Dev Anand : हिन्दी फिल्मों के लिए 1960 का दशक देव आनंद के रोमांटिक हीरो वाले दौर के लिए जाने जाता है। अपने समय में देव आनंद लड़कियों में बहुत लोकप्रिय हुए लेकिन उनकी प्रेमिका बनी सुरैया। देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी परवान तो खूब चढी लेकिन दोनों एक नहीं हो सके। ‘हम दोनों’, ‘तेरे घर के सामने’, ‘ज्वेल थीफ’ और ‘गाइड’ जैसी फिल्मों ने देव आनंद को स्टार बना दिया था। 1965 में रिलीज हुई ‘गाइड’ उनके करियर की सबसे चर्चित फिल्मों में शामिल हुई। फिल्म में उनके साथ वहीदा रहमान थीं। यह फिल्म आर.के. नारायण के उपन्यास पर आधारित थी और इसके फिल्म रूपांतरण में देव आनंद की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
देव आनंद का काला कोट उनके स्टाइल की पहचान बना था
देव आनंद का काला कोट उनके स्टाइल की पहचान बन गया था। 1958 में आई फिल्म काला पानी में सफेद शर्ट और काले कोट में उनका लुक काफी पसंद किया गया। इसके बाद एक किस्सा खूब चर्चित हुआ। कहा गया कि लड़कियां देव आनंद की एक झलक पाने के लिए बेकाबू हो जाती थीं। यहां तक कि कुछ लड़कियों के छत से कूदने की बातें भी सामने आईं। हालांकि, उनके काले कोट वाले लुक की वजह से भारी भीड़ जुट जाती थी और ट्रैफिक जाम जैसी स्थिति बन जाती थी। इसी वजह से दावा किया गया कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने देव आनंद के सार्वजनिक जगहों पर काला कोट पहनने पर रोक लगा दी थी। हालांकि, इस दावे का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड नहीं मिलता। देव आनंद ने अपनी आत्मकथा रोमांसिंग विद लाइफ में इस कहानी को बेवकूफी भरा मिथक बताया था।
नाव पलटी और शुरू हुई सुरैया से प्रेम कहानी
देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी हिंदी सिनेमा की सबसे चर्चित और अधूरी प्रेम कहानियों में से एक है। देव आनंद और सुरैया की प्रेम कहानी की शुरुआत फिल्म ‘विद्या’ की शूटिंग के दौरान हुई। एक गाने की शूटिंग के दौरान नाव पलट गई और सुरैया पानी में गिर गईं। देव आनंद ने उन्हें बचाने के लिए पानी में छलांग लगा दी। इस घटना के बाद दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं और धीरे-धीरे यह रिश्ता प्यार में बदल गया। हालांकि सुरैया के परिवार इस शादी के खिलाफ था इसलिए शादी नहीं हो सकी बाद में देव आनंद ने कार्तिक कल्पना से शादी की।
रोमांटिक हीरों की जगह गंभीर अभिनेता
फिल्म में उन्होंने एक ऐसे किरदार को निभाया, जो साधारण रोमांटिक हीरो की उनकी छवि से काफी अलग था। ‘गाइड’ ने उन्हें एक गंभीर अभिनेता के तौर पर भी स्थापित किया। देव आनंद का फिल्म में अभिनेता बनने का ख्वाब अचानक से पूरा नहीं हुआ था। उसके पीछे संघर्ष था। देव आनंद सिर्फ तीस रुपये लेकर देव आनंद मुंबई पहुंचे थे। शुरुआत में काम नहीं मिला और पैसे खत्म हो गए तो उन्होंने चर्चगेट स्थित मिलिट्री सेंसर ऑफिस में 65 रुपए मासिक वेतन पर नौकरी की। बाद में एक अकाउंटिंग फर्म में 85 रुपए की तनख्वाह पर क्लर्क का काम भी किया। अभिनेता बनने की इच्छा उन्हें अशोक कुमार की फिल्मों से मिली।
ऐसे हुई शुरुआत
मिलिट्री सेंसर ऑफिस में करीब एक साल तक नौकरी करने के बाद देव आनंद अपने बड़े भाई चेतन आनंद के पास चले गए। चेतन उस समय भारतीय जन नाट्य संघ यानी इप्टा से जुड़े थे। उन्होंने छोटे भाई को भी अपने साथ जोड़ लिया। यहां से देव आनंद को थिएटर में काम करने और अभिनय सीखने का मौका मिला। फिर किस्मत ने साथ दिया। साल 1946 में उन्हें प्रभात टॉकीज की फिल्म ‘हम एक हैं’ में काम करने का मौका मिला।
देव आनंद और गुरु दत्त की दोस्ती
फिल्म ‘हम एक हैं’ में देव आनंद बतौर हीरो काम कर रहे थे, जबकि गुरु दत्त वहां असिस्टेंट डायरेक्टर और कोरियोग्राफर के तौर पर काम कर रहे थे। स्टूडियो के सभी लोगों के कपड़े एक ही धोबी के पास जाते थे। एक दिन धोबी से ऐसी गलती हुई कि देव आनंद की सफेद शर्ट गुरु दत्त के कपड़ों के साथ चली गई। गुरु दत्त ने वह शर्ट पहन ली और स्टूडियो पहुंच गए। जब देव आनंद ने अपनी शर्ट गुरु दत्त के शरीर पर देखी, तो दोनों का आमना-सामना हुआ। लेकिन शर्ट को लेकर कोई नाराजगी नहीं हुई। दोनों इस अजीब संयोग पर खूब हंसे। यही छोटी-सी घटना आगे चलकर उनकी गहरी दोस्ती की शुरुआत बन गई।
पिता स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े हुए थे
देव आनंद का जन्म 26 सितंबर 1923 को ब्रिटिश भारत के पंजाब के गुरदासपुर जिले में धर्मदेव पिशोरीमल आनंद के रूप में हुआ था। उनके पिता पिशोरी लाल आनंद गुरदासपुर में वकील थे और स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े थे। देव आनंद चार भाइयों में तीसरे थे। उनके भाई चेतन आनंद और विजय आनंद भी फिल्म जगत से जुड़े रहे, जबकि उनकी बहन शील कांता कपूर फिल्म निर्देशक शेखर कपूर की मां थीं। उन्होंने शुरुआती पढ़ाई डलहौजी के सेक्रेड हार्ट स्कूल से की और बाद में लाहौर के गवर्नमेंट कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए किया।
पिता ने पढ़ाई के लिए पैसे देने से मना कर दिया था
देव आनंद आगे पढ़ना चाहते थे और उच्च शिक्षा के लिए लंदन जाने का सपना देखते थे, जबकि उनके पिता चाहते थे कि वह किसी बैंक में नौकरी कर लें, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं थी कि उनकी आगे की पढ़ाई का खर्च उठाया जा सके। पिता ने साफ कह दिया कि अब उनकी पढ़ाई के लिए पैसे नहीं हैं। इसके बाद देव आनंद ने तय किया कि अगर जिंदगी में संघर्ष करना ही है, तो क्यों न अपने बचपन के सपने एक्टिंग के लिए संघर्ष किया जाए। इसी सपने को पूरा करने के लिए जून 1943 में वह लाहौर से ट्रेन पकड़कर मुंबई के लिए निकल पड़े।
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