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संसद में सफल रहने के बाद राजनीतिक जनआंदोलन खड़ा करना राहुल की असल परीक्षा

Rahul Gandhi

Rahul Gandhi Politics: पार्टी विद डिंफरेंस स्लोगन के साथ 2014 में सत्ता में आई भाजपा को दस साल बाद तक कोई चुनौती देने वाला विपक्ष नहीं मिल सका था बल्कि यूं कहना ज्यादा ठीक होगा कि विपक्ष लगभग खत्म माना जा रहा था। राजनीति में सफलता लगातार संघर्ष और मेहनत मांगती है इसी को ध्यान में रखते हुए संसद में नेता प्रतिपक्ष तथा कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने लगातार मेहनत की है जिसके परिणामस्वरुप जो छवि भाजपा और उसके समर्थकों ने सोशल मीडिया के माध्यम से रची और प्रचारित की उसमें बदलाव दिखने लगा है। जिस तरह से उन्होने मोदी सरकार के खिलाफ आक्रमक रणनीति अपनाई और अपने को बेदाग, राष्ट्रप्रेम से ओतप्रोत, अजय मानने वाली भाजपा सरकार को, पाक के साथ युद्वविराम, अमेरिका के साथ ट्रेड डील, मनरेगा जैसे मुद्दों पर आक्रमक हमले किए हैं उससे देशभर में केन्द्र सरकार की अटूट छवि में दरार पैदा कर दी है।

विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे

बजट सत्र 2026 के पहले चरण में राहुल गांधी विपक्ष के सबसे बड़े चेहरे के रूप में उभर कर सामने आए हैं। बजट सत्र के दौरान राहुल गांधी सदन में करीब 50 मिनट तक प्रधानमंत्री मोदी और सरकार की नीतियों पर बिना रुके हमला किया है, राहुल की इस नई और आक्रामक शैली ने न केवल कांग्रेस सांसदों में जोश भर दिया है, बल्कि विपक्षी खेमे इंडिया ब्लॉक भी एकजुट करने का काम किया. राहुल गांधी के आक्रामक रुख और सरकार को असहज करने की क्षमता से कांग्रेस सांसद उत्साहित नजर आए. वे अपने नेता के पीछे एकजुट दिखे, सदन में निलंबन झेला, धरने दिए, नारे लगाए और विपक्षी दलों से तालमेल बढ़ाया ताकि पार्टी नेतृत्व के लिए ‘फोर्स मल्टीप्लायर’ की भूमिका निभा सकें. राजनीति के जानकार मानते है कि अगर राहुल गांधी संसद के बाहर भी इसी फॉर्म में रहे तो कांग्रेस पार्टी की स्थिति संभल सकती है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि राहुल गांधी की असली परीक्षा संसद के भाषणों में नहीं, बल्कि जमीन पर है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी बाधा उनके संगठनात्मक ढांचे की कमजोरी है. वोटर अधिकार यात्रा और मनरेगा के विरोध में किए गए प्रदर्शन अब तक व्यापक जन-आंदोलन का रूप नहीं ले पाए हैं.

मनरेगा, ट्रेड डील और ट्रंप कार्ड    

राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी पर आरोप लगाया कि उन्होंने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आकर इंडो-यूएस समझौते पर घुटने टेक दिए हैं. उन्होंने इसे देश के हितों का सौदा करार दिया. राहुल ने विरोध स्वरूप सांसदों को सुझाव दिया कि प्रदर्शन के दौरान गौतम अडानी, डोनाल्ड ट्रंप और नरेंद्र मोदी की तस्वीरों वाले पोस्टर लगाए जाएं, ताकि यह स्थापित किया जा सके कि सरकार की कॉर्पाेरेट के साथ सांठगांठ है. राहुल गांधी का एक लक्ष्य केन्द्र सरकार को किसान विरोधी ठहराना भी है। दो दिन पूव ही उन्होने किसान नेताओं के साथ एक अहम बैठक की, इसका संदेश साफ था, राहुल खुद को किसान समर्थक और सरकार को किसान विरोधी के रूप में मजबूती से स्थापित करना चाहते हैं. उनका लक्ष्य कृषि संकट को एक बड़े चुनावी मुद्दे में तब्दील करना है.

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एप्स्टीन फाइल्स और राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा

कांग्रेस ने एप्स्टीन फाइल्स विवाद को भी एक राजनीतिक हथियार बनाने की तैयारी कर ली है. भले ही यह आम जनता के लिए जटिल मुद्दा हो, लेकिन कांग्रेस का मानना है कि इससे सरकार की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सकता है. इसके अलावा, पूर्व सेना प्रमुख जनरल नरवणे की किताब के संदर्भों को उठाकर राहुल गांधी राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दे पर पीएम की 56 इंच की छाती वाली छवि को चुनौती दे रहे हैं और उन्हें एक अहम मौके पर फैसला न कर पाने वाला दिखाना चाहते हैं.

असल चुनौती चुनावी राज्यों में है

दरअसल कांग्रेस या इंडिया ब्लॉक या खुद राहुल गांधी के लिए असल चुनौती चुनावी राज्यों में होगी। राज्यों के चुनावों में विपक्ष पूरा जोर लगाकर भी हारता रहा है चाहे महाराष्ट्र, हरियाणा, उत्तराखंड हो या बिहार राज्य, राहुल गांधी और कांग्रेस सहित पूरे विपक्ष ने पूरी मेहनत की लेकिन भाजपा को हरा नहीं सकी। लेकिन अब लगता है कि पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु और केरल में होने वाले चुनावों को देखते हुए राहुल गांधी अपने तीखे तेवर ढीले करने के मूड में नहीं हैं. उनका स्लोगन जो उचित समझो वही करो सीधे तौर पर सरकार की निर्णय लेने की क्षमता पर कटाक्ष है, जिसे वे चुनावी रैलियों में प्रमुखता से इस्तेमाल करेंगे। आने वाले हफ्ते तय करेंगे कि यह संसदीय प्रदर्शन व्यापक राजनीतिक आंदोलन का रूप लेता है या फिर सदन की बहसों तक ही सीमित रह जाता है. अब असली परीक्षा संसद नहीं, सड़क है.

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