SC Direction: सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाईकोर्ट को निर्देश दिया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि कोर्ट के आदेशों में पीड़िता या उसके परिवार की पहचान किसी भी रूप में सामने न आए। सुप्रीम कोर्ट ने दुष्कर्म मामलों में पीड़िता की पहचान उजागर किए जाने पर कड़ा रुख अपनाते हुए इसे निंदनीय बताया है। न्यायमूर्ति संजय करोल और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि 2018 के निपुण सक्सेना बनाम यूनियन ऑफ इंडिया फैसले में स्पष्ट किया गया था कि किसी भी माध्यम (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक या सोशल मीडिया) में पीड़िता की पहचान उजागर नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट को सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट पीठ ने अपने आदेश की प्रति सभी हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजने का निर्देश दिया है, ताकि इस कानून का सख्ती से पालन सुनिश्चित किया जा सके। यह टिप्पणी उस दौरान आई, जब अदालत हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के एक फैसले की समीक्षा कर रही थी, जिसमें नौ साल की बच्ची से दुष्कर्म के आरोपी को बरी कर दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में छोटे-छोटे विरोधाभासों को ज्यादा महत्व नहीं देना चाहिए।
कानून का पालन न होने पर जताई चिंता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इसके बावजूद निचली अदालतों में इस नियम का पालन नहीं हो रहा है। इसके पीछे अदालतों की उदासीनता और इस तरह के अपराधों से जुड़े सामाजिक कलंक के प्रति जागरूकता की कमी को जिम्मेदार बताया गया।
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कानूनी प्रावधानों पर जोर
सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि 1983 में भारतीय दंड संहिता में संशोधन कर धारा 228। जोड़ी गई थी, जिसका उद्देश्य दुष्कर्म पीड़िताओं की पहचान को सार्वजनिक होने से रोकना है। इससे पहले ऐसा कोई स्पष्ट कानूनी प्रतिबंध नहीं था, जिससे पीड़िताओं को सामाजिक बहिष्कार और मानसिक आघात का सामना करना पड़ता था।
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