्हित किया जाएगा?…..क्या टिकट कटने वाले संभावित बागियों को संभाला जाएगा?….क्या संगठन गांव-गांव जाकर नाराजगी को समझेगा?..क्योंकि…पार्टी के भीतर की नाराजगी अगर बैलेट पर उतर गई तो उसका असर सीट के गणित पर भी पड़ सकता है। और कांग्रेस के सामने भी सवाल कम नहीं।…किसे टिकट?…किसे संगठन की जिम्मेदारी?…किसे मनाना?…और…कितने टिकट ऐसे होंगे जहां पार्टी का आधिकारिक उम्मीदवार और बागी आमने-सामने होंगे?…क्योंकि पंचायत की लड़ाई सिर्फ जयपुर या प्रदेश मुख्यालय से नहीं…गांव की चौपाल से लड़ी जाएगी।
पंचायत चुनाव…BJP बनाम कांग्रेस का सीधा मुकाबला रहेगा?….या फिर…निर्दलीय उम्मीदवार पूरी कहानी बदल देंगे
.तो क्या पंचायत चुनाव…BJP बनाम कांग्रेस का सीधा मुकाबला रहेगा?….या फिर…निर्दलीय उम्मीदवार पूरी कहानी बदल देंगे?…क्या RLP कुछ इलाकों में दोनों बड़ी पार्टियों को चुनौती देगी?…क्या टिकट कटने के बाद बगावत होगी?…क्या गांव का स्थानीय चेहरा पार्टी के चुनाव चिन्ह पर भारी पड़ सकता है?…इन सभी सवालों का जवाब टिकट बंटवारे से लेकर मतदान तक दिखाई देगा।
.इस चुनाव में चार ताकतें एक साथ दिखाई दे सकती हैं—BJP….पार्टी संगठन और सत्ता का आधार।कांग्रेस …..विपक्ष के रूप में स्थानीय नेटवर्क और पुराना संगठन। तीसरी पार्टी की बात करें तो RLP का भी कुछ क्षेत्रों में क्षेत्रीय राजनीतिक आधार और अपना संगठन मौजूद है ।वहीँ अगर निर्दलीय की बात करें तो वहां मौजूद है व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय समीकरण। लेकिन इनमें से कौन कितनी सीटों पर प्रभाव डालेगा…यह तो चुनाव के बाद ही स्पष्ट होगा। निकाय चुनाव ने एक संदेश दिया है—स्थानीय चुनाव में तीसरी ताकत को नजरअंदाज करना आसान नहीं।अब पंचायत की बारी है।…एक तरफ पार्टी का सिंबल……दूसरी तरफ गांव का अपना चेहरा…और मैदान में RLP जैसी क्षेत्रीय ताकत।अब देखना यह है—चौपाल का वोट किसके साथ जाता है…और टिकट की नाराजगी किसका गणित बिगाड़ती है?….क्योंकि पंचायत चुनाव में…लड़ाई सिर्फ दो पार्टियों की नहीं होगी।असली मुकाबला अपने वोट बचाने का भी होगा।BJP और कांग्रेस दोनों के लिए के लिए सवाल साफ है…“क्या वे अपने बागियों को संभाल पाएंगे?” …
पंचायत चुनाव में कहानी दो दलों की नहीं, वोटों के बिखराव की भी होगी!
.निकाय चुनाव ने चेताया है… पंचायत चुनाव में कहानी दो दलों की नहीं, वोटों के बिखराव की भी होगी!BJP-कांग्रेस टिकट बांटेंगी… बागी मैदान में उतरेंगे… RLP अपनी ताकत आजमाएगी…अब सवाल ये नहीं कि किसके पास पार्टी का सिंबल है… सवाल ये है कि गांव की चौपाल पर किसका अपना वोट बैंक है! क्योंकि एक बागी अगर मजबूत हुआ… तो जीत किसी की भी हो, गणित जरूर बदल सकता है!..पंचायत की चौपाल में फैसला होगा—संगठन भारी पड़ेगा… या अपना उम्मीदवार?
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