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राजस्थान हाईकोर्ट ने नाता प्रथा से हुआ विवाह को वैध माना

Rajasthan high court

Rajasthan news : राजस्थान हाईकोर्ट ने नाता प्रथा से हुए विवाह को वैध मानते हुए एक प्रकरण में आदेश जारी किया है। पारिवारिक पेंशन से जुड़े एक मामले में अहम आदेश देते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि प्रदेश के कुछ ग्रामीण इलाकों में नाता प्रथा का प्रचलन हैं। यहां नाता प्रथा से हुए विवाह को भी मान्यता दी गई हैं।

वहीं हिंदू विवाह अधिनियम-1955 की धारा-7 भी नाता विवाह को मान्यता देती है, अगर वह विवाह दोनों समुदाय की प्रथाओं से सम्पन्न हुआ हो।

इसलिए इस स्वीकारोक्ति को ध्यान में रखते हुए हम यह निष्कर्ष निकाल सकते है कि इस मामले में याचिकाकर्ता मृतक सरकारी कर्मचारी की पत्नी हैं और वह पारिवारिक पेंशन पाने की हकदार हैं।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की अदालत ने यह आदेश रामप्यारी सुमन की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिए।

सरकार ने पेंशन देने से कर दिया था इनकार

वकील तुषार पंवार ने बताया- याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) का विवाह पूरन लाल सैनी से उनकी पहली पत्नी की मृत्यु के बाद नाता प्रथा के जरिए हुआ था। पूरनलाल सैनी पटवारी पद से रिटायर हुए थे। साल 2020 में उनकी मृत्यु के बाद याचिकाकर्ता ने पारिवारिक पेंशन के लिए आवेदन किया।

पेंशन विभाग ने उनका आवेदन यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि मृतक कर्मचारी ने अपने सेवा रिकॉर्ड में कहीं भी पत्नी के रूप में याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) को रजिस्टर्ड नहीं किया हैं। उन्होंने केवल अपने दो बेटों को रजिस्टर्ड किया है, वे दोनों शादीशुदा हैं।

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पारिवारिक विवाद में मृतक ने पत्नी माना था

याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) ने खुद माना है कि उनका विवाह नाता प्रथा से हुआ हैं। वकील ने बताया- इस पर हमने कोर्ट के सामने तथ्य रखते हुए कहा कि पूरनलाल सैनी से पारिवारिक विवाद के चलते याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) ने फैमिली कोर्ट में भरण-पोषण के लिए आवेदन किया था, जिसमें पूरनलाल सैनी ने खुद याचिकाकर्ता को अपनी पत्नी स्वीकार किया था।

वहीं माना था कि उनके एक बेटी भी हैं। उनके बयान से यह भी पता चला था कि वह बेटी की शादी तक याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) को भरण पोषण भी दे रहे थे। याचिकाकर्ता (रामप्यारी सुमन) ने फैमिली कोर्ट, कोटा का 14 फरवरी 2017 का आदेश भी कोर्ट के सामने रखा।

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