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राजस्थान निकाय चुनाव में भाजपा की रणनीति जीती, कांग्रेस प्रबंधन में हारी

Strategy of BJP and Congress
Strategy :  राजस्थान के निकाय चुनाव परिणामों से जो तस्वीर निकल कर सामने आई है उससे साफ पता चलता है कि प्रदेश की जनता ने भाजपा और कांग्रेस के साथ साथ निर्दलीय उम्मीदवारों पर भी अपना भरोसा जताया। अगर राजनीति की भाषा में कहा जाए तो तीसरा मोर्चा इस बार निर्दलीय प्रत्याशी रहे जिन्होने सभी 309 निकायों में अपनी मजबूत उपस्थिती दर्ज कराई और भाजपा और कांग्रेस को उनका साथ लेने पर मजबूर कर दिया। जहां तक चुनावी रणनीति और मैनेजमेंट का प्रश्न है तो भाजपा ने अपने मजबूत संगठन की बदौलत कांग्रेस को पीछे किया है।

भाजपा की चुनाव के प्रति गंभीरता

सत्तारुढ भाजपा ने इस चुनाव को गंभीरता, एकजुटता और पूरी व्यवस्थित तरीके से लडा जिसके नतीजे में प्रदेश के 10 नगर निगमों में से छह पर भाजपा के बोर्ड बन गए है, जयपुर, कोटा में भी भाजपा बहुमत में है इसलिए वहां भी भाजपा का बोर्ड बन जाना आसान लग रहा है। निकाय चुनाव के मतदान के बाद भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मदन राठौड ने प्रेस कॉंफ्रेंस में स्वीकार भी किया कि हमने इस चुनाव को युद्व की तरह लडा है जैसे युद्व जीतने के लिए जिस तरह से रणनीति बनाई और अपनाई जाती है उसी के अनुसार भाजपा ने रणनीति बनाई। यही कारण रहा कि भाजपा ने
विपक्ष की बिखराव वाली रणनीति को पहले भांपा। फिर अपने पत्ते ऐसे चले कि अल्पमत भी बहुमत में बदल गया। और सबसे अहम- सख्त अनुशासन से बगावत नहीं होने दी। बूथ लेवल तक की मजबूत नीति का नतीजा है कि 10 नगर निगमों में से 9 निगमों पर भगवा लहरा सकता है। ये सिर्फ जीत नहीं, शहरों की सियासत का नया भूगोल है। जिन 309 निकायों के इस महासमर में अब तक 305 के रिजल्ट आए हैं। इसमें भाजपा की स्ट्राइक रेट 65 प्रतिशत से अधिक है। कांग्रेस का खाता सिर्फ बीकानेर नगर निगम पर अटका है।

कांग्रेस कहां फेल हुई

अब बात करें कांग्रेस की तो दो साल से कांग्रेस चुनाव में देरी को हथियार बना रही थी। कांग्रेस चुनाव में एकजुट दिखने का प्रयास करती रही लेकिन अंदरखाने बंटी रही। पाली जैसे शहर में जहां कांग्रेस 29 पार्षद जीत कर भी आपसी खींचतान में बोर्ड नहीं बना सकी। अजमेर में कांग्रेस के 37 पार्षद थे और बोर्ड बनाने के लिए सिर्फ चार निर्दलीय का समर्थन चाहिए था लेकिन भाजपा ने नौ सीटें पीछे रहते हुए भी अपना बोर्ड बना लिया। जीत के बाद भी हार कैसे मिलती है, इसका इससे बड़ा उदाहरण नहीं हो सकता।

सिर्फ 0.94 प्रतिशत का अंतर 33 प्रतिशत में बदल गया

निकाय चुनाव में भाजपा और कांग्रेस को मिलने वाले वोट प्रतिशत देखें तो मात्र एक प्रतिशत से कम का फर्क है, लेकिन निकाय प्रमुखों में इस 0.94 प्रतिशत को 33 के अंतर में बदल दिया। 309 शहरी निकायों में भाजपा ने 10,235 वार्डों में से 4,179 वार्ड जीते थे। कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीय उम्मीदवारों को 2,273 वार्ड जीते। भाजपा को 35.18 प्रतिशत वोट मिले, कांग्रेस को 34.24 प्रतिशत वोट मिले। दोनों के बीच मात्र 0.94 प्रतिशत का अंतर था, लेकिन कांग्रेस मैनेजमेंट में मात खा गई। इसके कारण 100 से ज्यादा निकायों में बहुमत नहीं होने के बावजूद भी भाजपा ने अपना बोर्ड बना लिया।

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