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कब है शनिश्चरी अमावस्या ‘शनि जयंती’ ? जानिए महत्व और पूजा विधि

Bhagwan shanidev

Shani : हर वर्ष ज्येष्ठ माह की अमावस्या के दिन शनि जयंती का पर्व  मनाया जाता है। हिन्दू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इसी तिथि पर भगवान शनिदेव का जन्म हुआ था, इसलिए इस दिन को उनके जन्मोत्सव के रूप में श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। इस दिन शनिदेव की विधि-विधान से पूजा करना अत्यंत शुभ माना जाता है। मान्यता है कि सच्चे मन से पूजा करने पर शनिदोष, साढ़ेसाती और ढैय्या के प्रभाव कम हो सकते हैं। इसके साथ ही जीवन में आ रही बाधाएं दूर होने के साथ हर क्षेत्र में सफलता पा सकते हैं। जानते हैं द्रिक पंचांग के अनुसार शनि जयंती की सही तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती और मंत्र –

कब है शनि जयंती 2026

द्रिक पंचांग के अनुसार, ज्येष्ठ अमावस्या 16 मई 2026, शनिवार को सुबह 4 बजकर 12 मिनट पर शुरू हो रही है, जो 17 मई को तड़के 1 बजकर 31 मिनट पर समाप्त हो रही है। उदया तिथि के हिसाब से शनि जयंती 16 मई 2026, शनिवार के दिन होगी।

शनि जयंती पर वट सावित्री व्रत

बता दें कि ज्येष्ठ अमावस्या के दिन शनि जयंती, शनिश्चरी अमावस्या के साथ वट सावित्री व्रत भी रखा जाता है। इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी आयु और अच्छे स्वास्थ्य के लिए व्रत रखने के साथ बरगद के पेड़ की विधिवत पूजा करके रक्षा सूत्र बांधती है।

ज्येष्ठ अमावस्या को हुआ था शनिदेव का जन्म

पौराणिक कथा के अनुसार, सूर्य देव का विवाह संज्ञा नामक देवकन्या से हुआ था। उनसे यमराज और यमुना का जन्म हुआ। लेकिन संज्ञा सूर्य के प्रचंड तेज को सहन नहीं कर पा रही थीं, इसलिए उन्होंने अपनी छाया को सूर्य की सेवा में छोड़ दिया और स्वयं अपने पिता के घर चली गईं। छाया और सूर्य से शनि देव का जन्म हुआ। छाया के पुत्र होने के कारण ही शनि देव का वर्ण श्याम माना जाता है। ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि के दिन शनिदेव का जन्म माना जाता है।

शनि जयंती पूजा विधि

शनि जयंती के दिन सुबह सूर्याेदय से पहले उठकर स्नान करना चाहिए और स्वच्छ वस्त्र धारण करने चाहिए। इसके बाद शनि मंदिर जाकर शनिदेव को सरसों का तेल अर्पित करना शुभ माना जाता है। यदि सुबह मंदिर जाना संभव न हो, तो शाम के समय भी दर्शन और पूजा की जा सकती है। पूजा के दौरान शनिदेव को फूल और माला अर्पित करें, फिर श्रद्धा से शनि स्तोत्र, शनि चालीसा और शनि मंत्र का पाठ करें। अंत में विधिपूर्वक आरती कर पूजा को पूर्ण करें।

शनि जयंती धार्मिक महत्व

ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को न्याय और कर्मफल दाता शनिदेव के प्राकट्य दिवस के रूप में मनाया जाता है। इस दिन शनिदेव की पूजा करने से वह अति प्रसन्न हो सकते हैं। दिन जातकों की कुंडली में शनि दोष, साढ़े साती या फिर ढैया है, तो वह इस दिन शनिदेव की पूजा करने के साथ सरसों का तेल, छाया दान, सरसों के तेल आदि उपाय करें, तो उनके दुष्प्रभावों को कम करने के साथ जीवन में खुशियों की दस्तक हो सकती है। सुख-समृद्धि, अनुशासन और आध्यात्मिक विकास हो सकता है।

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शनि मंत्र

ॐ शं शनैश्चराय नमः
ॐ प्रां प्रीं प्रौं सः शनैश्चराय नमः
ॐ नीलांजन समाभासं रवि पुत्रं यमाग्रजम। छाया मार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैश्चरम॥
ॐ शन्नोदेवीर-भिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये शंयोरभिस्त्रवन्तुनः।

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शनिदेव की आरती

जय जय श्री शनिदेव भक्तन हितकारी।
सूर्य पुत्र प्रभु छाया महतारी॥
जय जय श्री शनि देव

श्याम अंग वक्र-दृष्टि चतुर्भुजा धारी।
नी लाम्बर धार नाथ गज की असवारी॥
जय जय श्री शनि देव

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